भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1287, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1287

**उमाने पूछा—**भगवन्! सोनेमात्रसे प्राणियोंको स्वप्नका दर्शन होने लगता है। यह उनका स्वभाव है, या और कोई बात है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥

श्रीमहेश्वर उवाच

सुप्तानां तु मनश्चेष्टा स्वप्न इत्यभिधीयते ।
अनागतमतिक्रान्तं पश्यते संचरन्मनः ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! सोये हुए प्राणियोंके मनकी जो चेष्टा है, उसीको स्वप्न कहते हैं। स्वप्नमें विचरता हुआ मन भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखता है॥
निमित्तं च भवेत् तस्मात् प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
अतः उन घटनाओंके देखनेमें प्राणियोंके लिये स्वप्नदर्शन निमित्त बनता है। देवि! तुम्हें स्वप्नका विषय बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो?॥

उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश लोके कर्मक्रियापथे ।
दैवात् प्रवर्तते सर्वमिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! सर्वभूतेश्वर! जगत्में दैवकी प्रेरणासे ही सबकी कर्ममार्गमें प्रवृत्ति होती है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है॥
अपरे चेष्टया चेति दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः क्रियाम् ।
पक्षभेदे द्विधा चास्मिन् संशयस्थं मनो मम ॥
तत्त्वं वद महादेव श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
दूसरे लोग क्रियाको प्रत्यक्ष देखकर ऐसा मानते हैं कि चेष्टासे ही सबकी प्रवृत्ति होती है, दैवसे नहीं। ये दो पक्ष हैं। इनमें मेरा मन संशयमें पड़ जाता है; अतः महादेव! यथार्थ बात बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो॥
लक्ष्यते द्विविधं कर्म मानुषेष्वेव तच्छृणु ।
पुराकृतं तयोरेकमैहिकं त्वितरत् तथा ॥
मनुष्योंमें दो प्रकारका कर्म देखा जाता है, उसे सुनो। इनमें एक तो पूर्वकृत कर्म है और दूसरा इहलोकमें किया गया है॥
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि दैवमानुषनिर्मितम् ।
कृषौ तु दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा ॥