भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1288, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1288

रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् । दैवादसिद्धिंश्च भवेद् दुष्कृतं चास्ति पौरुषे ।। अब मैं देव और मनुष्य दोनोंसे सम्पादित होनेवाले लौकिक कर्मका वर्णन करता हूँ। कृषिमें जो जुताई, बोवाई, रोपनी, कटनी तथा ऐसे ही और भी जो कार्य देखे जाते हैं, वे सब मानुष कहे गये हैं। दैवसे उस कर्ममें सफलता और असफलता होती है। मानुष कर्ममें बुराई भी सम्भव है ।।

सुयत्नाल्लभ्यते कीर्तिर्दुर्यत्नादयशस्तथा । एवं लोकगतिर्देवि आदिप्रभृति वर्तते ।। उत्तम प्रयत्न करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है और बुरे उपायोंके अवलम्बनसे अपयश। देवि! आदिकालसे ही जगत्की ऐसी ही अवस्था है ।।

रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् ।। काले वृष्टिः सुवापं च प्ररोहः पंक्तिरेव च । एवमादि तु यच्चान्यत् तद् दैवतमिति स्मृतम् ।। बीजका रोपना और काटना आदि मनुष्यका काम है; परंतु समयपर वर्षा होना, बोवाईका सुन्दर परिणाम निकलना, बीजमें अंकुर उत्पन्न होना और शस्यका श्रेणीबद्ध होकर प्रकट होना इत्यादि कार्य देवसम्बन्धी बताये गये हैं। दैवकी अनुकूलतासे ही इन कार्योंका सम्पादन होता है ।।

पञ्चभूतस्थितिश्चैव ज्योतिशामयनं तथा । अबुद्धिगम्यं यन्मर्त्यैर्हेतुभिर्वा न विद्यते ।। तादृशं कारणं दैवं शुभं वा यदि वेतरत् । यादृशं चात्मना शक्यं तत् पौरुषमिति स्मृतम् ।। पंचभूतोंकी स्थिति, ग्रहनक्षत्रोंका चलना-फिरना तथा जहाँ मनुष्योंकी बुद्धि न पहुँच सके अथवा किन्हीं कारणों या युक्तियोंसे भी समझमें न आ सके—ऐसा कर्म शुभ हो या अशुभ दैव माना जाता है और जिस बातको मनुष्य स्वयं कर सके, उसे पौरुष कहा गया है ।।

केवलं फलनिष्पत्तिरेकेन तु न शक्यते । पौरुषेणैव दैवेन युगपद् ग्रथितं प्रिये ।। केवल दैव या पुरुषार्थसे फलकी सिद्धि नहीं होती। प्रिये! प्रत्येक वस्तु या कार्य एक ही साथ पुरुषार्थ और दैव दोनोंसे ही गुँथा हुआ है ।।

तयोः समाहितं कर्म शीतोष्णं युगपत् तथा । पौरुषं तु तयोः पूर्वमारब्धव्यं विजानता ।। आत्मना तु न शक्यं हि तथा कीर्तिमवाप्नुयात् ।।