भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 136

समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोंके फलपर विश्वास न करना—ये तीन मानसिक पाप हैं—इनसे सदा बचे रहना चाहिये) ।। ५ ।। तस्माद् वाक्कायमनसा नाचरेदशुभं नरः । शुभाशुभान्याचरन् हि तस्य तस्याश्नुते फलम् ॥ ६ ॥ इसलिये मनुष्यका कर्तव्य है कि वह मन, वाणी या शरीरसे कभी अशुभ कर्म न करे; क्योंकि वह शुभ या अशुभ जैसा कर्म करता है; उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है ।। ६ ।।

[ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा]

अमृतस्य समुत्पत्तौ देवानामसुरैः सह । षष्टिवर्षसहस्राणि देवासुरमवर्तत ॥ एक समय अमृतकी उत्पत्ति हो जानेपर उसकी प्राप्तिके लिये देवताओंका असुरोंके साथ साठ हजार वर्षोंतक युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्रामके नामसे प्रसिद्ध है ।।

तत्र देवास्तु दैतेयैर्वध्यन्ते भृशदारुणैः । त्रातारं नाधिगच्छन्ति वध्यमाना महासुरैः ॥ उस युद्धमें अत्यन्त भयंकर दैत्यों एवं बड़े-बड़े असुरोंकी मार खाकर देवता किसी रक्षकको नहीं पाते थे ।।

आर्तास्ते देवदेवेशं प्रपन्नाः शरणैषिणः । पितामहं महाप्राज्ञं वध्यमानाः सुरेतरैः ॥ दैत्योंद्वारा सताये जानेवाले देवता दुःखी होकर अपने लिये आश्रय ढूँढ़ते हुए देवदेवेश्वर महाज्ञानी ब्रह्माजीकी शरणमें गये ।।

वैकुण्ठं शरणं देवं प्रतिपेदे च तैः सह ॥ तब ब्रह्माजी उन सबके साथ भगवान् विष्णुकी शरणमें गये ।।

ततः स देवैः सहितः पद्मयोनिरनेश्वर । तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणमनामयम् ॥ नरेश्वर! तदनन्तर देवताओंसहित कमलयोनि ब्रह्माजी हाथ जोड़कर रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणकी स्तुति करने लगे ।।

ब्रह्मोवाच

त्वद्रूपचिन्तनान्नाम्नां स्मरणादर्चनादपि । तपोयोगादिभिश्चैव श्रेयो यान्ति मनीषिणः ॥ **ब्रह्माजी बोले—**प्रभो! आपके रूपका चिन्तन करनेसे, नामोंके स्मरण और जपसे, पूजनसे तथा तप और योग आदिसे मनीषी पुरुष कल्याणको प्राप्त होते हैं ।।

भक्तवत्सल पद्माक्ष परमेश्वर पापहन् ।