भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1344, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1344

श्राद्ध करनेसे मनुष्य दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। वह बहुतसे पुत्र, सेवक तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ।।
श्राद्धदः स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम् ।
अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम् ।।
श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष विविध आकृतियोंवाले, निर्मल, रजोगुणरहित और अप्सराओंसे सेवित स्वर्गलोकमें निरन्तर निवास पाता है ।।
श्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिताः ।
तेषां पुष्टिं प्रजां चैव दास्यन्ति पितरः सदा ।।
जो पुष्टिकी इच्छा रखनेवाले पण्डित श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि एवं संतान प्रदान करते हैं ।।
धन्य यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुविनाशनम् ।
कुलसंधारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिणः ।।
मनीषी पुरुष श्राद्धको धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, शत्रुनाशक एवं कुलधारक बताते हैं ।।
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ।।
यत्सारस्तु नरो लोके तद् दानं चोत्तमं स्मृतम् ।
सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ।।
देवि! भामिनि! दानके फलका जो प्रमाण माना गया है, उसे सुनो। जगत्में मनुष्यके पास जो सार वस्तु है, उसका दान उसके लिये उत्तम माना गया है। शोभने! इस पृथ्वीपर उसीको सम्पूर्ण दानकी विधि कही गयी है ।।
प्रस्थं सारं दरिद्रस्य सारं कोटिधनस्य च ।
प्रस्थसारस्तु तत् प्रस्थं ददन्महदवाप्नुयात् ।।
कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्महदवाप्नुयात् ।
उभयं तन्महत् तच्च फलेनैव समं स्मृतम् ।।
दरिद्रका सार है सेरभर अन्न और जो करोड़पति है उसका सार है करोड़। जिसका सेरभर अनाज ही सार है, वह उसीका दान करके महान् फल प्राप्त कर लेता है और जिसका सार एक करोड़ मुद्रा है, वह उसीका दान कर दे तो महान् फलका भागी होता है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण दान हैं और दोनोंका फल महान् माना गया है ।।
धर्मार्थकामभोगेषु शक्त्यभावस्तु मध्यमम् ।
स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद् दानमधमं स्मृतम् ।।
धर्म, अर्थ और काम-भोगमें शक्तिका अभाव हो जाय और उस अवस्थामें कुछ दान किया जाय तो वह दान मध्यम कोटिका है और अपने धन एवं शक्तिसे अत्यन्त हीन कोटिका दान अधम माना गया है ।।