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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1286, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1286

तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत् सा प्रणश्यति ।।
परलोकस्य चास्तित्वे मूढानां कारणं त्विदम् ।।
इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर (पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाले) कहलाते हैं। फिर ज्यों-ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों-त्यों उनकी स्वप्न-जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है। ऐसी घटनाएँ मूर्ख मनुष्योंको परलोककी सत्तापर विश्वास करानेमें कारण बनती हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिन्मृता भूत्वापि सम्प्रति ।
निवर्तमाना दृश्यन्ते देहेष्वेव पुनर्नराः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! कई मनुष्य मरनेके बाद भी फिर उसी शरीरमें लौटते देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि कारणं शृणु शोभने ।।
प्राणैर्वियुज्यमानानां बहुत्वात् प्राणिनां क्षये ।
तथैव नामसामान्याद् यमदूता नृणां प्रति ।।
वहन्ति ते क्वचिन्मोहादन्यं मर्त्यं तु धार्मिकाः ।
निर्विकारं हि तत् सर्वं यमो वेद कृताकृतम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शोभने! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। प्राणी बहुत हैं और मृत्युकाल आनेपर सभीका अपने प्राणोंसे वियोग हो जाता है। धार्मिक यमदूत कभी-कभी कई मनुष्योंके एक ही नाम होनेके कारण मोहवश एकके बदले दूसरेको पकड़ ले जाते हैं, परंतु यमराज निर्विकार भावसे दूतोंके द्वारा किये गये और नहीं किये गये, सभी कार्योंको जानते हैं ।।

तस्मात् संयमनीं प्राप्य यमेनैकेन मोक्षिताः ।
पुनरेवं निवर्तन्ते शेषं भोक्तुं स्वकर्मणः ।।
स्वकर्मण्यसमाप्ते तु निवर्तन्ते हि मानवाः ।।
अतः संयमनीपुरीमें जानेपर भूलसे गये हुए मनुष्यको एकमात्र यमराज फिर छोड़ देते हैं; अतः वे अपने प्रारब्ध कर्मका शेष भाग भोगनेके लिये पुनः लौट आते हैं। वे ही मनुष्य लौटते हैं, जिनका कर्म-भोग समाप्त नहीं हुआ होता है ।।

उमोवाच

भगवन् सुप्तमात्रेण प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
किं तत् स्वभावमन्यद् वा तन्मे शंसितुमर्हसि ।।