भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1343, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1343

सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजाः ।। इस विधिसे दिया हुआ पिण्डदान पितरोंके लिये अक्षय होता है। तत्पश्चात् मनको वशमें रखकर पवित्र हो यथाशक्ति दक्षिणा और सामग्री देकर ब्राह्मणोंकी यथाशक्ति पूजा करे। जिससे वे संतुष्ट हो जायें ।।

यत्र तत् क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथः । नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत् ।। जहाँ यह श्राद्ध या पूजन किया जाता है, वहाँ न तो कुछ बोले और न आपसमें ही कुछ दूसरी बात करे। वाणी और शरीरको संयममें रखकर श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।।

ततो निर्वपने वृत्ते तान् पिण्डांस्तदनन्तरम् । ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ।। पिण्डदानका कार्य पूर्ण हो जानेपर उन पिण्डोंको ब्राह्मण, अग्नि, बकरा अथवा गौ भक्षण कर ले या उन्हें जलमें डाल दिया जाय ।।

पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामा हि प्राशयेत् । आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् ।। यदि श्राद्धकर्ताकी पत्नीको पुत्रकी कामना हो, तो वह मध्यम पिण्ड अर्थात् पितामहको अर्पित किये हुए पिण्डको खा ले और प्रार्थना करे कि 'पितरो! आपलोग मेरे गर्भमें कमलोंकी मालासे अलंकृत एक सुन्दर कुमारकी स्थापना करें' ।।

तृप्तानुत्थाप्य तान् विप्रानन्नशेषं निवेदयेत् । तच्छेषं बहुभिः पश्चात् सभृत्यो भक्षयेन्नरः ।। जब ब्राह्मणलोग भोजन करके तृप्त हो जायें, तब उन्हें उठाकर शेष अन्न दूसरोंको निवेदन करे। तत्पश्चात् बहुत-से लोगोंके साथ मनुष्य भृत्यवर्गसहित शेष अन्नका स्वयं भोजन करे ।।

एष प्रोक्तः समासेन पितृयज्ञः सनातनः । पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात् ।। यह सनातन पितृयज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया गया। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ताको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।।

अहन्यहनि वा कुर्यान्मासे मासेऽथवा पुनः । संवत्सरं द्विः कुर्याच्च चतुर्वापि स्वशक्तितः ।। मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन, प्रतिमास, सालमें दो बार अथवा चार बार भी श्राद्ध करे ।।

दीर्घायुश्च भवेत् स्वस्थः पितृमेधेन वा पुनः । सपुत्रो बहुभृत्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।।