महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः
शरीर, वाणी और मनसे होनेवाले पापोंके परित्यागका उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
किं कर्तव्यं मनुष्येण लोकयात्राहितार्थिना ।
कथं वै लोकयात्रां तु किंशीलश्च समाचरेत् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! लोकयात्राका भली-भाँति निर्वाह करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको क्या करना चाहिये? कैसा स्वभाव बनाकर किस प्रकार लोकमें जीवन बिताना चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
कायेन त्रिविधं कर्म वाचा चापि चतुर्विधम् ।
मनसा त्रिविधं चैव दशकर्मपथांस्त्यजेत् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! शरीरसे तीन प्रकारके कर्म, वाणीसे चार प्रकारके कर्म और मनसे भी तीन प्रकारके कर्म—इस तरह कुल दस तरहके कर्मोंका त्याग कर दे ॥ २ ॥
प्राणातिपातः स्तेन्यं च परदारानथापि च ।
त्रीणि पापानि कायेन सर्वतः परिवर्जयेत् ॥ ३ ॥
दूसरोंके प्राणनाश करना, चोरी करना और परायी स्त्रीसे संसर्ग रखना—ये तीन शरीरसे होनेवाले पाप हैं। इन सबका परित्याग कर देना उचित है ॥ ३ ॥
असत्प्रलापं पारुष्यं पैशुन्यमनृतं तथा ।
चत्वारि वाचा राजेन्द्र न जल्पेन्नानुचिन्तयेत् ॥ ४ ॥
मुँहसे बुरी बातें निकालना, कठोर बोलना, चुगली खाना और झूठ बोलना—ये चार वाणीसे होनेवाले पाप हैं। राजेन्द्र! इन्हें न तो कभी जबानपर लाना चाहिये और न मनमें ही सोचना चाहिये ॥ ४ ॥
अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् ।
कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ॥ ५ ॥
दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना—ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं। इन्हें सदा करना चाहिये। (इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना,