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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1294, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1294

कृमिकीटसमाकीर्णं भजतामतिदुर्गमम् । जो तीसरा मार्ग है, वह देखनेमें भी दुःखद होनेके कारण दुर्दर्श कहलाता है। वह दुर्गन्धयुक्त एवं अन्धकार-से आच्छन्न है। कंकड़-पत्थरोंसे व्याप्त और कठोर जान पड़ता है। वहाँ कुत्ते और दाढ़ोंवाले हिंसक जन्तु अधिक रहते हैं। कृमि और कीट सब ओर छाये रहते हैं। उस मार्गसे चलनेवालोंको वह अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है ।।

मागैंरैवं त्रिभिर्नित्यमुत्तमाधममध्यमान् ।। संनयन्ति यथा काले तन्मे शृणु शुचिस्मिते । शुचिस्मिते! इस प्रकार तीन मार्गोंद्वारा वे सदा यथासमय उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषोंको जिस प्रकार ले जाते हैं, वह मुझसे सुनो ।।

उत्तमानन्तकाले तु यमदूताः सुसंवृताः । नयन्ति सुखमादाय रमणीयपथेन वै ।। उत्तम पुरुषोंको अन्तके समय ले जानेके लिये जो यमदूत आते हैं, वे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होते हैं और उन पुरुषोंको साथ ले रमणीय मार्गद्वारा सुखपूर्वक ले जाते हैं ।।

मध्यमान् योधवेषेण मध्यमेन पथा तथा ।। चण्डालवेषास्त्वधमान् गृहीत्वा भर्त्संतर्जनैः । आकर्षन्तस्तथा पाशैर्दुर्दर्शेन नयन्ति तान् ।। त्रिविधानेवमादाय नयन्ति यमसादनम् ।। मध्यमकोटिके प्राणियोंको मध्यम मार्गके द्वारा योद्धाका वेष धारण किये हुए यमदूत अपने साथ ले जाते हैं तथा चाण्डालका वेष धारण करके अधमकोटिके प्राणियोंको पकड़कर उन्हें डाँटते-फटकारते तथा पाशोंद्वारा बाँधकर घसीटते हुए दुर्दर्श नामक मार्गसे ले जाते हैं। इस प्रकार त्रिविध प्राणियोंको लेकर वे उन्हें यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।

धर्मासनगतं दक्षं भ्राजमानं स्वतेजसा । लोकपालं सभाध्यक्षं तथैव परिषदगतम् ।। दर्शयन्ति महाभागे यामिकास्तं निवेद्य ते । महाभागे! वहाँ धर्मके आसनपर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए अपनी सभाके सभापतिके रूपमें चतुर लोकपाल यम बैठे होते हैं। यमदूत उन्हें सूचना देकर अपने साथ लाये हुए प्राणीको दिखाते हैं ।।

पूजयन् दण्डयन् कांश्चित् तेषां शृण्वन् शुभाशुभम् । व्यावृतो बहुसाहस्रैस्तत्रास्ते सततं यमः ।। यमराज कई सहस्र सदस्योंसे घिरे हुए अपनी सभामें विराजमान होते हैं। वे वहाँ आये हुए प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंका ब्यौरेवार वर्णन सुनकर उनमेंसे किन्हींका आदर करते हैं और किन्हींको दण्ड देते हैं ।।

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