भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1348, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1348

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[प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]

उमोवाच

मानुषेष्वेव जीवत्सु गतिर्विज्ञायते न वा । यथा शुभगतिर्जीवन् नासौ त्वशुभभागिति ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने पूछा—प्रभो! मनुष्योंके जीते-जी उनकी गतिका ज्ञान होता है या नहीं? शुभगतिवाले मनुष्यका जैसा जीवन है, वैसा ही अशुभ गतिवालेका नहीं हो सकता। इस विषयको मैं सुनना चाहती हूँ, आप मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि जीवितं विद्यते यथा । द्विविधाः प्राणिनो लोके दैवासुरसमाश्रिताः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! प्राणियोंका जीवन जैसा होता है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। संसारमें दो प्रकारके प्राणी होते हैं—एक दैवभावके आश्रित और दूसरे आसुरभावके आश्रित ॥

मनसा कर्मणा वाचा प्रतिकूला भवन्ति ये । तादृशानासुरान् विद्धि मर्त्यांस्ते नरकालयाः ॥ जो मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके प्रतिकूल ही आचरण करते हैं, उनको आसुर समझो। उन्हें नरकमें निवास करना पड़ता है ॥

हिंस्राश्चोराश्च धूर्ताश्च परदाराभिमर्शकाः । नीचकर्मरता ये च शौचमङ्गलवर्जिताः ॥ शुचिविद्वेषिणः पापा लोकचारित्रदूषकाः । एवंयुक्तसमाचारा जीवन्तो नरकालयाः ॥ जो हिंसक, चोर, धूर्त, परस्त्रीगामी, नीचकर्म-परायण, शौच और मंगलाचारसे रहित, पवित्रतासे द्वेष रखनेवाले, पापी और लोगोंके चरित्रपर कलंक लगानेवाले हैं, ऐसे आचारवाले अर्थात् आसुरी स्वभाववाले मनुष्य जीते-जी ही नरकमें पड़े हुए हैं ॥

लोकोद्वेगकराश्चान्ये पशवश्च सरीसृपाः । वृक्षाः कण्टकिनो रूक्षास्तादृशान् विद्धि चासुरान् ॥ जो लोगोंको उद्वेगमें डालनेवाले पशु, साँप-बिच्छू आदि जन्तु तथा रूखे और कँटीले वृक्ष हैं, वे सब पहले आसुर स्वभावके मनुष्य ही थे, ऐसा समझो ॥