महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1350, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोभमात्सर्यहीना ये ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
शक्त्या चाभ्यवपद्यन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो जितेन्द्रिय, क्रोधपर विजय पानेवाले और मान तथा मदको परास्त करनेवाले हैं तथा जिनमें लोभ और मात्सर्यका अभाव है, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं; जो यथाशक्ति परोपकारमें तत्पर रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
व्रतिनो दानशीलाश्च धर्मशीलाश्च मानवाः ।
ऋजवो मृदवो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो व्रती, दानशील, धर्मशील, सरल और सदा कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेवाले हैं, वे मनुष्य सदा स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
ऐहिकेन तु वृत्तेन पारत्रमनुमीयते ।
एवंविधा नरा लोके जीवन्तः स्वर्गगामिनः ।।
इस लोकके आचारसे परलोकमें प्राप्त होनेवाली गतिका अनुमान किया जाता है। जगत्में ऐसा जीवन बितानेवाले मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
यदन्यच्च शुभं लोके प्रजानुग्रहकारि च ।
पशवश्चैव वृक्षाश्च प्रजानां हितकारिणः ।।
तादृशान् देवपक्षस्थानिति विद्धि शुभानने ।।
लोकमें और भी जो शुभ एवं प्रजापर अनुग्रह करनेवाला कर्म है, वह स्वर्गकी प्राप्तिका साधन है। शुभानने! जो प्रजाका हित करनेवाले पशु एवं वृक्ष हैं, उन सबको देवपक्षीय जानो ।।
शुभाशुभमयं लोके सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।
दैवं शुभमिति प्राहुरसुरं चाशुभं प्रिये ।।
जगत्में सारा चराचरसमुदाय शुभाशुभमय है। प्रिये! इनमें जो शुभ है, उसे दैव और जो अशुभ है, उसे आसुर समझो ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचित् कालधर्ममुपस्थिताः ।
प्राणमोक्षं कथं कृत्वा परत्र हितमाप्नुयुः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! जो कोई मनुष्य मृत्युके निकट पहुँचे हुए हैं, वे किस प्रकार अपने प्राणोंका परित्याग करें, जिससे परलोकमें उन्हें कल्याणकी प्राप्ति हो? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ।
द्विविधं मरणं लोके स्वभावाद् यत्नस्तथा ।।