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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

देवसमूहोंके लिये स्पृहणीय हो पुण्यलोकोंमें जाता है। इस विषयमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ एवं गोब्राह्मणार्थं वा दीनार्थं वा त्यजेत् तनुम् । सोऽपि पुण्यमवाप्नोति आनृशंस्यव्यपेक्षया ॥ इत्येते जीवितत्यागे मार्गास्ते समुदाहृताः ॥ इस प्रकार जो गौओं, ब्राह्मणों तथा दीन-दुःखियोंकी रक्षाके लिये शरीरका त्याग करता है, वह भी दयाधर्मको अपनानेके कारण पुण्यलोकोंमें जाता है। इस तरह ये प्राणत्यागके समुचित मार्ग तुम्हें बताये गये हैं ॥ कामात् क्रोधाद् भयाद् वापि यदि चेत् संत्यजेत् तनुम् । सोऽनन्तं नरकं याति आत्महन्तृत्वकारणात् ॥ यदि कोई काम, क्रोध अथवा भयसे शरीरका त्याग करे तो वह आत्महत्या करनेके कारण अनन्त नरकमें जाता है ॥ स्वभावं मरणं नाम न तु चात्मेच्छया भवेत् । यथा मृतानां यत् कार्यं तन्मे शृणु यथाविधि ॥ स्वाभाविक मृत्यु वह है, जो अपनी इच्छासे नहीं होती, स्वतः प्राप्त हो जाती है। उसमें जिस प्रकार मरे हुए लोगोंके लिये जो कर्तव्य है, वह मुझसे विधिपूर्वक सुनो ॥ तत्रापि मरणं त्यागो मूढत्यागाद् विशिष्यते । भूमौ संवेशयेद् देहं नरस्य विनशिष्यतः ॥ निर्जीवं वृणुयात् सद्यो वाससा तु कलेवरम् । माल्यगन्धैरलङ्कृत्य सुवर्णेन च भामिनि ॥ श्मशाने दक्षिणे देशे चिताग्नौ प्रदहेन्मृतम् । अथवा निक्षिपेद् भूमौ शरीरं जीववर्जितम् ॥ उसमें भी जो मरण या त्याग होता है, वह किसी मूर्खके देहत्यागसे बढ़कर है। मरनेवाले मनुष्यके शरीरको पृथ्वीपर लिटा देना चाहिये और जब प्राण निकल जाय, तब तत्काल उसके शरीरको नूतन वस्त्रसे ढक देना चाहिये। भामिनि! फिर उसे माला, गन्ध और सुवर्णसे अलंकृत करके श्मशान-भूमिमें दक्षिण दिशाकी ओर चिताकी आगमें उस शवको जला देना चाहिये। अथवा निर्जीव शरीरको वहाँ भूमिपर ही डाल दे ॥ दिवा च शुक्लपक्षश्च उत्तरायणमेव च । मुमूर्षूणां प्रशस्तानि विपरीतं तु गर्हितम् ॥ दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणका समय मुमूर्षुओंके लिये उत्तम है। इसके विपरीत रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन निन्दित हैं ॥ औदकं चाष्टकाश्राद्धं बहुभिर्बहुभिः कृतम् । आप्यायनं मृतानां तत् परलोके भवेच्छुभम् ॥

एतत् सर्वं मया प्रोक्तं मानुषाणां हितं वचः ॥ बहुत-से पुरुषोंद्वारा किया गया जलदान और अष्टकाश्राद्ध परलोकमें मृत पुरुषोंको तृप्त करनेवाला और शुभ होता है। यह सब मैंने मनुष्योंके लिये हितकारक बात बतायी है॥

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]

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[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]

उमोवाच

देवदेव नमस्तेऽस्तु कालसूदन शंकर ।
लोकेषु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्मया श्रुताः ॥
विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यः शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
**उमाने कहा—**देवदेव! कालसूदन शंकर! आपको नमस्कार है। आपकी कृपासे मैंने अनेक प्रकारके धर्म सुने। अब यह बताइये कि सम्पूर्ण धर्मोंसे श्रेष्ठ, सनातन, अटल और अविनाशी धर्म क्या है? ।।

नारद उवाच

एवं पृष्टस्तया देव्या महादेवः पिनाकधृक् ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं सूक्ष्ममध्यात्मसंश्रितम् ॥
**नारदजीने कहा—**देवी पार्वतीके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी महादेवजीने सूक्ष्म अध्यात्मभावसे युक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि निश्चयम् ।
एतदेव विशिष्टं ते यत् त्वं पृच्छसि मां प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वर बोले—**महाभागे! तुमने न्यायतः सुननेकी निश्चित इच्छा प्रकट की है, प्रिये! तुम मुझसे जो पूछती हो, यही तुम्हारा विशिष्ट गुण है ।।
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गलोकफलाश्रितः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥
सर्वत्र स्वर्गलोकरूपी फलके आश्रयभूत धर्मका विधान किया गया है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं और उसकी कोई क्रिया यहाँ निष्फल नहीं होती ।।
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
तं तमेवाभिजानाति नान्यं धर्मं शुचिस्मिते ॥
शुचिस्मिते! जो-जो जिस-जिस विषयमें निश्चयको प्राप्त होता है, वह-वह उसी-उसीको धर्म समझता है, दूसरेको नहीं ।।
शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम् ।
एतद्धि सर्वधर्माणां विशिष्टं शुभमव्ययम् ॥
देवि! अब तुम संक्षेपसे परम उत्तम मोक्ष-द्वारका वर्णन सुनो। यही सब धर्मोंमें उत्तम, शुभ और अविनाशी है ।।

नास्ति मोक्षात् परं देवि नास्ति मोक्षात् परा गतिः ।
सुखमात्यन्तिकं श्रेष्ठमनिवृत्तं च तद् विदुः ॥
देवि! मोक्षसे उत्तम कोई तत्त्व नहीं है और मोक्षसे श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। ज्ञानी पुरुष मोक्षको कभी निवृत्त न होनेवाला, श्रेष्ठ एवं आत्यन्तिक सुख मानते हैं॥
नात्र देवि जरा मृत्युः शोको वा दुःखमेव वा ।
अनुत्तममचिन्त्यं च तद् देवि परमं सुखम् ॥
देवि! इसमें जरा, मृत्यु, शोक अथवा दुःख नहीं है। वह सर्वोत्तम अचिन्त्य परम सुख है॥

ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानं मोक्षज्ञानं विदुर्बुधाः ।
ऋषिभिर्देवसङ्घैश्च प्रोच्यते परमं पदम् ॥
विद्वान् पुरुष मोक्षज्ञानको सब ज्ञानोंमें उत्तम मानते हैं। ऋषि और देवसमुदाय उसे परमपद कहते हैं॥
नित्यमक्षरमक्षोभ्यमजेयं शाश्वतं शिवम् ।
विशन्ति तत् पदं प्राज्ञाः स्पृहणीयं सुरासुरैः ॥
नित्य, अविनाशी, अक्षोभ्य, अजेय, शाश्वत और शिवस्वरूप वह मोक्षपद देवताओं और असुरोंके लिये भी स्पृहणीय है। ज्ञानी पुरुष उसमें प्रवेश करते हैं॥
दुःखादिश्च दुरन्तश्च संसारोऽयं प्रकीर्तितः ।
शोकव्याधिजरादोषैर्मरणेन च संयुतः ॥
यह संसार आदि और अन्तमें दुःखमय कहा गया है। यह शोक, व्याधि, जरा और मृत्युके दोषोंसे युक्त है॥
यथा ज्योतिर्गणा व्योम्नि निवर्तन्ते पुनः पुनः ।
एवं जीवा अमी लोके निवर्तन्ते पुनः पुनः ॥
तस्य मोक्षस्य मार्गोऽयं श्रूयतां शुभलक्षणे ॥
ब्रह्मादिस्थावरान्तश्च संसारो यः प्रकीर्तितः ।
संसारे प्राणिनः सर्वे निवर्तन्ते यथा पुनः ॥
जैसे आकाशमें नक्षत्रगण बारंबार आते और निवृत्त हो जाते हैं, उसी प्रकार ये जीव लोकमें बारंबार लौटते रहते हैं। शुभलक्षणे! उसके मोक्षका यह मार्ग सुनो। ब्रह्माजीसे लेकर स्थावर वृक्षोंतक जो संसार बताया गया है, इसमें सभी प्राणी बारंबार लौटते हैं॥
तत्र संसारचक्रस्य मोक्षो ज्ञानेन दृश्यते ।
अध्यात्मतत्त्वविज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते ॥
ज्ञानस्य ग्रहणोपायमाचारं ज्ञानिनस्तथा ।
यथावत् सम्प्रवक्ष्यामि तत् त्वमेकमनाः शृणु ॥

वहाँ संसार-चक्रका ज्ञानके द्वारा मोक्ष देखा जाता है। अध्यात्मतत्त्वको अच्छी तरह समझ लेना ही ज्ञान कहलाता है। प्रिये! उस ज्ञानको ग्रहण करनेका जो उपाय है तथा ज्ञानीका जो आचार है, उसका मैं यथावत् रूपसे वर्णन करूँगा। तुम एकचित्त होकर इसे सुनो।।

ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि भूत्वा पूर्वं गृहे स्थितः । आनृण्यं सर्वतः प्राप्य ततस्तान् संत्यजेद् गृहान् ।। ततः संत्यज्य गार्हस्थ्यं निश्चितो वनमाश्रयेत् ।। वने गुरुं समाज्ञाय दीक्षितो विधिपूर्वकम् । दीक्षां प्राप्य यथान्यायं स्ववृत्तं परिपालयेत् ।। गृह्णीयादप्युपाध्यायान्मोक्षज्ञानमनिन्दितः । द्विविधं च पुनर्मोक्षं सांख्यं योगमिति स्मृतिः ।।

ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पहले घरमें स्थित रहकर सब प्रकारके ऋणोंसे उऋण हो अन्तमें उन घरोंका परित्याग कर दे। इस तरह गार्हस्थ्य-आश्रमको त्यागकर वह निश्चितरूपसे वनका आश्रय ले। वनमें गुरुकी आज्ञा ले विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षा पाकर यथोचित रीतिसे अपने सदाचारका पालन करे। तदनन्तर गुरुसे मोक्षज्ञानको ग्रहण करे और अनिन्द्य आचरणसे रहे। मोक्ष भी दो प्रकारका है—एक सांख्य-साध्य और दूसरा योग-साध्य। ऐसा शास्त्रका कथन है ।।

पञ्चविंशतिविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते । ऐश्वर्यं देवसारूप्यं योगशास्त्रस्य निर्णयः ।। तयोरन्यतरं ज्ञानं शृणुयाच्छिष्यतां गतः । नाकालो नाप्यकाषायी नाप्यसंवत्सरोषितः । नासांख्ययोगो नाश्रद्धं गुरुणा स्नेहपूर्वकम् ।।

पचीस तत्त्वोंका ज्ञान सांख्य कहलाता है। अणिमा आदि ऐश्वर्य और देवताओंके समान रूप—यह योग-शास्त्रका निर्णय है। इन दोनोंमेंसे किसी एक ज्ञानका शिष्यभावसे श्रवण करे। न तो असमयमें, न गेरुआ वस्त्र धारण किये बिना, न एक वर्षतक गुरुकी सेवामें रहे बिना, न सांख्य या योगमेंसे किसीको अपनाये बिना और न श्रद्धाके बिना ही गुरुका स्नेहपूर्वक उपदेश ग्रहण करे ।।

समः शीतोष्णहर्षादीन् विषहेत स वै मुनिः ।। अमृष्यः क्षुत्पिपासाभ्यामुचितेभ्यो निवर्तयेत् । त्यजेत् संकल्पजान् ग्रन्थीन् सदा ध्यानपरो भवेत् ।। कुण्डिकां चमसं शिक्यं छत्रं यष्टिमुपानहौ । चैलमित्येव नैतेषु स्थापयेत् स्वाम्यमात्मनः ।। गुरोः पूर्वं समुत्तिष्ठेज्जघन्यं तस्य संविशेत् ।

नैवाविज्ञाप्य भर्तारमावश्यकमपि व्रजेत् ॥ द्विरह्नि स्नानशाटेन संध्ययोरभिषेचनम् । एककालाशनं चास्य विहितं यतिभिः पुरा ॥ जो सर्वत्र समान भाव रखते हुए सर्दी-गर्मी और हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंको सहन करे, वही मुनि है। भूख-प्यासके वशीभूत न हो, उचित भोगोंसे भी अपने मनको हटा ले, संकल्पजनित ग्रन्थियोंको त्याग दे और सदा ध्यानमें तत्पर रहे। कुंडी, चमस (प्याली), छींका, छाता, लाठी, जूता और वस्त्र—इन वस्तुओंमें भी अपना स्वामित्व स्थापित न करे। गुरुसे पहले उठे और उनसे पीछे सोवे। स्वामी (गुरु) को सूचित किये बिना किसी आवश्यक कार्यके लिये भी न जाय। प्रतिदिन दिनमें दो बार दोनों संध्याओंके समय वस्त्रसहित स्नान करे। उसके लिये चौबीस घंटेमें एक समय भोजनका विधान है। पूर्वकालके यतियोंने ऐसा ही किया है ॥

