भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1373, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1373

त्त्वोंके लक्षण बताऊँगा। बुद्धिके द्वारा जो विवेक और ज्ञान होता है, वही शरीरमें महत्तत्त्वका लक्षण है।। महान् बुद्धिमतिः प्रज्ञा नामानि महतो विदुः । अहङ्कारः स विज्ञेयो लक्षणेन समासतः ।। अहङ्कारेण भूतानां सर्गो नानाविधो भवेत् । अहङ्कारनिवृत्तिर्हि निर्वाणायोपपद्यते ।। महान्, बुद्धि, मति और प्रज्ञा—ये महत्तत्त्वके नाम माने गये हैं। संक्षेपसे लक्षणद्वारा अहंकारका विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अहंकारसे ही प्राणियोंकी नाना प्रकारकी सृष्टि होती है। अहंकारकी निवृत्ति मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली होती है ।। खं वायुरग्निः सलिलं पृथिवी चेति पञ्चमी । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पाँचवीं पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं। ये ही समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।। शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् । स्पर्शवत् प्राणिनां चेष्टा पवनस्य गुणाः स्मृताः ।। शब्द, श्रवणेन्द्रिय तथा इन्द्रियोंके छिद्र—ये तीनों आकाशसे प्रकट हुए हैं। स्पर्श और प्राणियोंकी चेष्टा—ये वायुके गुण माने गये हैं ।। रूपं पाकोऽक्षिणी ज्योतिश्चत्वारस्तेजसो गुणाः । रसः स्नेहस्तथा जिह्वा शैत्यं च जलजा गुणाः ।। रूप, पाक, नेत्र और ज्योति—ये चार तेजके गुण हैं। रस, स्नेह, जिह्वा और शीतलता—ये चार जलके गुण हैं ।। गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिव्यास्ते गुणास्त्रयः । इति सर्वगुणा देवि विख्याताः पाञ्चभौतिकाः ।। गन्ध, घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये पृथिवीके तीन गुण हैं। देवि! इस प्रकार पाँचों भूतोंके समस्त गुण विख्यात हैं ।। गुणान् पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तराणि तु । तस्मान्नैकगुणाश्चेह दृश्यते भूतसृष्टयः ।। उपलभ्याप्सु ये गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । अपां गन्धगुणं प्राज्ञा नेच्छन्ति कमलेक्षणे ।। उत्तरोत्तर भूत पूर्व-पूर्व भूतके गुण ग्रहण करते हैं। इसीलिये यहाँ प्राणियोंकी सृष्टि अनेक गुणोंसे युक्त दिखायी देती है। कमलेक्षणे! कुछ अयोग्य मनुष्य जो जलमें सुगन्ध या दुर्गन्ध पाकर गन्धको जलका गुण बताते हैं, उसे विद्वान् पुरुष नहीं स्वीकार करते हैं ।। तद् गन्धत्वमपां नास्ति पृथिव्या एव तद् गुणः ।