महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1289, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदैव और पुरुषार्थ दोनोंके समानकालिक सहयोगसे कर्म सम्पन्न होता है। जैसे एक ही कालमें सर्दी और गर्मी दोनों होती हैं, उसी प्रकार एक ही समय दैव और पुरुषार्थ दोनों काम करते हैं। इन दोनोंमें जो पुरुषार्थ है, उसका आरम्भ विज्ञ पुरुषको पहले करना चाहिये। जो अपने-आप होना सम्भव नहीं है, उसको आरम्भ करनेसे मनुष्य कीर्तिका भागी होता है ।।
खननान्मथनाल्लोके जलाग्निप्रापणं तथा ।
तथा पुरुषकारे तु दैवसम्पत् समाहिता ।।
जैसे लोकमें भूमि खोदनेसे जल तथा काष्ठका मन्थन करनेसे अग्निकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषार्थ करनेपर दैवका सहयोग स्वतः प्राप्त हो जाता है ।।
नरस्याकुर्वतः कर्म दैवसम्पन्न लभ्यते ।
तस्मात् सर्वसमारम्भो दैवमानुषनिर्मितः ।।
जो मनुष्य कर्म नहीं करता, उसको दैवी सहायता नहीं प्राप्त होती; अतः समस्त कार्योंका आरम्भ दैव और पुरुषार्थ दोनोंपर निर्भर है ।।
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश लोकनाथ वृषध्वज ।
नास्त्यात्मा कर्मभोक्तेति मृतो जन्तुर्न जायते ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! सर्वलोकेश्वर! लोकनाथ! वृषध्वज! कर्मोंका फल भतोनेवाले जीवात्मा नामक किसी द्रव्यकी सत्ता नहीं है; इसलिये मरा हुआ जीव फिर जन्म नहीं लेता है ।।
स्वभावाज्जायते सर्वं यथा वृक्षफलं तथा ।
यथोर्मयः सम्भवन्ति तथैव जगदाकृतिः ।।
जैसे वृक्षसे फल पैदा होता है, उसी प्रकार स्वभावसे ही सब कुछ उत्पन्न होता है और जैसे समुद्रसे लहरें प्रकट होती हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही जगत्की आकृति प्रकट होती है ।।
तपोदानानि यत् कर्म तत्र तद् दृश्यते वृथा ।
नास्ति पौनर्भवं जन्म इति केचिद् व्यवस्थिताः ।।
तप और दान आदि जो कर्म हैं, वे सब व्यर्थ दिखायी देते हैं, किंतु जीवात्माका पुनर्जन्म नहीं होता है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है ।।
परोक्षवचनं श्रुत्वा न प्रत्यक्षस्य दर्शनात् ।
तत् सर्वं नास्ति नास्तीति संशयस्थास्तथा परे ।।
पक्षभेदान्तरे चास्मिंस्तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि ।
उक्तं भगवता यत् तु तत् तु लोकस्य संस्थितिः ।।