भैक्षं सर्वत्र गृह्णीयाच्चिन्तयेत् सततं निशि । कारणे चापि सम्प्राप्ते न कुप्येत कदाचन ॥ सर्वत्र भिक्षा ग्रहण करे, रातमें सदा परमात्माका चिन्तन करे, कोपका कारण प्राप्त होनेपर भी कभी कुपित न हो ॥

ब्रह्मचर्यं वने वासः शौचमिन्द्रियसंयमः । दया च सर्वभूतेषु तस्य धर्मः सनातनः ॥ ब्रह्मचर्य, वनवास, पवित्रता, इन्द्रियसंयम और समस्त प्राणियोंपर दया—यह संन्यासीका सनातन धर्म है ॥

विमुक्तः सर्वपापेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । आत्मयुक्तः परां बुद्धिं लभते पापनाशिनीम् ॥ वह समस्त पापोंसे दूर रहकर हल्का भोजन करे, इन्द्रियोंको संयममें रखे और परमात्मचिन्तनमें लगा रहे। इससे उसे पापनाशिनी श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त होती है ॥

यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ अनिष्ठुरोऽनहङ्कारो निर्द्वन्द्वो वीतमत्सरः । वीतशोकभयाबाधः पदं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी समलोष्टाश्मकाञ्चनः । समः शत्रौ च मित्रे च निर्वाणमधिगच्छति ॥ जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापभाव नहीं करता, तब वह यति ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। निष्ठुरताशून्य, अहंकाररहित, द्वन्द्वातीत और मात्सर्यहीन यति शोक, भय और बाधासे रहित हो सर्वोत्तम ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। जिसकी दृष्टिमें निन्दा

और स्तुति समान है, जो मौन रहता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा जिसका शत्रु और मित्रके प्रति समभाव है, वह निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।।

एवंयुक्तसमाचारस्तत्परोऽध्यात्मचिन्तकः ।
ज्ञानाभ्यासेन तेनैव प्राप्नोति परमां गतिम् ।।
ऐसे आचरणसे युक्त, तत्पर और अध्यात्मचिन्तनशील यति उसी ज्ञानाभ्याससे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ।।

अनुद्विग्नमतेर्जन्तोरस्मिन् संसारमण्डले ।
शोकव्याधिजरादुःखैर्निर्वाणं नोपपद्यते ।।
तस्मादुद्वेगजननं मनोऽवस्थापनं तथा ।
ज्ञानं ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्मूलममृतं हि वै ।।
इस संसार-मण्डलमें जिस प्राणीकी बुद्धि उद्वेगशून्य है, वह शोक, व्याधि और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो निर्वाणको प्राप्त होता है। इसलिये संसारसे वैराग्य उत्पन्न करानेवाले और मनको स्थिर रखनेवाले ज्ञानका तुम्हारे लिये उपदेश करूँगा; क्योंकि अमृत (मोक्ष) का मूल कारण ज्ञान ही है ।।

शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।।
शोकके सहस्रों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे मूर्ख मनुष्यपर ही प्रतिदिन प्रभाव डालते हैं, विद्वान्पर नहीं ।।

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्य पदमाव्रजेत् ।।
धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तो ‘अहो! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ गया।' ऐसा सोचता हुआ मनुष्य शोकके आश्रयमें आ जाता है ।।

द्रव्येषु समतीतेषु ये शुभास्तान् न चिन्तयेत् ।
ताननाद्रियमाणस्य शोकबन्धः प्रणश्यति ।।
किसी भी द्रव्यके नष्ट हो जानेपर जो उसके शुभ गुण हैं, उनका चिन्तन न करे। उन गुणोंका आदर न करनेवाले पुरुषके शोकका बन्धन नष्ट हो जाता है ।।

सम्प्रयोगादनिष्टस्य विप्रयोगात् प्रियस्य च ।
मानुषा मानसैर्दुःखैः संयुज्यन्तेऽल्पबुद्धयः ।।
अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग प्राप्त होनेपर अल्पबुद्धि मनुष्य मानसिक दुःखोंसे संयुक्त हो जाते हैं ।।

मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति ।
संतापेन च युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ।।
उत्पन्नमिह मानुष्ये गर्भप्रभृति मानवम् ।

विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥
जो मरे हुए पुरुष या खोयी हुई वस्तुके लिये शोक करता है, वह केवल संतापका भागी होता है। उसका वह दुःख मिटता नहीं है। मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए मानवके पास गर्भावस्थासे ही नाना प्रकारके दुःख और सुख आते रहते हैं॥
तयोरेकतरो मार्गो यद्येनमभिसंनमेत् ।
सुखं प्राप्य न संहृष्येन्न दुःखं प्राप्य संज्वरेत् ॥
उनमेंसे कोई एक मार्ग यदि इसे प्राप्त हो तो यह मनुष्य सुख पाकर हर्ष न करे और दुःख पाकर चिन्तित न हो ।।
दोषदर्शी भवेत् तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते ।
अनिष्टेनान्वितं पश्येद् यथा क्षिप्रं विरज्यते ॥
जहाँ आसक्ति हो रही हो, वहाँ दोष देखना चाहिये। उस वस्तुको अनिष्टकी दृष्टिसे देखे, जिससे उसकी ओरसे शीघ्र ही वैराग्य हो जाय ।।
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वज्ज्ञातिसमागमः ॥
जैसे महासागरमें दो काठ इधर-उधरसे आकर मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार जाति-भाइयोंका समागम होता है ।।
अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः ।
स्नेहस्तत्र न कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवः ॥
सब लोग अदृश्य स्थानसे आये थे और पुनः अदृश्य स्थानको चले गये। उनके प्रति स्नेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि उनके साथ वियोग होना निश्चित था ।।
कुटुम्बपुत्रदाराश्च शरीरं धनसंचयः ।
ऐश्वर्यं स्वस्थता चेति न मुह्येत् तत्र पण्डितः ॥
सुखमेकान्ततो नास्ति शक्रस्यापि त्रिविष्टपे ।
तत्रापि सुमहद् दुःखं सुखमल्पतरं भवेत् ॥
कुटुम्ब, पुत्र, स्त्री, शरीर, धनसंचय, ऐश्वर्य और स्वस्थता—इनके प्रति विद्वान् पुरुषको आसक्त नहीं होना चाहिये। स्वर्गमें रहनेवाले देवराज इन्द्रको भी केवल सुख-ही-सुख नहीं मिलता। वहाँ भी दुःख अधिक और सुख बहुत कम है ।।
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ।
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ॥
किसीको भी न तो सदा दुःख मिलता है और न सदा सुख ही मिलता है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता रहता है ।।
क्षयान्ता निचयाः सर्वे पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥

