भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1291, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1291

वेदविद्वेषी मूर्ख, नास्तिक, अदृढनिश्चयवाले, क्रियाहीन तथा अन्नार्थियोंको बिना कुछ दिये ही घरसे निकाल देनेवाले पापी मनुष्य अधम गतिको प्राप्त होते हैं ।।

नास्त्यस्तीति पुनर्जन्म कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
नाधिगच्छन्ति तन्नित्यं हेतुवादशतैरपि ॥
पुनर्जन्म नहीं होता है या होता है, इस विषयमें बड़े-बड़े विद्वान् मोहित हो जाते हैं। वे सैकड़ों युक्तिवादोंद्वारा भी उसे सर्वथा नहीं समझ पाते हैं ।।

एषा ब्रह्मकृता माया दुर्विज्ञेया सुरासुरैः ।
किं पुनर्मानवैर्लोके ज्ञातुकामैः कुबुद्धिभिः ॥
यह ब्रह्माजीके द्वारा रची माया है, जिसे देवता और असुर भी बड़ी कठिनाईसे समझ पाते हैं; फिर दूषित बुद्धिवाले मानव यदि लोकमें इस विषयको जानना चाहें तो कैसे जान सकते हैं ।।

केवलं श्रद्धया देवि श्रुतिमात्रनिविष्टया ।
ततोऽस्तीत्येव मन्तव्यं तथा हितमवाप्नुयात् ॥
देवि! केवल वेदमें पूर्णतः श्रद्धा करके 'परलोक एवं पुनर्जन्म होता है' ऐसा मानना चाहिये। इससे आस्तिक मनुष्यका हित होता है ।।

दैवगुह्येषु चान्येषु हेतुर्देवि निरर्थकः ।
बधिरान्धवदेवात्र वर्तितव्यं हितैषिणा ॥
एतत् ते कथितं देवि ऋषिगुह्यं प्रजाहितम् ॥
देवि! देवसम्बन्धी जो दूसरे-दूसरे गुह्य विषय हैं, उनमें युक्तिवाद काम नहीं देता। जो अपना हित चाहनेवाले हैं, उन्हें इस विषयमें अन्धे और बहरेके समान बर्ताव करना चाहिये। अर्थात् नास्तिकोंकी ओर न तो देखे और न उनकी बातें ही सुने। देवि! यह ऋषियोंके लिये गोपनीय तथा प्रजाके लिये हितकर विषय तुम्हें बताया गया है ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)