भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1372, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1372

एवमन्योन्यमेतानि वर्धन्ते च पुनः पुनः । हीयन्ते च तथा नित्यमभिभूतानि भूरिशः ॥ इस प्रकार ये तीनों गुण बारंबार परस्पर बढ़ते हैं और एक-दूसरेसे अभिभूत होनेपर सदा ही क्षीण होते हैं ॥ तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं कायेन मनसापि वा । वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तदा ॥ यदा संतापसंयुक्तं चित्तक्षोभकरं भवेत् । वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत् ॥ इनमें शरीर अथवा मनसे जो प्रसन्नतायुक्त भाव हो, उसे सात्त्विक भाव है—ऐसा माने और अन्य भावोंकी उपेक्षा कर दे। जब चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला संतापयुक्त भाव हो, तब उसे रजोगुणकी प्रवृत्ति माने ॥ यदा सम्मोहसंयुक्तं यद् विषादकरं भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ समासात् सात्त्विको धर्मः समासाद् राजसं धनम् । समासात् तामसः कामस्त्रिवर्गे त्रिगुणाः क्रमात् ॥ ब्रह्मादिदेवसृष्टिर्या सात्त्विकीति प्रकीर्त्यते । राजसी मानुषी सृष्टिः तिर्यग्योनिस्तु तामसी ॥ जब मोहयुक्त और विषाद उत्पन्न करनेवाला भाव अतर्क्य और अज्ञातरूपसे प्रकट हो, तब उसे तमोगुणका कार्य समझना चाहिये। धर्म सात्त्विक है, धन राजस है और काम तामस बताया गया है। इस प्रकार त्रिवर्गमें क्रमशः तीनों गुणोंकी स्थिति संक्षेपमें बतायी गयी है। ब्रह्मा आदि देवताओंकी जो सृष्टि है, वह सात्त्विकी बतायी जाती है। मनुष्योंकी राजसी सृष्टि है और तिर्यग्योनि तामसी कही गयी है ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ देवमानुषतिर्यक्षु यद्भूतं सचराचरम् । आदिप्रभृति संयुक्तं व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्गुणैः ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि महदादीनि लिङ्गतः । विज्ञानं च विवेकश्च महतो लक्षणं भवेत् ॥ सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले पुरुष ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग आदि) में जाते हैं, रजोगुणी पुरुष मध्यलोक (मनुष्य-योनि) में स्थित होते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदिमें स्थित हुए तामस पुरुष अधोगतिको—कीट-पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरक आदिको प्राप्त होते हैं। देवता, मनुष्य तथा तिर्यक् आदि योनियोंमें जो चराचर प्राणी हैं, वे आदि कालसे ही इन तीनों गुणोंद्वारा संयुक्त एवं व्याप्त हैं। अब मैं महत् आदि