उच्छ्रयान् विनिपातांश्च दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः स्वयम् ।
अनित्यमसुखं चेति व्यवस्येत् सर्वमेव च ॥
सारे संग्रहोंका अन्त विनाश है, सारी उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है। उत्थान और पतनको स्वयं ही प्रत्यक्ष देखकर यह निश्चय करे कि यहाँका सब कुछ अनित्य और दुःखरूप है ॥
अर्थानामार्जने दुःखमर्जितानां तु रक्षणे ।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थं दुःखभाजनम् ॥
धनके उपार्जनमें दुःख होता है, उपार्जित हुए धनकी रक्षामें दुःख होता है, धनके नाश और व्ययमें भी दुःख होता है, इस प्रकार दुःखके भाजन बने हुए धनको धिक्कार है ॥
अर्थवन्तं नरं नित्यं पञ्चाभिघ्नन्ति शत्रवः ।
राजा चोरश्च दायादा भूतानि क्षय एव च ॥
अर्थमेवमनर्थस्य मूलमित्यवधारय ।
न ह्यनर्थाः प्रबाधन्ते नरमर्थविवर्जितम् ॥
धनवान् मनुष्यपर सदा पाँच शत्रु चोट करते रहते हैं—राजा, चोर, उत्तराधिकारी भाई-बन्धु, अन्यान्य प्राणी तथा क्षय। प्रिये! इस प्रकार तुम अर्थको अनर्थका मूल समझो। धनरहित पुरुषको अनर्थ बाधा नहीं देते हैं ॥
अर्थप्राप्तिर्महद् दुःखमाकिंचन्यं परं सुखम् ।
उपद्रवेषु चार्थानां दुःखं हि नियतं भवेत् ॥
धनकी प्राप्ति महान् दुःख है और अकिंचनता (निर्धनता) परम सुख है; क्योंकि जब धनपर उपद्रव आते हैं, तब निश्चय ही बड़ा दुःख होता है ॥
धनलोभेन तृष्णाया न तृप्तिरुपलभ्यते ।
लब्धाश्रयो विवर्धेत समिद्ध इव पावकः ॥
धनके लोभसे तृष्णाकी कभी तृप्ति नहीं होती है। तृष्णा या लोभको आश्रय मिल जाय तो प्रज्वलित अग्निके समान उसकी वृद्धि होने लगती है ॥
जित्वापि पृथिवीं कृत्स्नां चतुःसागरमेखलाम् ।
सागराणां पुनः पारं जेतुमिच्छत्यसंशयम् ॥
चारों समुद्र जिसकी मेखला है, उस सारी पृथिवीको जीतकर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। वह फिर समुद्रके पारवाले देशोंको भी जीतनेकी इच्छा करता है, इसमें संशय नहीं है ॥
अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः ।
कोशकारः कृमिर्देवि बध्यते हि परिग्रहात् ॥
परिग्रह (संग्रह) से यहाँ कोई लाभ नहीं; क्योंकि परिग्रह दोषसे भरा हुआ है। देवि! रेशमका कीड़ा परिग्रहसे ही बन्धनको प्राप्त होता है ॥

एकोऽपि पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति च । एकस्मिन्नेव राष्ट्रे तु स चापि निवसेन्नृपः ॥ तस्मिन् राष्ट्रेऽपि नगरमेकमेवाधितिष्ठति । नगरेऽपि गृहं चैकं भवेत् तस्य निवेशनम् ॥ जो राजा अकेला ही समूची पृथिवीका एकच्छत्र शासन करता है। वह भी किसी एक ही राष्ट्रमें निवास करता है। उस राष्ट्रमें भी किसी एक ही नगरमें रहता है। उस नगरमें भी किसी एक ही घरमें उसका निवास होता है ।।

एक एव प्रदिष्टः स्यादावासस्तद्गृहेऽपि च । आवासे शयनं चैकं निशि यत्र प्रलीयते ॥ उस घरमें भी उसके लिये एक ही कमरा नियत होता है। उस कमरेमें भी उसके लिये एक ही शय्या होती है, जिसपर वह रातमें सोता है ।।

शयनस्यार्धमेवास्य स्त्रियाश्चार्धं विधीयते । तदनेन प्रसङ्गेन स्वल्पेनैवेह युज्यते ॥ सर्वं ममेति सम्मूढो बलं पश्यति बालिशः । एवं सर्वोपयोगेषु स्वल्पमस्य प्रयोजनम् ॥ तण्डुलप्रस्थमात्रेण यात्रा स्यात् सर्वदेहिनाम् । ततो भूयस्तरो भोगो दुःखाय तपनाय च ॥ उस शय्याका भी आधा ही भाग उसके पल्ले पड़ता है। उसका आधा भाग उसकी रानीके काम आता है। इस प्रसंगसे वह अपने लिये थोड़ेसे ही भागका उपयोग कर पाता है। तो भी वह मूर्ख गवाँर सारे भूमण्डलको अपना ही समझता है और सर्वत्र अपना ही बल देखता है। इस प्रकार सभी वस्तुओंके उपयोगोंमें उसका थोड़ा-सा ही प्रयोजन होता है। प्रतिदिन सेरभर चावलसे ही समस्त देहधारियोंकी प्राणयात्राका निर्वाह होता है। उससे अधिक भोग दुःख और संतापका कारण होता है ।।

नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् । सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ तृष्णाके समान कोई दुःख नहीं है, त्यागके समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओंका परित्याग करके मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।।

