भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1376, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1376

अकर्तालेपको नित्यो मध्यस्थः सर्वकर्मणाम् ॥
पुरुष प्रकृतिमें स्थित रहकर ही उससे उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है। वह अकर्ता, निर्लेप, नित्य और समस्त कर्मोंका मध्यस्थ है॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
अजरोऽयमचिन्त्योऽयमव्यक्तोऽयं सनातनः ।
देही तेजोमयो देहे तिष्ठतीत्यपरे विदुः ॥
अपरे सर्वलोकांश्च व्याप्य तिष्ठन्तमीश्वरम् ।
ब्रुवते केचिदत्रैव तिलतैलवदास्थितम् ॥
कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष (जीवात्मा) सुख-दुःखके भोक्तापनमें हेतु कहा जाता है। दूसरे लोग ऐसा मानते हैं कि तेजोमय आत्मा इस शरीरके भीतर स्थित है। यह अजर, अचिन्त्य, अव्यक्त और सनातन है। कुछ विचारक सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हुए परमेश्वरको ही तिलमें तेलकी भाँति इस शरीरमें जीवात्मारूपसे विद्यमान बताते हैं॥
अपरे नास्तिका मूढा भिन्नत्वात् स्थूललक्षणैः ।
नास्त्यात्मेति विनिश्चित्य प्रजास्ते निरयालयाः ॥
एवं नानाविधानेन विमृशन्ति महेश्वरम् ॥
दूसरे मूर्ख नास्तिक मनुष्य स्थूल लक्षणोंसे भिन्न होनेके कारण आत्माकी सत्ता ही नहीं मानते हैं। 'आत्मा नहीं है' ऐसा निश्चय कर वे लोग नरकके निवासी होते हैं। इस प्रकार महेश्वरके विषयमें नाना प्रकारसे विचार करते हैं॥

उमोवाच

ऊहवान् ब्राह्मणो लोके नित्यमक्षरमव्ययम् ।
अस्त्यात्मा सर्वदेहेषु हेतुस्तत्र सुदुर्गमः ॥
उमाने कहा— भगवन्! लोकमें जो विचारशील ब्राह्मण है, वह तो यही बताता है कि सम्पूर्ण शरीरमें नित्य, अक्षर, अविनाशी आत्मा अवश्य है। परंतु इसकी सत्यतामें क्या कारण है, इसे जानना अत्यन्त कठिन है॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ऋषिभिश्चापि देवैश्च व्यक्तमेष न दृश्यते ।
दृष्ट्वा तु तं महात्मानं पुनस्तन्न निवर्तते ॥
तस्मात् तद्दर्शनादेव विन्दते परमां गतिम् ।
इति ते कथितो देवि सांख्यधर्मः सनातनः ॥
कपिलादिभिराचार्यैः सेवितः परमर्षिभिः ॥