महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजाः ।। इस विधिसे दिया हुआ पिण्डदान पितरोंके लिये अक्षय होता है। तत्पश्चात् मनको वशमें रखकर पवित्र हो यथाशक्ति दक्षिणा और सामग्री देकर ब्राह्मणोंकी यथाशक्ति पूजा करे। जिससे वे संतुष्ट हो जायें ।।
यत्र तत् क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथः । नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत् ।। जहाँ यह श्राद्ध या पूजन किया जाता है, वहाँ न तो कुछ बोले और न आपसमें ही कुछ दूसरी बात करे। वाणी और शरीरको संयममें रखकर श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।।
ततो निर्वपने वृत्ते तान् पिण्डांस्तदनन्तरम् । ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ।। पिण्डदानका कार्य पूर्ण हो जानेपर उन पिण्डोंको ब्राह्मण, अग्नि, बकरा अथवा गौ भक्षण कर ले या उन्हें जलमें डाल दिया जाय ।।
पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामा हि प्राशयेत् । आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् ।। यदि श्राद्धकर्ताकी पत्नीको पुत्रकी कामना हो, तो वह मध्यम पिण्ड अर्थात् पितामहको अर्पित किये हुए पिण्डको खा ले और प्रार्थना करे कि 'पितरो! आपलोग मेरे गर्भमें कमलोंकी मालासे अलंकृत एक सुन्दर कुमारकी स्थापना करें' ।।
तृप्तानुत्थाप्य तान् विप्रानन्नशेषं निवेदयेत् । तच्छेषं बहुभिः पश्चात् सभृत्यो भक्षयेन्नरः ।। जब ब्राह्मणलोग भोजन करके तृप्त हो जायें, तब उन्हें उठाकर शेष अन्न दूसरोंको निवेदन करे। तत्पश्चात् बहुत-से लोगोंके साथ मनुष्य भृत्यवर्गसहित शेष अन्नका स्वयं भोजन करे ।।
एष प्रोक्तः समासेन पितृयज्ञः सनातनः । पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात् ।। यह सनातन पितृयज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया गया। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ताको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।।
अहन्यहनि वा कुर्यान्मासे मासेऽथवा पुनः । संवत्सरं द्विः कुर्याच्च चतुर्वापि स्वशक्तितः ।। मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन, प्रतिमास, सालमें दो बार अथवा चार बार भी श्राद्ध करे ।।
दीर्घायुश्च भवेत् स्वस्थः पितृमेधेन वा पुनः । सपुत्रो बहुभृत्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।।
श्राद्ध करनेसे मनुष्य दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। वह बहुतसे पुत्र, सेवक तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ।।
श्राद्धदः स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम् ।
अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम् ।।
श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष विविध आकृतियोंवाले, निर्मल, रजोगुणरहित और अप्सराओंसे सेवित स्वर्गलोकमें निरन्तर निवास पाता है ।।
श्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिताः ।
तेषां पुष्टिं प्रजां चैव दास्यन्ति पितरः सदा ।।
जो पुष्टिकी इच्छा रखनेवाले पण्डित श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि एवं संतान प्रदान करते हैं ।।
धन्य यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुविनाशनम् ।
कुलसंधारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिणः ।।
मनीषी पुरुष श्राद्धको धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, शत्रुनाशक एवं कुलधारक बताते हैं ।।
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ।।
यत्सारस्तु नरो लोके तद् दानं चोत्तमं स्मृतम् ।
सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ।।
देवि! भामिनि! दानके फलका जो प्रमाण माना गया है, उसे सुनो। जगत्में मनुष्यके पास जो सार वस्तु है, उसका दान उसके लिये उत्तम माना गया है। शोभने! इस पृथ्वीपर उसीको सम्पूर्ण दानकी विधि कही गयी है ।।
प्रस्थं सारं दरिद्रस्य सारं कोटिधनस्य च ।
प्रस्थसारस्तु तत् प्रस्थं ददन्महदवाप्नुयात् ।।
कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्महदवाप्नुयात् ।
उभयं तन्महत् तच्च फलेनैव समं स्मृतम् ।।
दरिद्रका सार है सेरभर अन्न और जो करोड़पति है उसका सार है करोड़। जिसका सेरभर अनाज ही सार है, वह उसीका दान करके महान् फल प्राप्त कर लेता है और जिसका सार एक करोड़ मुद्रा है, वह उसीका दान कर दे तो महान् फलका भागी होता है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण दान हैं और दोनोंका फल महान् माना गया है ।।
धर्मार्थकामभोगेषु शक्त्यभावस्तु मध्यमम् ।
स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद् दानमधमं स्मृतम् ।।
धर्म, अर्थ और काम-भोगमें शक्तिका अभाव हो जाय और उस अवस्थामें कुछ दान किया जाय तो वह दान मध्यम कोटिका है और अपने धन एवं शक्तिसे अत्यन्त हीन कोटिका दान अधम माना गया है ।।
