भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1371, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1371

विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु ।। इन सबका लक्षण और आरम्भसे ही पृथक्-पृथक् विकल्प मैं विस्तारपूर्वक बताऊँगा, उसकी व्याख्या सुनो ।।

नित्यमेकमणु व्यापि क्रियाहीनमहेतुकम् । अग्राह्यमिन्द्रियैः सर्वैरेतदव्यक्तलक्षणम् ।। अव्यक्तं प्रकृतिमूलं प्रधानं योनिरव्ययम् । अव्यक्तस्यैव नामानि शब्दैः पर्यायवाचकैः ।। नित्य, एक, अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, क्रियाहीन, हेतुरहित और सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य होना—यह अव्यक्तका लक्षण है। अव्यक्त, प्रकृति, मूल, प्रधान, योनि और अविनाशी—इन पर्यायवाची शब्दोंद्वारा अव्यक्तके ही नाम बताये जाते हैं ।।

तत् सूक्ष्मत्वानिर्देश्यं तत् सदित्यभिधीयते । तन्मूलं च जगत् सर्वं तन्मूला सृष्टिरिष्यते ।। वह अव्यक्त अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण अनिर्देश्य है—उसका वाणीद्वारा कोई संकेत नहीं किया जा सकता। वह 'सत्' कहलाता है। सम्पूर्ण जगत्का मूल वही है और सृष्टिका मूल भी उसीको बताया गया है ।।

सत्त्वादयः प्रकृतिजा गुणास्तान् प्रब्रवीम्यहम् ।। सुखं तुष्टिः प्रकाशश्च त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः । रागद्वेषौ सुखं दुःखं स्तम्भश्च रजसो गुणाः ।। सत्त्व आदि जो प्राकृत गुण हैं, उनको बता रहा हूँ। सुख, संतोष, प्रकाश—ये तीन सात्त्विक गुण हैं। राग-द्वेष, सुख-दुःख तथा उद्दण्डता—ये रजोगुणके गुण हैं ।।

अप्रकाशो भयं मोहस्तन्द्री च तमसो गुणाः ।। श्रद्धा प्रहर्षो विज्ञानमसम्मोहो दया धृतिः । सत्त्वे प्रवृद्धे वर्धन्ते विपरीते विपर्ययः ।। प्रकाशका अभाव, भय, मोह और आलस्यको तमोगुणके गुण समझो। श्रद्धा, हर्ष, विज्ञान, असम्मोह, दया और धैर्य—ये भाव सत्त्वगुणके बढ़नेपर बढ़ते हैं और तमोगुणके बढ़नेपर इनके विपरीत भाव अश्रद्धा आदिकी वृद्धि होती है ।।

कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथा मृषा । प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वशः ।। विषादः संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा । तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम् ।। काम, क्रोध, मानसिक संताप, लोभ, मोह (आसक्ति) तथा मिथ्याभाषण—ये सारे दोष रजोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं। विषाद, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा, भय—ये तमोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं ।।