भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1338, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1338

भगवन् देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते । लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने कहा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! लौकिक और वैदिक यज्ञको उत्तम बताया जाता है। अतः इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता । यज्ञा वेदेष्वधीताश्च वेदा ब्राह्मणसंयुताः ॥ **श्रीमहेश्वर बोले—**देवि! देवताओंकी जो पूजा है, वह यज्ञोंके ही अन्तर्गत है। यज्ञोंका वेदोंमें वर्णन है और वेद ब्राह्मणोंके साथ हैं ॥

इदं तु सकलं द्रव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये । यज्ञार्थं विद्धि तत् सृष्टं लोकानां हितकाम्यया ॥ प्रिये! स्वर्गलोकमें या पृथ्वीपर जो द्रव्य दृष्टि-गोचर होता है, इस सबकी सृष्टि विधाताद्वारा लोकहितकी कामनासे यज्ञके लिये की गयी है, ऐसा समझो ॥

एवं विज्ञाय तत् कर्ता सदारः सततं द्विजः । प्रेत्यभावे लभेल्लोकान् ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ऐसा समझकर जो द्विज सदा अपनी स्त्रीके साथ रहकर यज्ञ-कर्म करता है, वह ब्रह्मकर्ममें तत्पर रहनेके कारण मृत्युके पश्चात् पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥

ब्राह्मणेष्वेव तद् ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम् ॥ तस्माद् विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा । यज्ञकर्म कृतं सर्वं देवता अभितर्पयेत् ॥ देवि! वह ब्रह्म (वेद) सदा ब्राह्मणोंमें ही स्थित है, अतः शास्त्र-विधिके अनुसार ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ सम्पूर्ण यज्ञकर्म देवताओंको तृप्त करता है ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायशः स्मृताः ॥ अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितैः । सुशुद्धैर्यजमानैश्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधि ॥ शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः ॥ ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी उत्पत्ति प्रायः यज्ञके लिये ही मानी गयी है। शुद्ध यजमानों तथा ऋत्विजों-द्वारा किये गये वेदवर्णित अग्निष्टोम आदि यज्ञों एवं विशुद्ध द्रव्योपकरणोंसे यजन करना चाहिये, यह शास्त्रका निश्चय है ॥

तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत् । तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत् ॥