भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 133

तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रयताञ्जलिः । स्त्रीभूतस्य हि ये पुत्रास्ते मे जीवन्तु वासव ॥ ४४ ॥ तब तापसीने इन्द्रसे हाथ जोड़कर कहा—'देवेन्द्र! स्त्रीरूप हो जानेपर मुझसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, वे ही जीवित हो जायँ' ॥ ४४ ॥ इन्द्रस्तु विस्मितो दृष्ट्वा स्त्रियं पप्रच्छ तां पुनः । पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्याः सुतास्तव ॥ ४५ ॥ स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः स्नेहस्तेभ्योऽधिकः कथम् । कारणं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ ४६ ॥ तब इन्द्रने विस्मित होकर उस स्त्रीसे पूछा—'तुमने पुरुषरूपसे जिन्हें उत्पन्न किया था, वे पुत्र तुम्हारे द्वेषके पात्र क्यों हो गये? तथा स्त्रीरूप होकर तुमने जिनको जन्म दिया है, उनपर तुम्हारा अधिक स्नेह क्यों है? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। तुम्हें मुझसे यह बताना चाहिये' ॥ ४५-४६ ॥

स्त्र्युवाच स्त्रियास्त्वभ्यधिकः स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै । तस्मात् ते शक्र जीवन्तु ये जाताः स्त्रीकृतस्य वै ॥ ४७ ॥ **स्त्रीने कहा—**इन्द्र! स्त्रीका अपने पुत्रोंपर अधिक स्नेह होता है, वैसा स्नेह पुरुषका नहीं होता है। अतः इन्द्र! स्त्रीरूपमें आनेपर मुझसे जिनका जन्म हुआ है, वे ही जीवित हो जायँ ॥ ४७ ॥

भीष्म उवाच एवमुक्तस्ततस्त्विन्द्रः प्रीतो वाक्यमुवाच ह । सर्व एवेह जीवन्तु पुत्रास्ते सत्यवादिनि ॥ ४८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तापसीके यों कहनेपर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'सत्यवादिनि! तुम्हारे सभी पुत्र जीवित हो जायँ ॥ ४८ ॥ वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत । पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाङ्क्षते ॥ ४९ ॥ 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा वर भी माँग लो। बोलो, फिरसे पुरुष होना चाहते हो या स्त्री ही रहनेकी इच्छा है? जो चाहो वह मुझसे ले लो' ॥ ४९ ॥

स्त्र्युवाच स्त्रीत्वमेव वृणे शक्र पुंस्त्वं नेच्छामि वासव । एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तां स्त्रियं प्रत्युवाच ह ॥ ५० ॥