भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1290, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1290

शास्त्रोंके परोक्षवादी वचन सुनकर और प्रत्यक्ष दर्शन न होनेसे कितने ही लोग इस संशयमें पड़े रहते हैं कि वह सब (परलोक) नहीं है, नहीं है। इस पक्षभेदके भीतर यथार्थवाद क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। भगवन्! आपने जो कुछ बताया है, वही लोककी स्थिति है॥

नारद उवाच

प्रश्नमेतत् तु पृच्छन्त्या रुद्राण्या परिषत् तदा।
कौतूहलयुता श्रोतुं समाहितमनाभवत्॥
**नारदजी कहते हैं—**रुद्राणीके यह प्रश्न उपस्थित करनेपर सारी मुनिमण्डली एकाग्रचित्त होकर इसका उत्तर सुननेके लिये उत्कण्ठित हो गयी॥

श्रीमहेश्वर उवाच

नैतदस्ति महाभागे यद् वदन्तीह नास्तिकाः।
एतदेवाभिशस्तानां श्रुतविद्वेषिणां मतम्॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! इस विषयमें नास्तिक लोग जो कुछ कहते हैं, वह ठीक नहीं है। यह तो कलंकित शास्त्रद्रोही पुरुषोंका मत है॥

सर्वमर्थं श्रुतं दृष्टं यत् प्रागुक्तं मया तव।
तदाप्रभृति मर्त्यानां श्रुतमाश्रित्य पण्डिताः॥
कामान् संछिद्य परिघान् धृत्या वै परमासनाः।
अभियान्त्येव ते स्वर्गं पश्यन्तः कर्मणः फलम्॥
मैंने पहले तुमसे जो कुछ कहा है, वह सारा विषय शास्त्रसम्मत तथा अनुभूत है। तभीसे मनुष्योंमें जो विद्वान् पुरुष हैं, वे वेद-शास्त्रका आश्रय ले परिघ-जैसी कामनाओंका उच्छेद करके धैर्यपूर्वक उत्तम आसन लगाये ध्यानमग्न रहते हैं, वे कर्मोंका फल प्रत्यक्ष देखते हुए स्वर्ग (ब्रह्म) लोकको ही जाते हैं॥

एवं श्रद्धाभवं लोके परतः सुमहत् फलम्।
बुद्धिः श्रद्धा च विनयः करणानि हितैषिणाम्॥
इस प्रकार परलोकमें श्रद्धाजनित महान् फलकी प्राप्ति होती है। जो अपना हित चाहते हैं, उन पुरुषोंके लिये बुद्धि, श्रद्धा और विनय—ये कारण (उन्नतिके साधन) हैं॥

तस्मात् स्वर्गाभिगन्तारः कतिचित् त्वभवन् नराः।
अन्ये करणहीनत्वान्नास्तिक्यं भावमाश्रिताः॥
अतः कुछ ही लोग उक्त साधनसे सम्पन्न होनेके कारण स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंमें जाते हैं। दूसरे लोग उन साधनोंसे हीन होनेके कारण नास्तिकभावका अवलम्बन लेते हैं॥

श्रुतविद्वेषिणो मूर्खा नास्तिकादृढनिश्चयाः।
निष्क्रियास्तु निरन्नादाः पतन्त्येवाधमां गतिम्॥