भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1340, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1340

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[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]

उमोवाच

पितृमेधः कथं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।
सर्वेषां पितरः पूज्याः सर्वसम्पत्प्रदायिनः ॥
उमाने पूछा— देव! पितृमेध (श्राद्ध) कैसे किया जाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता पितर सभीके लिये पूजनीय होते हैं ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत् तन्मनाः शृणु ।
देशकालौ विधानं च तत्क्रियायाः शुभाशुभम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं पितृमेधका यथावद्रूपसे वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। देश, काल, विधान तथा क्रियाके शुभाशुभ फलका भी वर्णन करूँगा ॥

लोकेषु पितरः पूज्या देवतानां च देवताः ।
शुचयो निर्मलाः पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥
सभी लोकोंमें पितर पूजनीय होते हैं। वे देवताओंके भी देवता हैं। उनका स्वरूप शुद्ध, निर्मल एवं पवित्र है। वे दक्षिणदिशामें निवास करते हैं ॥

यथा वृष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठाः सर्वजन्तवः ।
पितरश्च तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ॥
शुभेक्षणे! जैसे भूमिपर रहनेवाले सभी प्राणी वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार पितृलोकमें रहनेवाले पितर श्राद्धकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥

तस्य देशाः कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा सरस्वती ।
प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्तं महाफलम् ॥
श्राद्धके लिये पवित्र देश हैं—कुरुक्षेत्र, गया, गङ्गा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर—इन तीर्थस्थानोंमें दिया गया श्राद्धका दान महान् फलदायक होता है ॥

तीर्थानि सरितः पुण्या विविक्तानि वनानि च ।
नदीनां पुलिनानीति देशाः श्राद्धस्य पूजिताः ॥
तीर्थ, पवित्र नदियाँ, एकान्त वन तथा नदियोंके तट—ये श्राद्धके लिये प्रशंसित देश हैं ॥

माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ ।
पक्षयोः कृष्णपक्षश्च पूर्वपक्षात् प्रशस्यते ॥