महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1339, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार किये गये यज्ञोंमें देवताओंको संतोष होता है और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानको यज्ञका पूरा-पूरा फल मिलता है ।।
देवाः संतोषिता यज्ञैर्लोकान् संवर्धयन्त्युत ।
यज्ञोंद्वारा संतुष्ट किये हुए देवता सम्पूर्ण लोकोंकी वृद्धि करते हैं ।।
तस्माद् यज्वा दिवं गत्वामरैः सह मोदते ।
नास्ति यज्ञसमं दानं नास्ति यज्ञसमो निधिः ।।
सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहितः ।
इसलिये यजमान स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। यज्ञके समान कोई दान नहीं है और यज्ञके समान कोई निधि नहीं है। देवि! सम्पूर्ण धर्मोंका उद्देश्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है ।।
एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु ।।
देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सवः ।।
यह यज्ञद्वारा की गयी देवपूजा वैदिकी है। इससे भिन्न जो दूसरी लौकिकी पूजा है, उसका वर्णन सुनो। देवताओंके सत्कारके लिये लोकमें समय-समयपर उत्सव किया जाता है ।।
देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै ।
यागान् देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि ।।
देवान् संतोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात् ।।
देवि! जो देवालयमें देवताका संस्कार करके उत्सव मनाता है और पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ एवं देवताओंको उपहार समर्पित करके उन्हें संतुष्ट करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त करता है ।।
गन्धमाल्यैश्च विविधैः परमान्नेन धूपनैः ।
बह्वीभिः स्तुतिभिश्चैव स्तुवद्भिः प्रयतैर्नरैः ।।
नृत्तैर्वाद्यैश्च गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलोभनैः ।
देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि ।।
तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिताः ।
तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे ।।
देवि! इस भूतपर जो मनुष्य देवताओंके सत्कारके उद्देश्यसे नाना प्रकारके गन्ध, माल्य, उत्तम अन्न, धूपदान तथा बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा स्तवन करते हैं और शुद्धचित्त हो नृत्य, वाद्य, गान तथा दृष्टिको लुभानेवाले अन्यान्य कार्यक्रमोंद्वारा देवाराधन करते हैं, उनके भक्तिजनित सत्कारसे ही पूजित हो देवता स्वर्गमें उतनेसे ही संतुष्ट हो जाते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)