भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1353, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1353

जलावगाहनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे । ख्याते पुण्यतमे तीर्थे निमज्जेत् सुकृतं स्मरन् ॥ सोऽपि पुण्यतमाँल्लोकान् निसर्गात् प्रतिपद्यते ॥ ऐसा पुरुष भी यथोचितरूपसे उक्त कार्य करके पुण्यात्माओंके लोक प्राप्त कर लेता है। शुभे! यदि कोई जलमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे किसी विख्यात पवित्रतम तीर्थमें पुण्यका चिन्तन करते हुए डूब जाय। ऐसा मनुष्य भी स्वभावतः पुण्यतम लोकोंमें जाता है ॥

ततः कल्यशरीरस्य संत्यागं शृणु तत्त्वतः ॥ रक्षार्थं क्षत्रियस्येष्टः प्रजापालनकारणात् ॥ योधानां भर्तृपिण्डार्थं गुर्वर्थं ब्रह्मचारिणाम् । गोब्राह्मणार्थं सर्वेषां प्राणत्यागो विधीयते ॥ इसके बाद समर्थ शरीरवाले पुरुषके आत्मत्यागकी तात्त्विक विधि बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियके लिये दीन-दुःखियोंकी रक्षा और प्रजापालनके निमित्त प्राणत्याग अभीष्ट बताया गया है। योद्धा अपने स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये, ब्रह्मचारी गुरुके हितके लिये तथा सब लोग गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंको निछावर कर दें, यह शास्त्रका विधान है ॥

स्वराज्यरक्षणार्थं वा कुनृपैः पीडिताः प्रजाः । मोक्तुकामस्त्यजेत् प्राणान् युद्धमार्गे यथाविधि ॥ राजा अपने राज्यकी रक्षाके लिये अथवा दुष्ट नरेशोंद्वारा पीड़ित हुई प्रजाको संकटसे छुड़ानेके लिये विधिपूर्वक युद्धके मार्गपर चलकर प्राणोंका परित्याग करे ॥

सुसन्नद्धो व्यवसितः सम्प्रविश्यापराङ्मुखः ॥ एवं राजा मृतः सद्यः स्वर्गलोके महीयते । तादृशी सुगतिर्नास्ति क्षत्रियस्य विशेषतः ॥ जो राजा कवच बाँधकर मनमें दृढ़ निश्चय ले युद्धमें प्रवेश करके पीठ नहीं दिखाता और शत्रुओंका सामना करता हुआ मारा जाता है, वह तत्काल स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। सामान्यतः सबके लिये और विशेषतः क्षत्रियके लिये वैसी उत्तम गति दूसरी नहीं है ॥

भृत्यो वा भर्तृपिण्डार्थं भर्तृकर्मण्युपस्थिते । कुर्वंस्तत्र तु साहाय्यमात्मप्राणानपेक्षया ॥ स्वाम्यर्थं संत्यजेत् प्राणान् पुण्याँल्लोकान् स गच्छति । स्पृहणीयः सुरगणैस्तत्र नास्ति विचारणा ॥ जो भृत्य स्वामीके अन्नका बदला देनेके लिये उनका कार्य उपस्थित होनेपर अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उनकी सहायता करता है और स्वामीके लिये प्राण त्याग देता है, वह