भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1374, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1374

भूमिर्गन्धे रसे स्नेहो ज्योतिश्चक्षुषि संस्थितम् ।।
जलमें गन्ध नहीं है, गन्ध पृथ्वीका ही गुण है। गन्धमें भूमि, रसमें जल तथा नेत्रमें तेजकी स्थिति है ।।

प्राणापानाश्रयो वायुः खेष्वाकाशः शरीरिणाम् ।
केशास्थिनखदन्तत्वक्पाणिपादशिरांसि च ।
पृष्ठोदरकटीग्रीवाः सर्वं भूम्यात्मकं स्मृतम् ।।
प्राण और अपानका आश्रय वायु है। देहधारियोंके शरीरमें जितने छिद्र हैं, उन सबमें आकाश व्याप्त है। केश, हड्डी, नख, दाँत, त्वचा, हाथ, पैर, सिर, पीठ, पेट, कमर और गर्दन—ये सब भूमिके कार्य माने गये हैं ।।

यत् किंचिदपि कायेऽस्मिन् धातुदोषमलाश्रितम् ।
तत् सर्वं भौतिकं विद्धि देहैरेवास्य स्वामिकम् ।।
इस शरीरमें जो कुछ भी धातु, दोष और मल-सम्बन्धी वस्तुएँ हैं, उन सबको पांचभौतिक समझो। शरीरोंके द्वारा ही इस विश्वपर पंचभूतोंका स्वामित्व है ।।

बुद्धीन्द्रियाणि कर्णत्वक्चक्षुर्जिह्वाथ नासिका ।
कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादौ मेढ्रं गुदस्तथा ।।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
बुद्धीन्द्रियार्थान् जानीयाद् भूतेभ्यस्त्वभिनिःसृतान् ।।
कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, वाक्, मेढ्र (लिंग) और गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—इन्हें ज्ञानेन्द्रियोंके विषय समझें। ये पाँचों भूतोंसे प्रकट हुए हैं ।।

वाक्यं क्रिया गतिः प्रीतिरुत्सर्गश्चेति पञ्चधा ।
कर्मेन्द्रियार्थान् जानीयात् ते च भूतोद्भवा मताः ।।
इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते ।
प्रार्थनालक्षणं तच्च इन्द्रियं तु मनः स्मृतम् ।।
वाक्य, क्रिया, गति, प्रीति और उत्सर्ग—ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय जानें। ये भी पञ्चभूतोंसे उत्पन्न हुए माने गये हैं। समस्त इन्द्रियोंका स्वामी या प्रेरक मन कहलाता है। उसका लक्षण है प्रार्थना (किसी वस्तुकी चाह)। मनको भी इन्द्रिय ही माना गया है ।।

नियुङ्क्ते च सदा तानि भूतानि मनसा सह ।
नियमे च विसर्गे च मनसः कारणं प्रभुः ।।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना धृतिः ।
भूताभूतविकारश्च शरीरमिति संस्थितम् ।।
जो प्रभु (आत्मा) मनके नियन्त्रण और सृष्टिमें कारण है, वही मनसहित सम्पूर्ण भूतोंको सदा विभिन्न कार्योंमें नियुक्त करता है। इन्द्रिय, इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव, चेतना,