शृणु दत्तस्य वै देवि पञ्चधा फलकल्पनाम् । आनन्त्यं च महच्चैव समं हीनं हि पातकम् ॥ देवि! दानके फलकी पाँच प्रकारसे कल्पना की गयी है, उसको सुनो। अनन्त, महान्, सम, हीन और पाप—ये पाँच तरहके फल होते हैं।। तेषां विशेषं वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ॥ देवि! इन पाँचोंकी जो विशेषता है, उसे बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जिस धनका त्याग करना अत्यन्त कठिन हो, उसे सुपात्रको देना 'आनन्त्य' कहलाता है अर्थात् उस दानका फल अनन्त—अक्षय होता है।। दानं षड्गुणयुक्तं तु महदित्यभिधीयते । यथाश्रद्धं तु वै दानं यथार्हं सममुच्यते ॥ पूर्वोक्त छः गुणोंसे युक्त जो दान है, उसीको 'महान्' कहा गया है। जैसी अपनी श्रद्धा हो उसीके अनुसार यथायोग्य दान देना 'सम' कहलाता है।। गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम् । दानं पातकमित्याहुः षड्गुणानां विपर्यये ॥ गुणहीन दानको 'हीन' कहा गया है। यदि पूर्वोक्त छः गुणोंके विपरीत दान किया जाय तो वह 'पातक' रूप कहा गया है।। देवलोके महत् कालमानन्त्यस्य फलं विदुः । महत्तस्तु तथा कालं स्वर्गलोके तु पूज्यते ॥ आनन्त्य या 'अनन्त' नामक दानका फल देव-लोकमें दीर्घ कालतक भोगा जाता है। महद् दानका फल यह है कि मनुष्य स्वर्गलोकमें अधिक कालतक पूजित होता है।। समस्य तु तदा दानं मानुष्यं भोगमावहेत् । दानं निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ॥ सम-दान मनुष्यलोकका भोग प्रस्तुत करता है। शुभे! क्रियासे हीन दान निष्फल बताया गया है।। अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत् । नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानतः ॥ अथवा म्लेच्छ देशोंमें जन्म लेकर मनुष्य वहाँ उसका फल पाता है। अशुभदानसे पाप लगता है और उसका फल भोगनेके लिये वह दाता मृत्युके पश्चात् नरक या तिर्यक् योनियोंमें जाता है।।
उमोवाच
अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम् ।
उमाने पूछा- भगवन्! अशुभदानका भी फल शुभ कैसे होता है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मनसा तत्त्वतः शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम् ।
प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ।।
श्रीमहेश्वरने कहा- प्रिये! जो दान शुद्ध हृदयसे अर्थात् निष्काम भावसे दिये जानेके
कारण तत्त्वतः शुद्ध हो, जिसमें क्रूरताका अभाव हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह शुभ
फल देनेवाला है। सभी प्रकारके दानोंको प्रसन्नताके साथ देकर दाता शुभ फलका भागी
होता है ।।
रहस्यं सर्वदानानामेतद् विद्धि शुभेक्षणे ।
अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्भिः कृतानि च ।।
शुभेक्षणे! इसीको तुम सम्पूर्ण दानोंका रहस्य समझो। अब सत्पुरुषोंद्वारा किये गये
अन्य धर्म-कार्योंका वर्णन सुनो ।।
आरामदेवगोष्ठानि संक्रमाः कूप एव च ।
गोवाटश्च तटाकश्च सभा शाला च सर्वशः ।।
पाषण्डावसथश्चैव पानीयं गोतृणानि च ।
व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम् ।।
अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशोधनम् ।
व्यसनाभ्यवपत्तिश्च सर्वेषां च स्वशक्तितः ।।
एतत् सर्वं समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम् ।
तत् कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्त्या श्रद्धया शुभे ।।
बगीचा लगाना, देवस्थान बनाना, पुल और कुआँका निर्माण करना, गोशाला, पोखरा,
धर्मशाला, सबके लिये घर, पाखण्डीतकको भी आश्रय देना, पानी पिलाना, गौओंको घास
देना, रोगियोंके लिये दवा और पथ्यकी व्यवस्था करना, अनाथ बालकोंका पालन-पोषण
करना, अनाथ मुर्दोंका दाह-संस्कार कराना, तीर्थ-मार्गका शोधन करना, अपनी शक्तिके
अनुसार सभीके संकटोंको दूर करनेका प्रयत्न करना-यह सब संक्षेपसे धर्मकार्य बताया
गया। शुभे! मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक यह धर्मकार्य करना चाहिये ।।
प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा ।
रूपं सौभाग्यमारोग्यं बलं सौख्यं लभेन्नरः ।।
स्वर्गे वा मानुषे वापि तैस्तैराप्यायते हि सः ।।
यह सब करनेसे मृत्युके पश्चात् मनुष्यको पुण्य प्राप्त होता है, इसमें विचार करनेकी
आवश्यकता नहीं है। वह धर्मात्मा पुरुष रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है।
वह स्वर्गलोकमें रहे या मनुष्यलोकमें, उन-उन पुण्यफलोंसे तृप्त होता रहता है ।।
उमोवाच भगवल्लोँकपालेश धर्मस्तु कतिभेदकः । दृश्यते परितः सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने कहा— भगवन्! लोकपालेश्वर! धर्मके कितने भेद हैं? साधु पुरुष सब ओर उसके कितने भेद देखते हैं? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच स्मृतिधर्मश्च बहुधा सद्भिदाचार इष्यते ॥ देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च । जातिधर्माश्च वै धर्मा गणधर्माश्च शोभने ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— स्मृतिकथित धर्म अनेक प्रकारका है। श्रेष्ठ पुरुषोंको आचार-धर्म अभीष्ट होता है। शोभने! देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म तथा समुदाय-धर्म भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥ शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते । एतद् धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभिः ॥ शरीर और कालकी विषमतासे आपद्धर्म भी देखा जाता है। इस जगत्में रहनेवाले मनुष्य ही धर्मके ये नाना भेद करते हैं ॥ तत्कारणसमायोगे लभेत् कुर्वन् फलं नरः ॥ कारणका संयोग होनेपर धर्माचरण करनेवाला मनुष्य उस धर्मके फलको प्राप्त करता है ॥ श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्रकृतो धर्म उच्यते । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ धर्मोंमें जो श्रौत (वेद-कथित) और स्मार्त (स्मृति-कथित) धर्म है, उसे प्रकृत धर्म कहते हैं। देवि! इस प्रकार तुम्हें धर्मकी बात बतायी गयी है। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका
[प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]
उमोवाच
मानुषेष्वेव जीवत्सु गतिर्विज्ञायते न वा । यथा शुभगतिर्जीवन् नासौ त्वशुभभागिति ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने पूछा—प्रभो! मनुष्योंके जीते-जी उनकी गतिका ज्ञान होता है या नहीं? शुभगतिवाले मनुष्यका जैसा जीवन है, वैसा ही अशुभ गतिवालेका नहीं हो सकता। इस विषयको मैं सुनना चाहती हूँ, आप मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि जीवितं विद्यते यथा । द्विविधाः प्राणिनो लोके दैवासुरसमाश्रिताः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! प्राणियोंका जीवन जैसा होता है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। संसारमें दो प्रकारके प्राणी होते हैं—एक दैवभावके आश्रित और दूसरे आसुरभावके आश्रित ॥
मनसा कर्मणा वाचा प्रतिकूला भवन्ति ये । तादृशानासुरान् विद्धि मर्त्यांस्ते नरकालयाः ॥ जो मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके प्रतिकूल ही आचरण करते हैं, उनको आसुर समझो। उन्हें नरकमें निवास करना पड़ता है ॥
हिंस्राश्चोराश्च धूर्ताश्च परदाराभिमर्शकाः । नीचकर्मरता ये च शौचमङ्गलवर्जिताः ॥ शुचिविद्वेषिणः पापा लोकचारित्रदूषकाः । एवंयुक्तसमाचारा जीवन्तो नरकालयाः ॥ जो हिंसक, चोर, धूर्त, परस्त्रीगामी, नीचकर्म-परायण, शौच और मंगलाचारसे रहित, पवित्रतासे द्वेष रखनेवाले, पापी और लोगोंके चरित्रपर कलंक लगानेवाले हैं, ऐसे आचारवाले अर्थात् आसुरी स्वभाववाले मनुष्य जीते-जी ही नरकमें पड़े हुए हैं ॥
लोकोद्वेगकराश्चान्ये पशवश्च सरीसृपाः । वृक्षाः कण्टकिनो रूक्षास्तादृशान् विद्धि चासुरान् ॥ जो लोगोंको उद्वेगमें डालनेवाले पशु, साँप-बिच्छू आदि जन्तु तथा रूखे और कँटीले वृक्ष हैं, वे सब पहले आसुर स्वभावके मनुष्य ही थे, ऐसा समझो ॥
अपरान् देवपक्षांस्तु शृणु देवि समाहिता ।। मनोवाक्कर्मभिर्नित्यमनुकूला भवन्ति ये । तादृशानमरान् विद्धि ते नराः स्वर्गगामिनः ।। देवी! अब तुम एकाग्रचित्त होकर दूसरे देव-पक्षीय अर्थात् दैवी प्रकृतिवाले मनुष्योंका परिचय सुनो। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके अनुकूल होते हैं, ऐसे मनुष्योंको अमर (देवता) समझो। वे स्वर्गगामी होते हैं ।।
शौचार्जवपरा धीराः परार्थान् न हरन्ति ये । ये समाः सर्वभूतेषु ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो शौच और सरलतामें तत्पर तथा धीर हैं, जो दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करते हैं और समस्त प्राणियोंके प्रति समानभाव रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
धार्मिकाः शौचसम्पन्नाः शुक्ला मधुरवादिनः । नाकार्यं मनसेच्छन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो धार्मिक, शौचाचारसम्पन्न, शुद्ध और मधुरभाषी होकर कभी मनसे भी न करने योग्य कार्य करना नहीं चाहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
दरिद्रा अपि ये केचिद् याचिताः प्रीतिपूर्वकम् । ददत्येव च यत् किंचित् ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो कोई दरिद्र होनेपर भी किसी याचकके माँगनेपर उसे प्रसन्नतापूर्वक कुछ-न-कुछ देते ही हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
आस्तिका मङ्गलपराः सततं वृद्धसेविनः । पुण्यकर्मपरा नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो आस्तिक, मंगलपरायण, सदा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेवाले और प्रतिदिन पुण्यकर्ममें संलग्न रहनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
निर्ममा निरहंकाराः सानुक्रोशाः स्वबन्धुषु । दीनानुकम्पिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो ममता और अहंकारसे शून्य, अपने बन्धुजनोंपर अनुग्रह रखनेवाले और सदा दीनोंपर दया करनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
स्वदुःखमिव मन्यन्ते परेषां दुःखवेदनम् । गुरुशुश्रूषणपरा देवब्राह्मणपूजकाः ।। कृतज्ञाः कृतविद्याश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो दूसरोंकी दुःख-वेदनाको अपने दुःखके समान ही मानते हैं, गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते हैं, देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, कृतज्ञ तथा विद्वान् हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
जितेन्द्रिया जितक्रोधा जितमानमदास्तथा ।
लोभमात्सर्यहीना ये ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
शक्त्या चाभ्यवपद्यन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो जितेन्द्रिय, क्रोधपर विजय पानेवाले और मान तथा मदको परास्त करनेवाले हैं तथा जिनमें लोभ और मात्सर्यका अभाव है, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं; जो यथाशक्ति परोपकारमें तत्पर रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
व्रतिनो दानशीलाश्च धर्मशीलाश्च मानवाः ।
ऋजवो मृदवो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो व्रती, दानशील, धर्मशील, सरल और सदा कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेवाले हैं, वे मनुष्य सदा स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