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है; जो मनुष्यके बूढ़े हो जानेपर स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जिसे प्राणनाशक रोग कहा गया है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है ।।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ।। भोगोंकी तृष्णा कभी भोग भोगनेसे शान्त नहीं होती, अपितु घीसे प्रज्वलित होनेवाली आगके समान अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है ।। अलाभेनैव कामानां शोकं त्यजति पण्डितः । आयासविटपस्तीव्रः कामाग्निः कर्षणारणिः ।। इन्द्रियार्थेन सम्मोह्य दहत्यकुशलं जनम् ।। भोगोंकी प्राप्ति न होनेसे ही विद्वान् पुरुष शोकको त्याग देता है। आयासरूपी वृक्षपर तीव्रवेगसे प्रज्वलित और आकर्षणरूपी अग्निसे प्रकट हुई कामनारूप अग्नि मूर्ख मनुष्यको विषयोंद्वारा मोहित करके जला डालती है ।। यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य पर्याप्तमिति पश्यन् न मुह्यति ।। इस पृथ्वीपर जो धान, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर एक पुरुषके लिये पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा देखने और समझनेवाला पुरुष मोहमें नहीं पड़ता है ।। यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ।। लोकमें जो काम-सुख है और परलोकमें जो महान् दिव्य सुख है—ये दोनों मिलकर तृष्णाक्षयजनित सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते ।। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नैव धीरो नियोजयेत् । मनःषष्ठानि संयम्य नित्यमात्मनि योजयेत् ।। इन्द्रियाणां विसर्गेण दोषमृच्छत्यसंशयम् । संनियम्य नु तान्येव ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ।। षण्णामात्मनि युक्तानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति । न च पापैर्न चानर्थैः संयुज्येत विचक्षणः ।। धीर पुरुष अपनी इन्द्रियोंको विषयोंमें न लगावे। मनसहित उनका संयम करके उन्हें सदा परमात्माके ध्यानमें नियुक्त करे। इन्द्रियोंको खुली छोड़ देनेसे निश्चय ही दोषकी प्राप्ति होती है और उन्हींका संयम कर लेनेसे मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो परमात्म-चिन्तनमें लगी हुई मनसहित छहों इन्द्रियोंपर प्रभुत्व स्थापित कर लेता है, वह विद्वान् पापों और अनर्थोंसे संयुक्त नहीं होता है ।। अप्रमत्तः सदा रक्षेदिन्द्रियाणि विचक्षणः । अरक्षितेषु तेष्वाशु नरो नरकमेति हि ।। विद्वान् पुरुष सावधान रहकर सदा अपनी इन्द्रियोंकी रक्षा करे; क्योंकि उनकी रक्षा न होनेपर मनुष्य शीघ्र ही नरकमें गिर जाता है ।। हृदि काममयश्चित्रो मोहसंचयसम्भवः ।

अज्ञानरूढमूलस्तु विधित्सापरिवेचनः ।। रोषलोभमहास्कन्धः पुरा दुष्कृतसारवान् । आयासविटपस्तीव्रशोकपुष्पो भयाङ्कुरः ।। नानासंकल्पपत्राढ्यः प्रमादात् परिवर्धितः । महतीभिः पिपासाभिः समन्तात् परिवेष्टितः ।। संरोहत्यकृतप्रज्ञे पादपः कामसम्भवः ।। नैव रोहति तत्त्वज्ञे रूढो वा छिद्यते पुनः ।। कृच्छ्रोपायेष्वनित्येषु निस्सारेषु फलेषु च । दुःखादिषु दुरन्तेषु कामयोगेषु का रतिः ।। एक काममय वृक्ष है, जो मोह-संचयरूपी बीजसे उत्पन्न हुआ है। वह काममय विचित्र वृक्ष हृदयदेशमें ही स्थित है। अज्ञान ही उसकी मजबूत जड़ है। सकाम कर्म करनेकी इच्छा ही उसे सींचना है। रोष और लोभ ही उसका विशाल तना है। पाप ही उसका सार भाग है। आयास-प्रयास ही उसकी शाखाएँ हैं। तीव्रशोक पुष्प है, भय अंकुर है। नाना प्रकारके संकल्प उसके पत्ते हैं। यह प्रमादसे बढ़ा हुआ है। बड़ी भारी पिपासा या तृष्णा ही लता बनकर उस काम-वृक्षमें सब ओर लिपटी हुई है। अज्ञानी मनुष्यमें ही यह काममय वृक्ष उत्पन्न होता और बढ़ता है। तत्त्वज्ञ पुरुषमें यह नहीं अंकुरित होता है। यदि हुआ भी तो पुनः कट जाता है। यह काम कठिन उपायोंसे साध्य है, अनित्य है, उसके फल निःसार हैं, उसका आदि और अन्त भी दुःखमय है, उससे सम्बन्ध जोड़नेमें क्या अनुराग हो सकता है? ।।

इन्द्रियेषु च जीर्यत्सु च्छिद्यमाने तथाऽऽयुषि । पुरस्ताच्च स्थिते मृत्यौ किं सुखं पश्यतः शुभे ।। शुभे! इन्द्रियाँ सदा जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती चली जा रही है और मौत सामने खड़ी है—यह सब देखते हुए किसीको संसारमें क्या सुख प्रतीत होगा? ।।

व्याधिभिः पीड्यमानस्य नित्यं शारीरमानसैः । नरस्याकृतकृत्यस्य किं सुखं मरणे सति ।। मनुष्य सदा शारीरिक और मानसिक व्याधियोंसे पीड़ित होता है और अपनी अधूरी इच्छाएँ लिये ही मर जाता है। अतः यहाँ कौन-सा सुख है? ।।

संचिन्तयानमेवार्थं कामानामतृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवारण्ये मृत्युरादाय गच्छति ।। जन्ममृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यमानस्तु पापात्नोद्विजते जनः ।। मानव अपने मनोरथोंकी पूर्तिका उपाय सोचता रहता है और कामनाओंसे अतृप्त ही बना रहता है। तभी जैसे जंगलमें बाघ आकर सहसा किसी पशुको दबोच लेता है, उसी

प्रकार मौत उसे उठा ले जाती है। जन्म, मृत्यु और जरा-सम्बन्धी दुःखोंसे सदा आक्रान्त होकर संसारमें मनुष्य पकाया जा रहा है, तो भी वह पापसे उद्विग्न नहीं हो रहा है।।

उमोवाच

केनोपायेन मर्त्यानां निवर्तेते जरान्तकौ। यद्यस्ति भगवन् मह्यमेतदाचक्ष्व मा चिरम्।। **उमाने पूछा—**भगवन्! मनुष्योंकी वृद्धावस्था और मृत्यु किस उपायसे निवृत्त होती है? यदि इसका कोई उपाय है तो यह मुझे बताइये, विलम्ब न कीजिये।। तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा। रसायनप्रयोगैर्वा केनात्येति जरान्तकौ।। महान् तप, कर्म, शास्त्रज्ञान अथवा रासायनिक प्रयोग—किस उपायसे मनुष्य जरा और मृत्युको लाँघ सकता है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

