भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1351, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1351

**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इस विषयका वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। लोकमें दो प्रकारकी मृत्यु होती है, एक स्वाभाविक और दूसरी यत्नसाध्य ।।
तयोः स्वभावं नापायं यत्नतः करणोद्भवम् ।
एतयोरुभयोर्देवि विधानं शृणु शोभने ।।
देवि! इन दोनोंमें जो स्वाभाविक मृत्यु है, वह अटल है, उसमें कोई बाधा नहीं है। परंतु जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह साधनसामग्रीद्वारा सम्भव होती है। शोभने! इन दोनोंमें जो विधान है, वह मुझसे सुनो ।।
कल्याकल्यशरीरस्य यत्नजं द्विविधं स्मृतम् ।
यत्नजं नाम मरणमात्मत्यागो मुमूर्षया ।।
जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह समर्थ और असमर्थ शरीरसे सम्बन्ध रखनेके कारण दो प्रकारकी मानी गयी है। मरनेकी इच्छासे जो जान-बूझकर अपने शरीरका परित्याग किया जाता है, उसीका नाम है यत्नसाध्य मृत्यु ।।
तत्राकल्यशरीरस्य जरा व्याधिश्च कारणम् ।
महाप्रस्थानगमनं तथा प्रायोपवेशनम् ।।
जलावगाहनं चैव अग्निचित्याप्रवेशनम् ।
एवं चतुर्विधः प्रोक्त आत्मत्यागो मुमूर्षताम् ।।
जो असमर्थ शरीरसे युक्त है अर्थात् बुढ़ापेके कारण या रोगके कारण असमर्थ हो गया है, उसकी मृत्युमें कारण है महाप्रस्थानगमन, आमरण उपवास, जलमें प्रवेश अथवा चिताकी आगमें जल मरना। यह चार प्रकारका देहत्याग बताया गया है, जिसे मरनेकी इच्छावाले पुरुष करते हैं ।।
एतेषां क्रमयोगेन विधानं शृणु शोभने ।।
स्वधर्मयुक्तं गार्हस्थ्यं चिरमूढ्वा विधानतः ।
तत्रानृण्यं च सम्प्राप्य वृद्धो वा व्याधितोऽपि वा ।।
दर्शयित्वा स्वदौर्बल्यं सर्वानैवानुमान्य च ।
सर्वं विहाय बन्धूंश्च कर्मणां भरणं तथा ।।
दानानि विधिवत् कृत्वा धर्मकार्यार्थमात्मनः ।
अनुज्ञाप्य जनं सर्वं वाचा मधुरया ब्रुवन् ।।
अहतं वस्त्रमाच्छाद्य बद्ध्वा तत् कुशरज्जुना ।
उपस्पृश्य प्रतिज्ञाय व्यवसायपुरस्सरम् ।।
परित्यज्य ततो ग्राम्यं धर्मं कुर्याद् यथेप्सितम् ।।
शोभने! अब क्रमशः इनकी विधि सुनो—मनुष्य स्वधर्मयुक्त गार्हस्थ्य-आश्रमका दीर्घकालतक विधिपूर्वक निर्वाह करके उससे उऋण हो वृद्ध अथवा रोगी हो जानेपर अपनी