महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपरान् देवपक्षांस्तु शृणु देवि समाहिता ।। मनोवाक्कर्मभिर्नित्यमनुकूला भवन्ति ये । तादृशानमरान् विद्धि ते नराः स्वर्गगामिनः ।। देवी! अब तुम एकाग्रचित्त होकर दूसरे देव-पक्षीय अर्थात् दैवी प्रकृतिवाले मनुष्योंका परिचय सुनो। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके अनुकूल होते हैं, ऐसे मनुष्योंको अमर (देवता) समझो। वे स्वर्गगामी होते हैं ।।
शौचार्जवपरा धीराः परार्थान् न हरन्ति ये । ये समाः सर्वभूतेषु ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो शौच और सरलतामें तत्पर तथा धीर हैं, जो दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करते हैं और समस्त प्राणियोंके प्रति समानभाव रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
धार्मिकाः शौचसम्पन्नाः शुक्ला मधुरवादिनः । नाकार्यं मनसेच्छन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो धार्मिक, शौचाचारसम्पन्न, शुद्ध और मधुरभाषी होकर कभी मनसे भी न करने योग्य कार्य करना नहीं चाहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
दरिद्रा अपि ये केचिद् याचिताः प्रीतिपूर्वकम् । ददत्येव च यत् किंचित् ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो कोई दरिद्र होनेपर भी किसी याचकके माँगनेपर उसे प्रसन्नतापूर्वक कुछ-न-कुछ देते ही हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
आस्तिका मङ्गलपराः सततं वृद्धसेविनः । पुण्यकर्मपरा नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो आस्तिक, मंगलपरायण, सदा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेवाले और प्रतिदिन पुण्यकर्ममें संलग्न रहनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
निर्ममा निरहंकाराः सानुक्रोशाः स्वबन्धुषु । दीनानुकम्पिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो ममता और अहंकारसे शून्य, अपने बन्धुजनोंपर अनुग्रह रखनेवाले और सदा दीनोंपर दया करनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
स्वदुःखमिव मन्यन्ते परेषां दुःखवेदनम् । गुरुशुश्रूषणपरा देवब्राह्मणपूजकाः ।। कृतज्ञाः कृतविद्याश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो दूसरोंकी दुःख-वेदनाको अपने दुःखके समान ही मानते हैं, गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते हैं, देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, कृतज्ञ तथा विद्वान् हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
जितेन्द्रिया जितक्रोधा जितमानमदास्तथा ।