नैतदस्ति महाभागे जरामृत्युनिवर्तनम्। सर्वलोकेषु जानीहि मोक्षादन्यत्र भामिनि।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! ऐसी बात नहीं होती। भामिनि! तुम यह जान लो कि सम्पूर्ण संसारमें मोक्षके सिवा अन्यत्र जरा और मृत्युकी निवृत्ति नहीं होती।। न धनेन न राज्येन नाग्र्येण तपसापि वा। मरणं नातितरते विना मुक्त्या शरीरिणः।। आत्माकी मुक्तिके बिना मनुष्य न तो धनसे, न राज्यसे और न श्रेष्ठ तपस्यासे ही मृत्युको लाँघ सकता है।। अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। न तरन्ति जरामृत्यू निर्वाणाधिगमाद् विना।। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ भी मोक्षकी उपलब्धि हुए बिना जरा और मृत्युको नहीं लाँघ सकते।। ऐश्वर्यं धनधान्यं च विद्यालाभस्तपस्तथा। रसायनप्रयोगो वा न तरन्ति जरान्तकौ।। ऐश्वर्य, धन-धान्य, विद्यालाभ, तप और रसायनप्रयोग—ये कोई भी जरा और मृत्युके पार नहीं जा सकते।। देवदानवगन्धर्वकिन्नरोरगराक्षसान्। स्ववशे कुरुते कालो न कालस्यास्त्यगोचरः।। न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः। सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानमजस्रं ध्रुवमव्ययम्।।

स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानामहोरात्रेषु संततम् ॥ देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा राक्षसोंको भी काल अपने वशमें कर लेता है। कोई भी कालकी पहुँचसे परे नहीं है। गये हुए दिन, मास और रात्रियाँ फिर नहीं लौटती हैं। यह जीवात्मा उस निरन्तर चालू रहनेवाले अटल और अविनाशी मार्गको ग्रहण करता है। सरिताओंके स्रोतकी भाँति बीतती हुई आयुके दिन वापस नहीं लौटते हैं। दिन और रातोंमें व्याप्त हुई मनुष्योंकी आयु लेकर काल यहाँसे चल देता है ॥

जीवितं सर्वभूतानामक्षयः क्षपयन्नसौ । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनः पुनरुदेति च ॥ अक्षय सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंके जीवनको क्षीण करता हुआ अस्त होता और पुनः उदय होता रहता है ॥

रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं भवेत् । गाधोदके मत्स्य इव किं नु तस्य कुमारता ॥ एक-एक रात बीतनेपर आयु बहुत थोड़ी होती चली जाती है। जैसे थाह जलमें रहनेवाला मत्स्य सुखी नहीं रहता, उसी प्रकार जिसकी आयु क्षीण होती जा रही है, उस परिमित आयुवाले पुरुषको कुमारावस्थाका क्या सुख है? ॥

मरणं हि शरीरस्य नियतं ध्रुवमेव च । तिष्ठन्नपि क्षणं सर्वः कालस्यैति वशं पुनः ॥ शरीरकी मृत्यु निश्चित और अटल है। सब लोग यहाँ क्षणभर ठहरकर पुनः कालके अधीन हो जाते हैं ॥

न म्रियेरन् न जीर्येरन् यदि स्युः सर्वदेहिनः । न चानिष्टं प्रवर्तेत शोको वा प्राणिनां क्वचित् ॥ यदि समस्त देहधारी प्राणी न मरें और न बूढ़े हों तो न उन्हें अनिष्टकी प्राप्ति हो और न शोककी ही ॥

अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो भूतेषु तिष्ठति । अप्रमत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ॥ श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम् । कोऽपि तद् वेद यत्रासौ मृत्युना नाभिवीक्षितः ॥ समस्त प्राणियोंके असावधान रहनेपर भी काल सदा सावधान रहता है। उस सावधान कालके आश्रयमें आया हुआ कोई भी प्राणी बच नहीं सकता। कलका कार्य आज ही कर डाले, जिसे अपराह्नमें करना हो उसे पूर्वाह्नमें ही पूरा कर डाले। कौन उस स्थानको जानता है, जहाँ उसपर मृत्युकी दृष्टि नहीं पड़ी होगी ॥

वर्षास्विदं करिष्यामि इदं ग्रीष्मवसन्तयोः ।

इति बालश्चिन्तयति अन्तरायं न बुध्यते ।। इदं मे स्यादिदं मे स्यादित्येवं मनसा नराः । अनवाप्तेषु कामेषु ह्रियन्ते मरणं प्रति ।। कालपाशेन बद्धानामह्न्यहनि जीर्यताम् । का श्रद्धा प्राणिनां मार्गे विषमे भ्रमतां सदा ।। युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् । फलानामिव पक्वानां सदा हि पतनाद् भयम् ।। अविवेकी मनुष्य यह सोचता रहता है कि आगामी बरसातमें यह कार्य करूँगा और गर्मी तथा वसन्त ऋतुमें अमुक कार्य आरम्भ करूँगा; परंतु उसमें जो मौत विघ्न बनकर खड़ी रहती है, उसकी ओर उसका ध्यान नहीं जाता है। 'मेरे पास यह हो जाय, वह हो जाय' इस प्रकार मन-ही-मन मनुष्य मनसूबे बाँधा करता है। उसकी कामनाएँ अप्राप्त ही रह जाती हैं और वह मृत्युकी ओर खिंचता चला जाता है। कालके बन्धनमें बँधकर प्रतिदिन जीर्ण होते और विषम-मार्गमें भटकते हुए प्राणियोंका इस जीवनपर क्या विश्वास हो सकता है। युवावस्थासे ही मनुष्य धर्मशील हो; क्योंकि जीवनका कोई सुदृढ़ निमित्त नहीं है। इसे पके हुए फलोंकी भाँति सदा ही पतनका भय बना रहता है ।। मर्त्यस्य किमु तैर्दारैः पुत्रैर्भोगैः प्रियैरपि । एकाह्ना सर्वमुत्सृज्य मृत्योस्तु वशमन्वियात् ।। मनुष्यको उन स्त्रियों, पुत्रों और प्रिय भोगोंसे भी क्या प्रयोजन है, जब कि वह एक ही दिनमें सबको छोड़कर मृत्युकी ओर चला जाता है ।। जायमानांश्च सम्प्रेक्ष्य म्रियमाणांस्तथैव च । न संवेगोऽस्ति चेत् पुंसः काष्ठलोष्टसमो हि सः ।। विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य किं बन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च । विहाय यद् गच्छति सर्वमेवं क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ।। संसारमें जन्म लेने और मरनेवालोंको देखकर भी यदि मनुष्यको वैराग्य नहीं होता तो वह चेतन नहीं, काठ और मिट्टीके ढेलेके समान जड है। जो विनाशशील है, जिसका जीवन निश्चित नहीं है, ऐसे पुरुषको बन्धुओं और मित्रोंके संग्रहसे क्या प्रयोजन है? क्योंकि वह सबको क्षणभरमें छोड़कर चल देता है और जाकर फिर कभी लौटता नहीं है ।। एवं चिन्तयतो नित्यं सर्वार्थानामनित्यताम् । उद्वेगो जायते शीघ्रं निर्वाणस्य परस्परम् ।। तेनोद्वेगेन चाप्यस्य विमर्शो जायते पुनः । विमर्शो नाम वैराग्यं सर्वद्रव्येषु जायते ।।