ऐहिकेन तु वृत्तेन पारत्रमनुमीयते ।
एवंविधा नरा लोके जीवन्तः स्वर्गगामिनः ।।
इस लोकके आचारसे परलोकमें प्राप्त होनेवाली गतिका अनुमान किया जाता है। जगत्में ऐसा जीवन बितानेवाले मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
यदन्यच्च शुभं लोके प्रजानुग्रहकारि च ।
पशवश्चैव वृक्षाश्च प्रजानां हितकारिणः ।।
तादृशान् देवपक्षस्थानिति विद्धि शुभानने ।।
लोकमें और भी जो शुभ एवं प्रजापर अनुग्रह करनेवाला कर्म है, वह स्वर्गकी प्राप्तिका साधन है। शुभानने! जो प्रजाका हित करनेवाले पशु एवं वृक्ष हैं, उन सबको देवपक्षीय जानो ।।
शुभाशुभमयं लोके सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।
दैवं शुभमिति प्राहुरसुरं चाशुभं प्रिये ।।
जगत्में सारा चराचरसमुदाय शुभाशुभमय है। प्रिये! इनमें जो शुभ है, उसे दैव और जो अशुभ है, उसे आसुर समझो ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचित् कालधर्ममुपस्थिताः ।
प्राणमोक्षं कथं कृत्वा परत्र हितमाप्नुयुः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! जो कोई मनुष्य मृत्युके निकट पहुँचे हुए हैं, वे किस प्रकार अपने प्राणोंका परित्याग करें, जिससे परलोकमें उन्हें कल्याणकी प्राप्ति हो? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ।
द्विविधं मरणं लोके स्वभावाद् यत्नस्तथा ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इस विषयका वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। लोकमें दो प्रकारकी मृत्यु होती है, एक स्वाभाविक और दूसरी यत्नसाध्य ।।
तयोः स्वभावं नापायं यत्नतः करणोद्भवम् ।
एतयोरुभयोर्देवि विधानं शृणु शोभने ।।
देवि! इन दोनोंमें जो स्वाभाविक मृत्यु है, वह अटल है, उसमें कोई बाधा नहीं है। परंतु जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह साधनसामग्रीद्वारा सम्भव होती है। शोभने! इन दोनोंमें जो विधान है, वह मुझसे सुनो ।।
कल्याकल्यशरीरस्य यत्नजं द्विविधं स्मृतम् ।
यत्नजं नाम मरणमात्मत्यागो मुमूर्षया ।।
जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह समर्थ और असमर्थ शरीरसे सम्बन्ध रखनेके कारण दो प्रकारकी मानी गयी है। मरनेकी इच्छासे जो जान-बूझकर अपने शरीरका परित्याग किया जाता है, उसीका नाम है यत्नसाध्य मृत्यु ।।
तत्राकल्यशरीरस्य जरा व्याधिश्च कारणम् ।
महाप्रस्थानगमनं तथा प्रायोपवेशनम् ।।
जलावगाहनं चैव अग्निचित्याप्रवेशनम् ।
एवं चतुर्विधः प्रोक्त आत्मत्यागो मुमूर्षताम् ।।
जो असमर्थ शरीरसे युक्त है अर्थात् बुढ़ापेके कारण या रोगके कारण असमर्थ हो गया है, उसकी मृत्युमें कारण है महाप्रस्थानगमन, आमरण उपवास, जलमें प्रवेश अथवा चिताकी आगमें जल मरना। यह चार प्रकारका देहत्याग बताया गया है, जिसे मरनेकी इच्छावाले पुरुष करते हैं ।।
एतेषां क्रमयोगेन विधानं शृणु शोभने ।।
स्वधर्मयुक्तं गार्हस्थ्यं चिरमूढ्वा विधानतः ।
तत्रानृण्यं च सम्प्राप्य वृद्धो वा व्याधितोऽपि वा ।।
दर्शयित्वा स्वदौर्बल्यं सर्वानैवानुमान्य च ।
सर्वं विहाय बन्धूंश्च कर्मणां भरणं तथा ।।
दानानि विधिवत् कृत्वा धर्मकार्यार्थमात्मनः ।
अनुज्ञाप्य जनं सर्वं वाचा मधुरया ब्रुवन् ।।
अहतं वस्त्रमाच्छाद्य बद्ध्वा तत् कुशरज्जुना ।
उपस्पृश्य प्रतिज्ञाय व्यवसायपुरस्सरम् ।।
परित्यज्य ततो ग्राम्यं धर्मं कुर्याद् यथेप्सितम् ।।
शोभने! अब क्रमशः इनकी विधि सुनो—मनुष्य स्वधर्मयुक्त गार्हस्थ्य-आश्रमका दीर्घकालतक विधिपूर्वक निर्वाह करके उससे उऋण हो वृद्ध अथवा रोगी हो जानेपर अपनी
दुर्बलता दिखा सभी लोगोंसे गृहत्यागके लिये अनुमति ले फिर समस्त भाई-बन्धुओं और
कर्मानुष्ठानोंका त्याग करके अपने धर्मकार्यके लिये विधिवत् दान करनेके पश्चात् मीठी
वाणी बोलकर सब लोगोंसे आज्ञा ले नूतन वस्त्र धारण करके उसे कुशकी रस्सीसे बाँध ले।
इसके बाद आचमनपूर्वक दृढ़ निश्चयके साथ आत्मत्यागकी प्रतिज्ञा करके ग्राम्यधर्मको
छोड़कर इच्छानुसार कार्य करे ।।
महाप्रस्थानमिच्छेच्चेत् प्रतिष्ठेतोत्तरां दिशम् ।।
भूत्वा तावन्निराहारो यावत् प्राणविमोक्षणम् ।
चेष्टाहानौ शयित्वापि तन्मनाः प्राणमुत्सृजेत् ।।
एवं पुण्यकृतां लोकानमलान् प्रतिपद्यते ।।
यदि महाप्रस्थानकी इच्छा हो तो निराहार रहकर जबतक प्राण निकल न जायँ तबतक
उत्तर दिशाकी ओर निरन्तर प्रस्थान करे। जब शरीर निश्चेष्ट हो जाय, तब वहीं सोकर उस
परमेश्वरमें मन लगाकर प्राणोंका परित्याग कर दे। ऐसा करनेसे वह पुण्यात्माओंके निर्मल
लोकोंको प्राप्त होता है ।।
प्रायोपवेशनं चेच्छेत् तेनैव विधिना नरः ।
देशे पुण्यतमे श्रेष्ठे निराहारस्तु संविशेत् ।।
यदि मनुष्य प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करना चाहे तो पूर्वोक्त विधिसे ही घर
छोड़कर परम पवित्र श्रेष्ठतम देशमें निराहार होकर बैठ जाय ।।
आप्राणान्तं शुचिर्भूत्वा कुर्वन् दानं स्वशक्तितः ।
हरिं स्मरंस्त्यजेत् प्राणानेष धर्मः सनातनः ।।
जबतक प्राणोंका अन्त न हो तबतक शुद्ध होकर अपनी शक्तिके अनुसार दान करते
हुए भगवान्के स्मरण-पूर्वक प्राणोंका परित्याग करे। यह सनातन धर्म है ।।
एवं कलेवरं त्यक्त्वा स्वर्गलोके महीयते ।।
अग्निप्रवेशनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे ।
कृत्वा काष्ठमयं चित्यं पुण्यक्षेत्रे नदीषु वा ।।
दैवतेभ्यो नमस्कृत्या कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
भूत्वा शुचिर्व्यवसितः स्मरन् नारायणं हरिम् ।।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्या प्रविशेदग्निसंस्तरम् ।।
शुभे! इस प्रकार शरीरका त्याग करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि
मनुष्य अग्निमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे विदा लेकर किसी पुण्यक्षेत्रमें अथवा
नदियोंके तटपर काठकी चिता बनावे। फिर देवताओंको नमस्कार और परिक्रमा करके
शुद्ध एवं दृढ़निश्चयसे युक्त हो श्रीनारायण हरिका स्मरण करते हुए ब्राह्मणोंको मस्तक
नवाकर उस प्रज्वलित चिताग्निमें प्रवेश कर जाय ।।
सोऽपि लोकान् यथान्यायं प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ।।
जलावगाहनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे । ख्याते पुण्यतमे तीर्थे निमज्जेत् सुकृतं स्मरन् ॥ सोऽपि पुण्यतमाँल्लोकान् निसर्गात् प्रतिपद्यते ॥ ऐसा पुरुष भी यथोचितरूपसे उक्त कार्य करके पुण्यात्माओंके लोक प्राप्त कर लेता है। शुभे! यदि कोई जलमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे किसी विख्यात पवित्रतम तीर्थमें पुण्यका चिन्तन करते हुए डूब जाय। ऐसा मनुष्य भी स्वभावतः पुण्यतम लोकोंमें जाता है ॥
ततः कल्यशरीरस्य संत्यागं शृणु तत्त्वतः ॥ रक्षार्थं क्षत्रियस्येष्टः प्रजापालनकारणात् ॥ योधानां भर्तृपिण्डार्थं गुर्वर्थं ब्रह्मचारिणाम् । गोब्राह्मणार्थं सर्वेषां प्राणत्यागो विधीयते ॥ इसके बाद समर्थ शरीरवाले पुरुषके आत्मत्यागकी तात्त्विक विधि बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियके लिये दीन-दुःखियोंकी रक्षा और प्रजापालनके निमित्त प्राणत्याग अभीष्ट बताया गया है। योद्धा अपने स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये, ब्रह्मचारी गुरुके हितके लिये तथा सब लोग गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंको निछावर कर दें, यह शास्त्रका विधान है ॥
स्वराज्यरक्षणार्थं वा कुनृपैः पीडिताः प्रजाः । मोक्तुकामस्त्यजेत् प्राणान् युद्धमार्गे यथाविधि ॥ राजा अपने राज्यकी रक्षाके लिये अथवा दुष्ट नरेशोंद्वारा पीड़ित हुई प्रजाको संकटसे छुड़ानेके लिये विधिपूर्वक युद्धके मार्गपर चलकर प्राणोंका परित्याग करे ॥
सुसन्नद्धो व्यवसितः सम्प्रविश्यापराङ्मुखः ॥ एवं राजा मृतः सद्यः स्वर्गलोके महीयते । तादृशी सुगतिर्नास्ति क्षत्रियस्य विशेषतः ॥ जो राजा कवच बाँधकर मनमें दृढ़ निश्चय ले युद्धमें प्रवेश करके पीठ नहीं दिखाता और शत्रुओंका सामना करता हुआ मारा जाता है, वह तत्काल स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। सामान्यतः सबके लिये और विशेषतः क्षत्रियके लिये वैसी उत्तम गति दूसरी नहीं है ॥
भृत्यो वा भर्तृपिण्डार्थं भर्तृकर्मण्युपस्थिते । कुर्वंस्तत्र तु साहाय्यमात्मप्राणानपेक्षया ॥ स्वाम्यर्थं संत्यजेत् प्राणान् पुण्याँल्लोकान् स गच्छति । स्पृहणीयः सुरगणैस्तत्र नास्ति विचारणा ॥ जो भृत्य स्वामीके अन्नका बदला देनेके लिये उनका कार्य उपस्थित होनेपर अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उनकी सहायता करता है और स्वामीके लिये प्राण त्याग देता है, वह
देवसमूहोंके लिये स्पृहणीय हो पुण्यलोकोंमें जाता है। इस विषयमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ एवं गोब्राह्मणार्थं वा दीनार्थं वा त्यजेत् तनुम् । सोऽपि पुण्यमवाप्नोति आनृशंस्यव्यपेक्षया ॥ इत्येते जीवितत्यागे मार्गास्ते समुदाहृताः ॥ इस प्रकार जो गौओं, ब्राह्मणों तथा दीन-दुःखियोंकी रक्षाके लिये शरीरका त्याग करता है, वह भी दयाधर्मको अपनानेके कारण पुण्यलोकोंमें जाता है। इस तरह ये प्राणत्यागके समुचित मार्ग तुम्हें बताये गये हैं ॥ कामात् क्रोधाद् भयाद् वापि यदि चेत् संत्यजेत् तनुम् । सोऽनन्तं नरकं याति आत्महन्तृत्वकारणात् ॥ यदि कोई काम, क्रोध अथवा भयसे शरीरका त्याग करे तो वह आत्महत्या करनेके कारण अनन्त नरकमें जाता है ॥ स्वभावं मरणं नाम न तु चात्मेच्छया भवेत् । यथा मृतानां यत् कार्यं तन्मे शृणु यथाविधि ॥ स्वाभाविक मृत्यु वह है, जो अपनी इच्छासे नहीं होती, स्वतः प्राप्त हो जाती है। उसमें जिस प्रकार मरे हुए लोगोंके लिये जो कर्तव्य है, वह मुझसे विधिपूर्वक सुनो ॥ तत्रापि मरणं त्यागो मूढत्यागाद् विशिष्यते । भूमौ संवेशयेद् देहं नरस्य विनशिष्यतः ॥ निर्जीवं वृणुयात् सद्यो वाससा तु कलेवरम् । माल्यगन्धैरलङ्कृत्य सुवर्णेन च भामिनि ॥ श्मशाने दक्षिणे देशे चिताग्नौ प्रदहेन्मृतम् । अथवा निक्षिपेद् भूमौ शरीरं जीववर्जितम् ॥ उसमें भी जो मरण या त्याग होता है, वह किसी मूर्खके देहत्यागसे बढ़कर है। मरनेवाले मनुष्यके शरीरको पृथ्वीपर लिटा देना चाहिये और जब प्राण निकल जाय, तब तत्काल उसके शरीरको नूतन वस्त्रसे ढक देना चाहिये। भामिनि! फिर उसे माला, गन्ध और सुवर्णसे अलंकृत करके श्मशान-भूमिमें दक्षिण दिशाकी ओर चिताकी आगमें उस शवको जला देना चाहिये। अथवा निर्जीव शरीरको वहाँ भूमिपर ही डाल दे ॥ दिवा च शुक्लपक्षश्च उत्तरायणमेव च । मुमूर्षूणां प्रशस्तानि विपरीतं तु गर्हितम् ॥ दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणका समय मुमूर्षुओंके लिये उत्तम है। इसके विपरीत रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन निन्दित हैं ॥ औदकं चाष्टकाश्राद्धं बहुभिर्बहुभिः कृतम् । आप्यायनं मृतानां तत् परलोके भवेच्छुभम् ॥
