भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 134

**स्त्रीने कहा—**इन्द्र! मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ। वासव! अब मैं पुरुष होना नहीं चाहती। उसके ऐसा कहनेपर देवराजने उस स्त्रीसे पूछा— ॥ ५० ॥

पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं चोदयसे विभो ।
एवमुक्तः प्रत्युवाच स्त्रीभूतो राजसत्तमः ॥ ५१ ॥
‘प्रभो! तुम्हें पुरुषत्वका त्याग करके स्त्री बने रहनेकी इच्छा क्यों होती है?’
इन्द्रके यों पूछनेपर उन स्त्रीरूपधारी नृपश्रेष्ठने इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ५१ ॥

स्त्रियाः पुरुषसंयोगे प्रीतिरभ्यधिका सदा ।
एतस्मात् कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्यहम् ॥ ५२ ॥
‘देवेन्द्र! स्त्रीका पुरुषके साथ संयोग होनेपर स्त्रीको ही पुरुषकी अपेक्षा अधिक विषयसुख प्राप्त होता है, इसी कारणसे मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ’ ॥ ५२ ॥

रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम ।
स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप ॥ ५३ ॥
‘देवश्रेष्ठ! सुरेश्वर! मैं सच कहती हूँ, स्त्रीरूपमें मैंने अधिक रति-सुखका अनुभव किया है, अतः स्त्रीरूपसे ही संतुष्ट हूँ। आप पधारिये’ ॥ ५३ ॥

एवमस्त्विति चोक्त्वा तामापृच्छ्य त्रिदिवं गतः ।
एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते ॥ ५४ ॥
महाराज! तब ‘एवमस्तु’ कहकर उस तापसीसे विदा ले इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये। इस प्रकार स्त्रीको विषय-भोगमें पुरुषकी अपेक्षा अधिक सुख-प्राप्ति बतायी जाती है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भङ्गास्वनोपाख्याने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भङ्गास्वनका उपाख्यानविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं)