महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1345, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशृणु दत्तस्य वै देवि पञ्चधा फलकल्पनाम् । आनन्त्यं च महच्चैव समं हीनं हि पातकम् ॥ देवि! दानके फलकी पाँच प्रकारसे कल्पना की गयी है, उसको सुनो। अनन्त, महान्, सम, हीन और पाप—ये पाँच तरहके फल होते हैं।। तेषां विशेषं वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ॥ देवि! इन पाँचोंकी जो विशेषता है, उसे बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जिस धनका त्याग करना अत्यन्त कठिन हो, उसे सुपात्रको देना 'आनन्त्य' कहलाता है अर्थात् उस दानका फल अनन्त—अक्षय होता है।। दानं षड्गुणयुक्तं तु महदित्यभिधीयते । यथाश्रद्धं तु वै दानं यथार्हं सममुच्यते ॥ पूर्वोक्त छः गुणोंसे युक्त जो दान है, उसीको 'महान्' कहा गया है। जैसी अपनी श्रद्धा हो उसीके अनुसार यथायोग्य दान देना 'सम' कहलाता है।। गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम् । दानं पातकमित्याहुः षड्गुणानां विपर्यये ॥ गुणहीन दानको 'हीन' कहा गया है। यदि पूर्वोक्त छः गुणोंके विपरीत दान किया जाय तो वह 'पातक' रूप कहा गया है।। देवलोके महत् कालमानन्त्यस्य फलं विदुः । महत्तस्तु तथा कालं स्वर्गलोके तु पूज्यते ॥ आनन्त्य या 'अनन्त' नामक दानका फल देव-लोकमें दीर्घ कालतक भोगा जाता है। महद् दानका फल यह है कि मनुष्य स्वर्गलोकमें अधिक कालतक पूजित होता है।। समस्य तु तदा दानं मानुष्यं भोगमावहेत् । दानं निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ॥ सम-दान मनुष्यलोकका भोग प्रस्तुत करता है। शुभे! क्रियासे हीन दान निष्फल बताया गया है।। अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत् । नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानतः ॥ अथवा म्लेच्छ देशोंमें जन्म लेकर मनुष्य वहाँ उसका फल पाता है। अशुभदानसे पाप लगता है और उसका फल भोगनेके लिये वह दाता मृत्युके पश्चात् नरक या तिर्यक् योनियोंमें जाता है।।
उमोवाच
अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम् ।