एतत् सर्वं मया प्रोक्तं मानुषाणां हितं वचः ॥ बहुत-से पुरुषोंद्वारा किया गया जलदान और अष्टकाश्राद्ध परलोकमें मृत पुरुषोंको तृप्त करनेवाला और शुभ होता है। यह सब मैंने मनुष्योंके लिये हितकारक बात बतायी है॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]
[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]
उमोवाच
देवदेव नमस्तेऽस्तु कालसूदन शंकर ।
लोकेषु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्मया श्रुताः ॥
विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यः शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
**उमाने कहा—**देवदेव! कालसूदन शंकर! आपको नमस्कार है। आपकी कृपासे मैंने अनेक प्रकारके धर्म सुने। अब यह बताइये कि सम्पूर्ण धर्मोंसे श्रेष्ठ, सनातन, अटल और अविनाशी धर्म क्या है? ।।
नारद उवाच
एवं पृष्टस्तया देव्या महादेवः पिनाकधृक् ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं सूक्ष्ममध्यात्मसंश्रितम् ॥
**नारदजीने कहा—**देवी पार्वतीके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी महादेवजीने सूक्ष्म अध्यात्मभावसे युक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि निश्चयम् ।
एतदेव विशिष्टं ते यत् त्वं पृच्छसि मां प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वर बोले—**महाभागे! तुमने न्यायतः सुननेकी निश्चित इच्छा प्रकट की है, प्रिये! तुम मुझसे जो पूछती हो, यही तुम्हारा विशिष्ट गुण है ।।
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गलोकफलाश्रितः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥
सर्वत्र स्वर्गलोकरूपी फलके आश्रयभूत धर्मका विधान किया गया है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं और उसकी कोई क्रिया यहाँ निष्फल नहीं होती ।।
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
तं तमेवाभिजानाति नान्यं धर्मं शुचिस्मिते ॥
शुचिस्मिते! जो-जो जिस-जिस विषयमें निश्चयको प्राप्त होता है, वह-वह उसी-उसीको धर्म समझता है, दूसरेको नहीं ।।
शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम् ।
एतद्धि सर्वधर्माणां विशिष्टं शुभमव्ययम् ॥
देवि! अब तुम संक्षेपसे परम उत्तम मोक्ष-द्वारका वर्णन सुनो। यही सब धर्मोंमें उत्तम, शुभ और अविनाशी है ।।
नास्ति मोक्षात् परं देवि नास्ति मोक्षात् परा गतिः ।
सुखमात्यन्तिकं श्रेष्ठमनिवृत्तं च तद् विदुः ॥
देवि! मोक्षसे उत्तम कोई तत्त्व नहीं है और मोक्षसे श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। ज्ञानी पुरुष मोक्षको कभी निवृत्त न होनेवाला, श्रेष्ठ एवं आत्यन्तिक सुख मानते हैं॥
नात्र देवि जरा मृत्युः शोको वा दुःखमेव वा ।
अनुत्तममचिन्त्यं च तद् देवि परमं सुखम् ॥
देवि! इसमें जरा, मृत्यु, शोक अथवा दुःख नहीं है। वह सर्वोत्तम अचिन्त्य परम सुख है॥
ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानं मोक्षज्ञानं विदुर्बुधाः ।
ऋषिभिर्देवसङ्घैश्च प्रोच्यते परमं पदम् ॥
विद्वान् पुरुष मोक्षज्ञानको सब ज्ञानोंमें उत्तम मानते हैं। ऋषि और देवसमुदाय उसे परमपद कहते हैं॥
नित्यमक्षरमक्षोभ्यमजेयं शाश्वतं शिवम् ।
विशन्ति तत् पदं प्राज्ञाः स्पृहणीयं सुरासुरैः ॥
नित्य, अविनाशी, अक्षोभ्य, अजेय, शाश्वत और शिवस्वरूप वह मोक्षपद देवताओं और असुरोंके लिये भी स्पृहणीय है। ज्ञानी पुरुष उसमें प्रवेश करते हैं॥
दुःखादिश्च दुरन्तश्च संसारोऽयं प्रकीर्तितः ।
शोकव्याधिजरादोषैर्मरणेन च संयुतः ॥
यह संसार आदि और अन्तमें दुःखमय कहा गया है। यह शोक, व्याधि, जरा और मृत्युके दोषोंसे युक्त है॥
यथा ज्योतिर्गणा व्योम्नि निवर्तन्ते पुनः पुनः ।
एवं जीवा अमी लोके निवर्तन्ते पुनः पुनः ॥
तस्य मोक्षस्य मार्गोऽयं श्रूयतां शुभलक्षणे ॥
ब्रह्मादिस्थावरान्तश्च संसारो यः प्रकीर्तितः ।
संसारे प्राणिनः सर्वे निवर्तन्ते यथा पुनः ॥
जैसे आकाशमें नक्षत्रगण बारंबार आते और निवृत्त हो जाते हैं, उसी प्रकार ये जीव लोकमें बारंबार लौटते रहते हैं। शुभलक्षणे! उसके मोक्षका यह मार्ग सुनो। ब्रह्माजीसे लेकर स्थावर वृक्षोंतक जो संसार बताया गया है, इसमें सभी प्राणी बारंबार लौटते हैं॥
तत्र संसारचक्रस्य मोक्षो ज्ञानेन दृश्यते ।
अध्यात्मतत्त्वविज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते ॥
ज्ञानस्य ग्रहणोपायमाचारं ज्ञानिनस्तथा ।
यथावत् सम्प्रवक्ष्यामि तत् त्वमेकमनाः शृणु ॥
वहाँ संसार-चक्रका ज्ञानके द्वारा मोक्ष देखा जाता है। अध्यात्मतत्त्वको अच्छी तरह समझ लेना ही ज्ञान कहलाता है। प्रिये! उस ज्ञानको ग्रहण करनेका जो उपाय है तथा ज्ञानीका जो आचार है, उसका मैं यथावत् रूपसे वर्णन करूँगा। तुम एकचित्त होकर इसे सुनो।।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि भूत्वा पूर्वं गृहे स्थितः । आनृण्यं सर्वतः प्राप्य ततस्तान् संत्यजेद् गृहान् ।। ततः संत्यज्य गार्हस्थ्यं निश्चितो वनमाश्रयेत् ।। वने गुरुं समाज्ञाय दीक्षितो विधिपूर्वकम् । दीक्षां प्राप्य यथान्यायं स्ववृत्तं परिपालयेत् ।। गृह्णीयादप्युपाध्यायान्मोक्षज्ञानमनिन्दितः । द्विविधं च पुनर्मोक्षं सांख्यं योगमिति स्मृतिः ।।
ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पहले घरमें स्थित रहकर सब प्रकारके ऋणोंसे उऋण हो अन्तमें उन घरोंका परित्याग कर दे। इस तरह गार्हस्थ्य-आश्रमको त्यागकर वह निश्चितरूपसे वनका आश्रय ले। वनमें गुरुकी आज्ञा ले विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षा पाकर यथोचित रीतिसे अपने सदाचारका पालन करे। तदनन्तर गुरुसे मोक्षज्ञानको ग्रहण करे और अनिन्द्य आचरणसे रहे। मोक्ष भी दो प्रकारका है—एक सांख्य-साध्य और दूसरा योग-साध्य। ऐसा शास्त्रका कथन है ।।
पञ्चविंशतिविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते । ऐश्वर्यं देवसारूप्यं योगशास्त्रस्य निर्णयः ।। तयोरन्यतरं ज्ञानं शृणुयाच्छिष्यतां गतः । नाकालो नाप्यकाषायी नाप्यसंवत्सरोषितः । नासांख्ययोगो नाश्रद्धं गुरुणा स्नेहपूर्वकम् ।।
पचीस तत्त्वोंका ज्ञान सांख्य कहलाता है। अणिमा आदि ऐश्वर्य और देवताओंके समान रूप—यह योग-शास्त्रका निर्णय है। इन दोनोंमेंसे किसी एक ज्ञानका शिष्यभावसे श्रवण करे। न तो असमयमें, न गेरुआ वस्त्र धारण किये बिना, न एक वर्षतक गुरुकी सेवामें रहे बिना, न सांख्य या योगमेंसे किसीको अपनाये बिना और न श्रद्धाके बिना ही गुरुका स्नेहपूर्वक उपदेश ग्रहण करे ।।
समः शीतोष्णहर्षादीन् विषहेत स वै मुनिः ।। अमृष्यः क्षुत्पिपासाभ्यामुचितेभ्यो निवर्तयेत् । त्यजेत् संकल्पजान् ग्रन्थीन् सदा ध्यानपरो भवेत् ।। कुण्डिकां चमसं शिक्यं छत्रं यष्टिमुपानहौ । चैलमित्येव नैतेषु स्थापयेत् स्वाम्यमात्मनः ।। गुरोः पूर्वं समुत्तिष्ठेज्जघन्यं तस्य संविशेत् ।
नैवाविज्ञाप्य भर्तारमावश्यकमपि व्रजेत् ॥ द्विरह्नि स्नानशाटेन संध्ययोरभिषेचनम् । एककालाशनं चास्य विहितं यतिभिः पुरा ॥ जो सर्वत्र समान भाव रखते हुए सर्दी-गर्मी और हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंको सहन करे, वही मुनि है। भूख-प्यासके वशीभूत न हो, उचित भोगोंसे भी अपने मनको हटा ले, संकल्पजनित ग्रन्थियोंको त्याग दे और सदा ध्यानमें तत्पर रहे। कुंडी, चमस (प्याली), छींका, छाता, लाठी, जूता और वस्त्र—इन वस्तुओंमें भी अपना स्वामित्व स्थापित न करे। गुरुसे पहले उठे और उनसे पीछे सोवे। स्वामी (गुरु) को सूचित किये बिना किसी आवश्यक कार्यके लिये भी न जाय। प्रतिदिन दिनमें दो बार दोनों संध्याओंके समय वस्त्रसहित स्नान करे। उसके लिये चौबीस घंटेमें एक समय भोजनका विधान है। पूर्वकालके यतियोंने ऐसा ही किया है ॥
भैक्षं सर्वत्र गृह्णीयाच्चिन्तयेत् सततं निशि । कारणे चापि सम्प्राप्ते न कुप्येत कदाचन ॥ सर्वत्र भिक्षा ग्रहण करे, रातमें सदा परमात्माका चिन्तन करे, कोपका कारण प्राप्त होनेपर भी कभी कुपित न हो ॥
ब्रह्मचर्यं वने वासः शौचमिन्द्रियसंयमः । दया च सर्वभूतेषु तस्य धर्मः सनातनः ॥ ब्रह्मचर्य, वनवास, पवित्रता, इन्द्रियसंयम और समस्त प्राणियोंपर दया—यह संन्यासीका सनातन धर्म है ॥
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । आत्मयुक्तः परां बुद्धिं लभते पापनाशिनीम् ॥ वह समस्त पापोंसे दूर रहकर हल्का भोजन करे, इन्द्रियोंको संयममें रखे और परमात्मचिन्तनमें लगा रहे। इससे उसे पापनाशिनी श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त होती है ॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ अनिष्ठुरोऽनहङ्कारो निर्द्वन्द्वो वीतमत्सरः । वीतशोकभयाबाधः पदं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी समलोष्टाश्मकाञ्चनः । समः शत्रौ च मित्रे च निर्वाणमधिगच्छति ॥ जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापभाव नहीं करता, तब वह यति ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। निष्ठुरताशून्य, अहंकाररहित, द्वन्द्वातीत और मात्सर्यहीन यति शोक, भय और बाधासे रहित हो सर्वोत्तम ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। जिसकी दृष्टिमें निन्दा
और स्तुति समान है, जो मौन रहता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा जिसका शत्रु और मित्रके प्रति समभाव है, वह निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।।
एवंयुक्तसमाचारस्तत्परोऽध्यात्मचिन्तकः ।
ज्ञानाभ्यासेन तेनैव प्राप्नोति परमां गतिम् ।।
ऐसे आचरणसे युक्त, तत्पर और अध्यात्मचिन्तनशील यति उसी ज्ञानाभ्याससे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ।।
अनुद्विग्नमतेर्जन्तोरस्मिन् संसारमण्डले ।
शोकव्याधिजरादुःखैर्निर्वाणं नोपपद्यते ।।
तस्मादुद्वेगजननं मनोऽवस्थापनं तथा ।
ज्ञानं ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्मूलममृतं हि वै ।।
इस संसार-मण्डलमें जिस प्राणीकी बुद्धि उद्वेगशून्य है, वह शोक, व्याधि और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो निर्वाणको प्राप्त होता है। इसलिये संसारसे वैराग्य उत्पन्न करानेवाले और मनको स्थिर रखनेवाले ज्ञानका तुम्हारे लिये उपदेश करूँगा; क्योंकि अमृत (मोक्ष) का मूल कारण ज्ञान ही है ।।
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।।
शोकके सहस्रों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे मूर्ख मनुष्यपर ही प्रतिदिन प्रभाव डालते हैं, विद्वान्पर नहीं ।।
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्य पदमाव्रजेत् ।।
धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तो ‘अहो! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ गया।' ऐसा सोचता हुआ मनुष्य शोकके आश्रयमें आ जाता है ।।
