महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1284, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजरायुजानां सर्वेषां मानुषं पदमुत्तमम् ।। क्लेद और बीजके संयोगसे अण्डज प्राणियोंका जन्म होता है और जरायुज प्राणी रज-वीर्यके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। समस्त जरायुजोंमें मनुष्यका स्थान सबसे ऊँचा है ।।
अतः परं तमोत्पत्तिं शृणु देवि समाहिता । द्विविधं हि तमो लोके शार्वरं देहजं तथा ।। देवि! अब एकाग्रचित्त होकर तमकी उत्पत्ति सुनो। लोकमें दो प्रकारका तम बताया गया है—रात्रिका और देहजनित ।।
ज्योतिर्भिश्श्च तमो लोके नाशं गच्छति शार्वरम् । देहजं तु तमो लोके तैः समस्तैर्न शाम्यति ।। लोकमें ज्योति या तेजके द्वारा रात्रिका अन्धकार नष्ट हो जाता है; परंतु जो देहजनित तम है, वह सम्पूर्ण ज्योतियोंके प्रकाशित होनेपर भी नहीं शान्त होता ।।
तमसस्तस्य नाशार्थं नोपायमधिजग्मिवान् । तपश्चचार विपुलं लोककर्ता पितामहः ।। लोककर्ता पितामह ब्रह्माजीको जब उस तमका नाश करनेके लिये कोई उपाय नहीं सूझा, तब वे बड़ी भारी तपस्या करने लगे ।।
चरतस्तु समुद्भूता वेदाः साङ्गाः सहोत्तराः । ताँल्लब्ध्वा मुमुदे ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ।। देहजं तत् तमो घोरं वेदैरेव विनाशितम् ।। तपस्या करते समय उनके मुखसे छहों अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेद प्रकट हुए। उन्हें पाकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकोंके हितकी कामनासे वेदोंके ज्ञानद्वारा ही उस देहजनित घोर तमका नाश किया ।।
कार्याकार्यमिदं चेति वाच्यावाच्यमिदं त्विति । यदि चेन्न भवेल्लोके श्रुतं चारित्रदैशिकम् ।। पशुभिर्निर्विशेषं तु चेष्टन्ते मानुषा अपि ।। यह वेदज्ञान कर्तव्य और अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाला है, वाच्य और अवाच्यका बोध करानेवाला है। यदि संसारमें सदाचारकी शिक्षा देनेवाली श्रुति न हो तो मनुष्य भी पशुओंके समान ही मनमानी चेष्टा करने लगें ।।
यज्ञादीनां समारम्भः श्रुतेनैव विधीयते । यज्ञस्य फलयोगेन देवलोकः समृद्ध्यते ।। वेदोंके द्वारा ही यज्ञ आदि कर्मोंका आरम्भ किया जाता है। यज्ञफलके संयोगसे देवलोककी समृद्धि बढ़ती है ।।
प्रीतियुक्ताः पुनर्देवा मानुषाणां भवन्त्युत । एवं नित्यं प्रवर्धेते रोदसी च परस्परम् ।।