महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1352, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुर्बलता दिखा सभी लोगोंसे गृहत्यागके लिये अनुमति ले फिर समस्त भाई-बन्धुओं और
कर्मानुष्ठानोंका त्याग करके अपने धर्मकार्यके लिये विधिवत् दान करनेके पश्चात् मीठी
वाणी बोलकर सब लोगोंसे आज्ञा ले नूतन वस्त्र धारण करके उसे कुशकी रस्सीसे बाँध ले।
इसके बाद आचमनपूर्वक दृढ़ निश्चयके साथ आत्मत्यागकी प्रतिज्ञा करके ग्राम्यधर्मको
छोड़कर इच्छानुसार कार्य करे ।।
महाप्रस्थानमिच्छेच्चेत् प्रतिष्ठेतोत्तरां दिशम् ।।
भूत्वा तावन्निराहारो यावत् प्राणविमोक्षणम् ।
चेष्टाहानौ शयित्वापि तन्मनाः प्राणमुत्सृजेत् ।।
एवं पुण्यकृतां लोकानमलान् प्रतिपद्यते ।।
यदि महाप्रस्थानकी इच्छा हो तो निराहार रहकर जबतक प्राण निकल न जायँ तबतक
उत्तर दिशाकी ओर निरन्तर प्रस्थान करे। जब शरीर निश्चेष्ट हो जाय, तब वहीं सोकर उस
परमेश्वरमें मन लगाकर प्राणोंका परित्याग कर दे। ऐसा करनेसे वह पुण्यात्माओंके निर्मल
लोकोंको प्राप्त होता है ।।
प्रायोपवेशनं चेच्छेत् तेनैव विधिना नरः ।
देशे पुण्यतमे श्रेष्ठे निराहारस्तु संविशेत् ।।
यदि मनुष्य प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करना चाहे तो पूर्वोक्त विधिसे ही घर
छोड़कर परम पवित्र श्रेष्ठतम देशमें निराहार होकर बैठ जाय ।।
आप्राणान्तं शुचिर्भूत्वा कुर्वन् दानं स्वशक्तितः ।
हरिं स्मरंस्त्यजेत् प्राणानेष धर्मः सनातनः ।।
जबतक प्राणोंका अन्त न हो तबतक शुद्ध होकर अपनी शक्तिके अनुसार दान करते
हुए भगवान्के स्मरण-पूर्वक प्राणोंका परित्याग करे। यह सनातन धर्म है ।।
एवं कलेवरं त्यक्त्वा स्वर्गलोके महीयते ।।
अग्निप्रवेशनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे ।
कृत्वा काष्ठमयं चित्यं पुण्यक्षेत्रे नदीषु वा ।।
दैवतेभ्यो नमस्कृत्या कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
भूत्वा शुचिर्व्यवसितः स्मरन् नारायणं हरिम् ।।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्या प्रविशेदग्निसंस्तरम् ।।
शुभे! इस प्रकार शरीरका त्याग करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि
मनुष्य अग्निमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे विदा लेकर किसी पुण्यक्षेत्रमें अथवा
नदियोंके तटपर काठकी चिता बनावे। फिर देवताओंको नमस्कार और परिक्रमा करके
शुद्ध एवं दृढ़निश्चयसे युक्त हो श्रीनारायण हरिका स्मरण करते हुए ब्राह्मणोंको मस्तक
नवाकर उस प्रज्वलित चिताग्निमें प्रवेश कर जाय ।।
सोऽपि लोकान् यथान्यायं प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ।।