वैराग्येण परां शान्तिं लभन्ते मानवाः शुभे ।
मोक्षस्योपनिषद् दिव्यं वैराग्यमिति निश्चितम् ॥
एतत् ते कथितं देवि वैराग्योत्पादनं वचः ।
एवं संचिन्त्य संचिन्त्य मुच्यन्ते हि मुमुक्षवः ॥

इस प्रकार सदा सभी पदार्थोंकी अनित्यताका चिन्तन करते हुए पुरुषको शीघ्र ही एक दूसरेसे वैराग्य होता है, जो मोक्षका कारण है। उस उद्वेगसे उसके मनमें पुनः विमर्श पैदा होता है। समस्त द्रव्योंकी ओरसे जो वैराग्य पैदा होता है, उसीका नाम विमर्श है। शुभे! वैराग्यसे मनुष्योंको बड़ी शान्ति मिलती है। वैराग्य मोक्षका निकटतम एवं दिव्य साधन है, यह निश्चितरूपसे कहा गया है। देवि! यह तुमसे वैराग्य उत्पन्न करनेवाला वचन कहा गया है। मुमुक्षु पुरुष इस प्रकार बारंबार विचार करनेसे मुक्त हो जाते हैं ॥

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]

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[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]

श्रीमहेश्वर उवाच

सांख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत् ते शुचिस्मिते ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्यः संसारेषु प्रवर्तते ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शुचिस्मिते! अब मैं तुमसे सांख्यज्ञानका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता ॥

ज्ञानेनैव विमुक्तास्ते सांख्याः संन्यासकोविदाः ।
शारीरं तु तपो घोरं सांख्याः प्राहुर्निरर्थकम् ॥
संन्यासकुशल सांख्यज्ञानी ज्ञानसे ही मुक्त हो जाते हैं। वे घोर शारीरिक तपको व्यर्थ बताते हैं ॥

पञ्चविंशतिकं ज्ञानं तेषां ज्ञानमिति स्मृतम् ।
मूलप्रकृतिरव्यक्तमव्यक्ताज्जायते महान् ॥
महतोऽभूदहंकारस्तस्मात् तन्मात्रपञ्चकम् ।
इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रेभ्यो भवन्त्युत ॥
तेभ्यो भूतानि पञ्चभ्यः शरीरं वै प्रवर्तते ।
इति क्षेत्रस्य संक्षेपः चतुर्विंशतिरिष्यते ॥
पञ्चविंशतिरित्याहुः पुरुषेणेह संख्यया ॥
पचीस तत्त्वोंका ज्ञान ही सांख्यज्ञान माना गया है। मूलप्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं, अव्यक्तसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्वसे अहंकार प्रकट होता है और अहंकारसे पाँच तन्मात्राओंकी उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओंसे दस इन्द्रियों और एक मनकी उत्पत्ति होती है। उनसे पाँच भूत प्रकट होते हैं और पाँच भूतोंसे इस शरीरका निर्माण होता है। यही क्षेत्रका संक्षेप स्वरूप है। इसीको चौबीस तत्त्वोंका समुदाय कहते हैं। इनमें पुरुषकी भी गणना कर लेनेपर कुल पचीस तत्त्व बताये गये हैं ॥

सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
तैः सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिस्त्वात्मजैर्गुणैः ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
विकाराः प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभिः ॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकृतिजनित गुण हैं। प्रकृति इन तीनों आत्मज गुणोंसे सम्पूर्ण लोककी सृष्टि करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति—इन्हें मनीषी पुरुषोंको प्रकृतिके विकार जानना चाहिये ॥

लक्षणं चापि सर्वेषां विकल्पस्त्वादितः पृथक् ।

विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु ।। इन सबका लक्षण और आरम्भसे ही पृथक्-पृथक् विकल्प मैं विस्तारपूर्वक बताऊँगा, उसकी व्याख्या सुनो ।।

नित्यमेकमणु व्यापि क्रियाहीनमहेतुकम् । अग्राह्यमिन्द्रियैः सर्वैरेतदव्यक्तलक्षणम् ।। अव्यक्तं प्रकृतिमूलं प्रधानं योनिरव्ययम् । अव्यक्तस्यैव नामानि शब्दैः पर्यायवाचकैः ।। नित्य, एक, अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, क्रियाहीन, हेतुरहित और सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य होना—यह अव्यक्तका लक्षण है। अव्यक्त, प्रकृति, मूल, प्रधान, योनि और अविनाशी—इन पर्यायवाची शब्दोंद्वारा अव्यक्तके ही नाम बताये जाते हैं ।।

तत् सूक्ष्मत्वानिर्देश्यं तत् सदित्यभिधीयते । तन्मूलं च जगत् सर्वं तन्मूला सृष्टिरिष्यते ।। वह अव्यक्त अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण अनिर्देश्य है—उसका वाणीद्वारा कोई संकेत नहीं किया जा सकता। वह 'सत्' कहलाता है। सम्पूर्ण जगत्का मूल वही है और सृष्टिका मूल भी उसीको बताया गया है ।।

सत्त्वादयः प्रकृतिजा गुणास्तान् प्रब्रवीम्यहम् ।। सुखं तुष्टिः प्रकाशश्च त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः । रागद्वेषौ सुखं दुःखं स्तम्भश्च रजसो गुणाः ।। सत्त्व आदि जो प्राकृत गुण हैं, उनको बता रहा हूँ। सुख, संतोष, प्रकाश—ये तीन सात्त्विक गुण हैं। राग-द्वेष, सुख-दुःख तथा उद्दण्डता—ये रजोगुणके गुण हैं ।।

