भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1319, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1319

पावनार्थं च शौचार्थं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें तीर्थस्नानकी विधि बताता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने दूसरोंको पवित्र करने तथा स्वयं भी पवित्र होनेके लिये इस विधिका निर्माण किया था ।। यास्तु लोके महानद्यस्ताः सर्वास्तीर्थसंज्ञिकाः । तासां प्राक्स्रोतसः श्रेष्ठाः सङ्गमश्च परस्परम् ।। लोकमें जो बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं, उन सबका नाम तीर्थ है। उनमें भी जिनका प्रवाह पूरबकी ओर है, वे श्रेष्ठ हैं और जहाँ दो नदियाँ परस्पर मिलती हैं, वह स्थान भी उत्तम तीर्थ कहा गया है ।। तासां सागरसंयोगो वरिष्ठश्चेति विद्यते ।। तासामुभयतः कूलं तत्र तत्र मनीषिभिः । देवैर्वा सेवितं देवि तत् तीर्थं परमं स्मृतम् ।। और उन नदियोंका जहाँ समुद्रके साथ संयोग हुआ है, वह स्थान सबसे श्रेष्ठ तीर्थ बताया गया है। देवि! उन नदियोंके दोनों तटोंपर मनीषी पुरुषोंने जिस स्थानका सेवन किया है, वह उत्कृष्ट तीर्थ माना गया है ।। समुद्रश्च महातीर्थं पावनं परमं शुभम् । तस्य कूलगतास्तीर्था महद्भिश्च समाप्लुताः ।। समुद्र भी परम पावन एवं शुभ महातीर्थ है। उसके तटपर जो तीर्थ हैं, उनमें महात्मा पुरुषोंने गोता लगाया है ।। स्रोतसां पर्वतानां च जोषितानां महर्षिभिः । अपि कूलं तटाकं वा सेवितं मुनिभिः प्रिये ।। प्रिये! महर्षियोंद्वारा सेवित जो जलस्रोत और पर्वत हैं, उनके तटों और तड़ागोंपर भी बहुतसे मुनि निवास करते हैं ।। तत् तु तीर्थमिति ज्ञेयं प्रभावात् तु तपस्विनाम् ।। तदाप्रभृति तीर्थत्वं लभेल्लोकहिताय वै । एवं तीर्थं भवेद् देवि तस्य स्नानविधिं शृणु ।। उन तपस्वी मुनियोंके प्रभावसे उस स्थानको तीर्थ समझना चाहिये। ऋषियोंके निवासकालसे ही वह स्थान जगत्के हितके लिये तीर्थत्व प्राप्त कर लेता है। देवि! इस प्रकार स्थानविशेष तीर्थ बन जाता है। अब उसकी स्नानविधि सुनो ।। जन्मना व्रतभूयिष्ठो गत्वा तीर्थानि कांक्षया । उपवासत्रयं कुर्यादेकं वा नियमान्वितः ।। जो जन्मकालसे ही बहुत-से व्रत करता आया हो, वह पुरुष तीर्थोंके सेवनकी इच्छासे यदि वहाँ जाय तो नियमसे रहकर तीन या एक उपवास करे ।।