द्रव्येषु समतीतेषु ये शुभास्तान् न चिन्तयेत् ।
ताननाद्रियमाणस्य शोकबन्धः प्रणश्यति ।।
किसी भी द्रव्यके नष्ट हो जानेपर जो उसके शुभ गुण हैं, उनका चिन्तन न करे। उन गुणोंका आदर न करनेवाले पुरुषके शोकका बन्धन नष्ट हो जाता है ।।
सम्प्रयोगादनिष्टस्य विप्रयोगात् प्रियस्य च ।
मानुषा मानसैर्दुःखैः संयुज्यन्तेऽल्पबुद्धयः ।।
अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग प्राप्त होनेपर अल्पबुद्धि मनुष्य मानसिक दुःखोंसे संयुक्त हो जाते हैं ।।
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति ।
संतापेन च युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ।।
उत्पन्नमिह मानुष्ये गर्भप्रभृति मानवम् ।
विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥
जो मरे हुए पुरुष या खोयी हुई वस्तुके लिये शोक करता है, वह केवल संतापका भागी होता है। उसका वह दुःख मिटता नहीं है। मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए मानवके पास गर्भावस्थासे ही नाना प्रकारके दुःख और सुख आते रहते हैं॥
तयोरेकतरो मार्गो यद्येनमभिसंनमेत् ।
सुखं प्राप्य न संहृष्येन्न दुःखं प्राप्य संज्वरेत् ॥
उनमेंसे कोई एक मार्ग यदि इसे प्राप्त हो तो यह मनुष्य सुख पाकर हर्ष न करे और दुःख पाकर चिन्तित न हो ।।
दोषदर्शी भवेत् तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते ।
अनिष्टेनान्वितं पश्येद् यथा क्षिप्रं विरज्यते ॥
जहाँ आसक्ति हो रही हो, वहाँ दोष देखना चाहिये। उस वस्तुको अनिष्टकी दृष्टिसे देखे, जिससे उसकी ओरसे शीघ्र ही वैराग्य हो जाय ।।
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वज्ज्ञातिसमागमः ॥
जैसे महासागरमें दो काठ इधर-उधरसे आकर मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार जाति-भाइयोंका समागम होता है ।।
अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः ।
स्नेहस्तत्र न कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवः ॥
सब लोग अदृश्य स्थानसे आये थे और पुनः अदृश्य स्थानको चले गये। उनके प्रति स्नेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि उनके साथ वियोग होना निश्चित था ।।
कुटुम्बपुत्रदाराश्च शरीरं धनसंचयः ।
ऐश्वर्यं स्वस्थता चेति न मुह्येत् तत्र पण्डितः ॥
सुखमेकान्ततो नास्ति शक्रस्यापि त्रिविष्टपे ।
तत्रापि सुमहद् दुःखं सुखमल्पतरं भवेत् ॥
कुटुम्ब, पुत्र, स्त्री, शरीर, धनसंचय, ऐश्वर्य और स्वस्थता—इनके प्रति विद्वान् पुरुषको आसक्त नहीं होना चाहिये। स्वर्गमें रहनेवाले देवराज इन्द्रको भी केवल सुख-ही-सुख नहीं मिलता। वहाँ भी दुःख अधिक और सुख बहुत कम है ।।
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ।
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ॥
किसीको भी न तो सदा दुःख मिलता है और न सदा सुख ही मिलता है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता रहता है ।।
क्षयान्ता निचयाः सर्वे पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥
उच्छ्रयान् विनिपातांश्च दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः स्वयम् ।
अनित्यमसुखं चेति व्यवस्येत् सर्वमेव च ॥
सारे संग्रहोंका अन्त विनाश है, सारी उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है। उत्थान और पतनको स्वयं ही प्रत्यक्ष देखकर यह निश्चय करे कि यहाँका सब कुछ अनित्य और दुःखरूप है ॥
अर्थानामार्जने दुःखमर्जितानां तु रक्षणे ।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थं दुःखभाजनम् ॥
धनके उपार्जनमें दुःख होता है, उपार्जित हुए धनकी रक्षामें दुःख होता है, धनके नाश और व्ययमें भी दुःख होता है, इस प्रकार दुःखके भाजन बने हुए धनको धिक्कार है ॥
अर्थवन्तं नरं नित्यं पञ्चाभिघ्नन्ति शत्रवः ।
राजा चोरश्च दायादा भूतानि क्षय एव च ॥
अर्थमेवमनर्थस्य मूलमित्यवधारय ।
न ह्यनर्थाः प्रबाधन्ते नरमर्थविवर्जितम् ॥
धनवान् मनुष्यपर सदा पाँच शत्रु चोट करते रहते हैं—राजा, चोर, उत्तराधिकारी भाई-बन्धु, अन्यान्य प्राणी तथा क्षय। प्रिये! इस प्रकार तुम अर्थको अनर्थका मूल समझो। धनरहित पुरुषको अनर्थ बाधा नहीं देते हैं ॥
अर्थप्राप्तिर्महद् दुःखमाकिंचन्यं परं सुखम् ।
उपद्रवेषु चार्थानां दुःखं हि नियतं भवेत् ॥
धनकी प्राप्ति महान् दुःख है और अकिंचनता (निर्धनता) परम सुख है; क्योंकि जब धनपर उपद्रव आते हैं, तब निश्चय ही बड़ा दुःख होता है ॥
धनलोभेन तृष्णाया न तृप्तिरुपलभ्यते ।
लब्धाश्रयो विवर्धेत समिद्ध इव पावकः ॥
धनके लोभसे तृष्णाकी कभी तृप्ति नहीं होती है। तृष्णा या लोभको आश्रय मिल जाय तो प्रज्वलित अग्निके समान उसकी वृद्धि होने लगती है ॥
जित्वापि पृथिवीं कृत्स्नां चतुःसागरमेखलाम् ।
सागराणां पुनः पारं जेतुमिच्छत्यसंशयम् ॥
चारों समुद्र जिसकी मेखला है, उस सारी पृथिवीको जीतकर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। वह फिर समुद्रके पारवाले देशोंको भी जीतनेकी इच्छा करता है, इसमें संशय नहीं है ॥
अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः ।
कोशकारः कृमिर्देवि बध्यते हि परिग्रहात् ॥
परिग्रह (संग्रह) से यहाँ कोई लाभ नहीं; क्योंकि परिग्रह दोषसे भरा हुआ है। देवि! रेशमका कीड़ा परिग्रहसे ही बन्धनको प्राप्त होता है ॥