भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1375, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1375

धृति तथा भूताभूत-विकार—ये सब मिलकर शरीर हैं।। शरीराच्च परो देही शरीरं च व्यपाश्रितः। शरीरिणः शरीरस्य सोऽन्तरं वेत्ति वै मुनिः।। शरीरसे परे शरीरधारी आत्मा है, जो शरीरका ही आश्रय लेकर रहता है। जो शरीर और शरीरीका अन्तर जानता है, वही मुनि है।। रसः स्पर्शश्च गन्धश्च रूपं शब्दविवर्जितम्। अशरीरं शरीरेषु दिदृक्षेत् निरिन्द्रियम्।। रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्दसे रहित, इन्द्रियहीन अशरीरी आत्माको शरीरके भीतर देखनेकी इच्छा करे।। अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येष्वमरमाश्रितम्। यः पश्येत् परमात्मानं बन्धनैः स विमुच्यते।। जो सम्पूर्ण मर्त्य शरीरोंमें अव्यक्त भावसे स्थित एवं अमर है, उस परमात्माको जो देखता है, वह बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।। स हि सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च। वसत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वितः।। नैव चोर्ध्वं न तिर्यक् च नाधस्तान्न कदाचन। इन्द्रियैरिह बुद्ध्या वा न दृश्येत कदाचन।। नाना भावोंसे युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला ही सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें निवास करता है। वह न ऊपर, न अगल-बगलमें और न नीचे ही कभी दिखायी देता है। वह यहाँ इन्द्रियों अथवा बुद्धिके द्वारा कदापि दिखायी नहीं देता।। नवद्वारं पुरं गत्वा सततं नियतो वशी। ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च।। तमेवाहुरणुभ्योऽणुं तं महद्भ्यो महत्तरम्। बहुधा सर्वभूतानि व्याप्य तिष्ठति शाश्वतम्।। क्षेत्रज्ञमेकतः कृत्वा सर्वं क्षेत्रमथैकतः। एवं संविमृशेज्ज्ञानी संयतः सततं हृदि।। नौ द्वारवाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियमपूर्वक निवास करता है। सबको वशमें रखता है। सम्पूर्ण लोकोंमें चराचर प्राणियोंका शासन करनेवाला ईश्वर भी वही है। उसे अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान् कहते हैं। वह नाना प्रकारके सभी प्राणियोंको व्याप्त करके सदा स्थित रहता है। क्षेत्रज्ञको एक ओर करके दूसरी ओर सम्पूर्ण क्षेत्रको पृथक् करके रखे। संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञानी पुरुष सदा इस प्रकार अपने हृदयमें विचार करता रहे—जड और चेतनकी पृथक्ताका विवेचन किया करे।। पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।