भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1354, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1354

देवसमूहोंके लिये स्पृहणीय हो पुण्यलोकोंमें जाता है। इस विषयमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ एवं गोब्राह्मणार्थं वा दीनार्थं वा त्यजेत् तनुम् । सोऽपि पुण्यमवाप्नोति आनृशंस्यव्यपेक्षया ॥ इत्येते जीवितत्यागे मार्गास्ते समुदाहृताः ॥ इस प्रकार जो गौओं, ब्राह्मणों तथा दीन-दुःखियोंकी रक्षाके लिये शरीरका त्याग करता है, वह भी दयाधर्मको अपनानेके कारण पुण्यलोकोंमें जाता है। इस तरह ये प्राणत्यागके समुचित मार्ग तुम्हें बताये गये हैं ॥ कामात् क्रोधाद् भयाद् वापि यदि चेत् संत्यजेत् तनुम् । सोऽनन्तं नरकं याति आत्महन्तृत्वकारणात् ॥ यदि कोई काम, क्रोध अथवा भयसे शरीरका त्याग करे तो वह आत्महत्या करनेके कारण अनन्त नरकमें जाता है ॥ स्वभावं मरणं नाम न तु चात्मेच्छया भवेत् । यथा मृतानां यत् कार्यं तन्मे शृणु यथाविधि ॥ स्वाभाविक मृत्यु वह है, जो अपनी इच्छासे नहीं होती, स्वतः प्राप्त हो जाती है। उसमें जिस प्रकार मरे हुए लोगोंके लिये जो कर्तव्य है, वह मुझसे विधिपूर्वक सुनो ॥ तत्रापि मरणं त्यागो मूढत्यागाद् विशिष्यते । भूमौ संवेशयेद् देहं नरस्य विनशिष्यतः ॥ निर्जीवं वृणुयात् सद्यो वाससा तु कलेवरम् । माल्यगन्धैरलङ्कृत्य सुवर्णेन च भामिनि ॥ श्मशाने दक्षिणे देशे चिताग्नौ प्रदहेन्मृतम् । अथवा निक्षिपेद् भूमौ शरीरं जीववर्जितम् ॥ उसमें भी जो मरण या त्याग होता है, वह किसी मूर्खके देहत्यागसे बढ़कर है। मरनेवाले मनुष्यके शरीरको पृथ्वीपर लिटा देना चाहिये और जब प्राण निकल जाय, तब तत्काल उसके शरीरको नूतन वस्त्रसे ढक देना चाहिये। भामिनि! फिर उसे माला, गन्ध और सुवर्णसे अलंकृत करके श्मशान-भूमिमें दक्षिण दिशाकी ओर चिताकी आगमें उस शवको जला देना चाहिये। अथवा निर्जीव शरीरको वहाँ भूमिपर ही डाल दे ॥ दिवा च शुक्लपक्षश्च उत्तरायणमेव च । मुमूर्षूणां प्रशस्तानि विपरीतं तु गर्हितम् ॥ दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणका समय मुमूर्षुओंके लिये उत्तम है। इसके विपरीत रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन निन्दित हैं ॥ औदकं चाष्टकाश्राद्धं बहुभिर्बहुभिः कृतम् । आप्यायनं मृतानां तत् परलोके भवेच्छुभम् ॥