भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1321, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1321

दान देनेवाला, उसे ग्रहण करनेवाला, देय वस्तु, उपक्रम (उसे देनेका प्रयत्न), देश और काल—इन छः वस्तुओंके गुणोंसे युक्त दान उत्तम बताया जाता है ॥ तेषां सम्पद्विशेषांश्च कीर्त्यमानान् निबोध मे । आदिप्रभृति यः शुद्धो मनोवाक्कायकर्मभिः । सत्यवादी जितक्रोधस्त्वलुब्धो नाभ्यसूयकः ॥ श्रद्धावानास्तिकश्चैव एवं दाता प्रशस्यते ॥ अब मैं इन छहोंके विशेष गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो आदिकालसे ही मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा शुद्ध हो, सत्यवादी, क्रोधविजयी, लोभहीन, अदोषदर्शी, श्रद्धालु और आस्तिक हो, ऐसा दाता उत्तम बताया गया है ॥ शुद्धो दान्तो जितक्रोधस्तथादीनकुलोद्भवः । श्रुतचारित्रसम्पन्नस्तथा बहुकलत्रवान् ॥ पञ्चयज्ञपरो नित्यं निर्विकारशरीरवान् । एतान् पात्रगुणान् विद्धि तादृक् पात्रं प्रशस्यते ॥ जो शुद्ध, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, उदार एवं उच्च कुलमें उत्पन्न, शास्त्रज्ञान एवं सदाचारसे सम्पन्न, बहुतसे स्त्री-पुत्रोंसे संयुक्त, पंचयज्ञपरायण तथा सदा नीरोग शरीरसे युक्त हो, वही दान लेनेका उत्तम पात्र है। उपर्युक्त गुणोंको ही दानपात्रके उत्तम गुण समझो। ऐसे पात्रकी ही प्रशंसा की जाती है ॥ पितृदेवाग्निकार्येषु तस्य दत्तं महत् फलम् । यद् यदर्हति यो लोके पात्रं तस्य भवेच्च सः ॥ देवता, पितर और अग्निहोत्रसम्बन्धी कार्योंमें उसको दिये हुए दानका महान् फल होता है। लोकमें जो जिस वस्तुके योग्य हो, वही उस वस्तुको पानेका पात्र होता है ॥ मुच्येदापदमापन्नो येन पात्रं तदस्य तु । अन्नस्य क्षुधितं पात्रं तृषितं तु जलस्य वै ॥ एवं पात्रेषु नानात्वमिष्यते पुरुषं प्रति । जिस वस्तुके पानेसे आपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य आपत्तिसे छूट जाय, उस वस्तुका वही पात्र है। भूखा मनुष्य अन्नका और प्यासा जलका पात्र है। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके लिये दानके भिन्न-भिन्न पात्र होते हैं ॥ जारश्चोरश्च षण्ढश्च हिंस्रः समयभेदकः । लोकविघ्नकराश्चान्ये वर्जिताः सर्वशः प्रिये ॥ प्रिये! चोर, व्यभिचारी, नपुंसक, हिंसक, मर्यादा-भेदक और लोगोंके कार्यमें विघ्न डालनेवाले अन्यान्य पुरुष सब प्रकारसे दानमें वर्जित हैं अर्थात् उन्हें दान नहीं देना चाहिये ॥ परोपघाताद् यद् द्रव्यं चौर्याद् वा लभ्यते नृभिः ।