महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1320, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुण्यमासयुते काले पौर्णमास्यां यथाविधि । बहिरेव शुचिर्भूत्वा तत् तीर्थं मन्मना विशेत् ॥ पवित्र माससे युक्त समयमें पूर्णिमाको विधिपूर्वक बाहर ही पवित्र हो मुझमें मन लगाकर उस तीर्थके भीतर प्रवेश करे ॥ त्रिराप्लुत्स जलाभ्याशे दत्त्वा ब्राह्मणदक्षिणाम् । अभ्यर्च्य देवायतनं ततः प्रायाद् यथागतम् ॥ उसमें तीन बार गोता लगाकर जलके निकट ही ब्राह्मणको दक्षिणा दे, फिर देवालयमें देवताकी पूजा करके जहाँ इच्छा हो, वहाँ जाय ॥ एतद् विधानं सर्वेषां तीर्थं तीर्थमिति प्रिये । समीपतीर्थस्नानात् तु दूरतीर्थं सुपूजितम् ॥ प्रिये! प्रत्येक तीर्थमें सबके लिये स्नानका यही विधान है। निकटवर्ती तीर्थमें स्नान करनेकी अपेक्षा दूरवर्ती तीर्थमें स्नान आदि करना अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है ॥ आदिप्रभृति शुद्धस्य तीर्थस्नानं शुभं भवेत् । तपोऽर्थं पापनाशार्थं शौचार्थं तीर्थगाहनम् ॥ जो पहलेसे ही शुद्ध हो, उसके लिये तीर्थस्थान शुभकारक माना जाता है। तपस्या, पापनाश और बाहर-भीतरकी पवित्रताके लिये तीर्थोंमें स्नान किया जाता है ॥ एवं पुण्येषु तीर्थेषु तीर्थस्नानं शुभं भवेत् । एतन्नैयमिकं सर्वं सुकृतं कथितं तव ॥ इस प्रकार पुण्यतीर्थोंमें स्नान करना कल्याणकारी होता है। यह सब नियमपूर्वक सम्पादित होनेवाले पुण्यका तुम्हारे सामने वर्णन किया गया है ॥
उमोवाच
लोकसिद्धं तु यद् द्रव्यं सर्वसाधारणं भवेत् । तद् ददत् सर्वसामान्यं कथं धर्मं लभेन्नरः ॥ उमाने पूछा—भगवन्! जो द्रव्य लोकमें सबको प्राप्त है, जो सर्वसाधारणकी वस्तु है, उस सर्वसामान्य वस्तुका दान करनेवाला मनुष्य कैसे धर्मका भागी होता है? ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
लोके भूतमयं द्रव्यं सर्वसाधारणं तथा । तथैव तद् ददन्मर्त्यो लभेत् पुण्यं स तच्छृणु ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! लोकमें जो भौतिक द्रव्य हैं, वे सबके लिये साधारण हैं; उन वस्तुओंका दान करनेवाला मनुष्य किस तरह पुण्यका भागी होता है, यह बताता हूँ, सुनो ॥ दाता प्रतिग्रहीता च देयं सोपक्रमं तथा । देशकालौ च यत् त्वेतद् दानं षड्गुणमुच्यते ॥