अप्रकाशो भयं मोहस्तन्द्री च तमसो गुणाः ।। श्रद्धा प्रहर्षो विज्ञानमसम्मोहो दया धृतिः । सत्त्वे प्रवृद्धे वर्धन्ते विपरीते विपर्ययः ।। प्रकाशका अभाव, भय, मोह और आलस्यको तमोगुणके गुण समझो। श्रद्धा, हर्ष, विज्ञान, असम्मोह, दया और धैर्य—ये भाव सत्त्वगुणके बढ़नेपर बढ़ते हैं और तमोगुणके बढ़नेपर इनके विपरीत भाव अश्रद्धा आदिकी वृद्धि होती है ।।

कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथा मृषा । प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वशः ।। विषादः संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा । तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम् ।। काम, क्रोध, मानसिक संताप, लोभ, मोह (आसक्ति) तथा मिथ्याभाषण—ये सारे दोष रजोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं। विषाद, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा, भय—ये तमोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं ।।

एवमन्योन्यमेतानि वर्धन्ते च पुनः पुनः । हीयन्ते च तथा नित्यमभिभूतानि भूरिशः ॥ इस प्रकार ये तीनों गुण बारंबार परस्पर बढ़ते हैं और एक-दूसरेसे अभिभूत होनेपर सदा ही क्षीण होते हैं ॥ तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं कायेन मनसापि वा । वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तदा ॥ यदा संतापसंयुक्तं चित्तक्षोभकरं भवेत् । वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत् ॥ इनमें शरीर अथवा मनसे जो प्रसन्नतायुक्त भाव हो, उसे सात्त्विक भाव है—ऐसा माने और अन्य भावोंकी उपेक्षा कर दे। जब चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला संतापयुक्त भाव हो, तब उसे रजोगुणकी प्रवृत्ति माने ॥ यदा सम्मोहसंयुक्तं यद् विषादकरं भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ समासात् सात्त्विको धर्मः समासाद् राजसं धनम् । समासात् तामसः कामस्त्रिवर्गे त्रिगुणाः क्रमात् ॥ ब्रह्मादिदेवसृष्टिर्या सात्त्विकीति प्रकीर्त्यते । राजसी मानुषी सृष्टिः तिर्यग्योनिस्तु तामसी ॥ जब मोहयुक्त और विषाद उत्पन्न करनेवाला भाव अतर्क्य और अज्ञातरूपसे प्रकट हो, तब उसे तमोगुणका कार्य समझना चाहिये। धर्म सात्त्विक है, धन राजस है और काम तामस बताया गया है। इस प्रकार त्रिवर्गमें क्रमशः तीनों गुणोंकी स्थिति संक्षेपमें बतायी गयी है। ब्रह्मा आदि देवताओंकी जो सृष्टि है, वह सात्त्विकी बतायी जाती है। मनुष्योंकी राजसी सृष्टि है और तिर्यग्योनि तामसी कही गयी है ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ देवमानुषतिर्यक्षु यद्भूतं सचराचरम् । आदिप्रभृति संयुक्तं व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्गुणैः ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि महदादीनि लिङ्गतः । विज्ञानं च विवेकश्च महतो लक्षणं भवेत् ॥ सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले पुरुष ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग आदि) में जाते हैं, रजोगुणी पुरुष मध्यलोक (मनुष्य-योनि) में स्थित होते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदिमें स्थित हुए तामस पुरुष अधोगतिको—कीट-पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरक आदिको प्राप्त होते हैं। देवता, मनुष्य तथा तिर्यक् आदि योनियोंमें जो चराचर प्राणी हैं, वे आदि कालसे ही इन तीनों गुणोंद्वारा संयुक्त एवं व्याप्त हैं। अब मैं महत् आदि

त्त्वोंके लक्षण बताऊँगा। बुद्धिके द्वारा जो विवेक और ज्ञान होता है, वही शरीरमें महत्तत्त्वका लक्षण है।। महान् बुद्धिमतिः प्रज्ञा नामानि महतो विदुः । अहङ्कारः स विज्ञेयो लक्षणेन समासतः ।। अहङ्कारेण भूतानां सर्गो नानाविधो भवेत् । अहङ्कारनिवृत्तिर्हि निर्वाणायोपपद्यते ।। महान्, बुद्धि, मति और प्रज्ञा—ये महत्तत्त्वके नाम माने गये हैं। संक्षेपसे लक्षणद्वारा अहंकारका विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अहंकारसे ही प्राणियोंकी नाना प्रकारकी सृष्टि होती है। अहंकारकी निवृत्ति मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली होती है ।। खं वायुरग्निः सलिलं पृथिवी चेति पञ्चमी । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पाँचवीं पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं। ये ही समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।। शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् । स्पर्शवत् प्राणिनां चेष्टा पवनस्य गुणाः स्मृताः ।। शब्द, श्रवणेन्द्रिय तथा इन्द्रियोंके छिद्र—ये तीनों आकाशसे प्रकट हुए हैं। स्पर्श और प्राणियोंकी चेष्टा—ये वायुके गुण माने गये हैं ।। रूपं पाकोऽक्षिणी ज्योतिश्चत्वारस्तेजसो गुणाः । रसः स्नेहस्तथा जिह्वा शैत्यं च जलजा गुणाः ।। रूप, पाक, नेत्र और ज्योति—ये चार तेजके गुण हैं। रस, स्नेह, जिह्वा और शीतलता—ये चार जलके गुण हैं ।। गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिव्यास्ते गुणास्त्रयः । इति सर्वगुणा देवि विख्याताः पाञ्चभौतिकाः ।। गन्ध, घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये पृथिवीके तीन गुण हैं। देवि! इस प्रकार पाँचों भूतोंके समस्त गुण विख्यात हैं ।। गुणान् पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तराणि तु । तस्मान्नैकगुणाश्चेह दृश्यते भूतसृष्टयः ।। उपलभ्याप्सु ये गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । अपां गन्धगुणं प्राज्ञा नेच्छन्ति कमलेक्षणे ।। उत्तरोत्तर भूत पूर्व-पूर्व भूतके गुण ग्रहण करते हैं। इसीलिये यहाँ प्राणियोंकी सृष्टि अनेक गुणोंसे युक्त दिखायी देती है। कमलेक्षणे! कुछ अयोग्य मनुष्य जो जलमें सुगन्ध या दुर्गन्ध पाकर गन्धको जलका गुण बताते हैं, उसे विद्वान् पुरुष नहीं स्वीकार करते हैं ।। तद् गन्धत्वमपां नास्ति पृथिव्या एव तद् गुणः ।