भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1370, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1370

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[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]

श्रीमहेश्वर उवाच

सांख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत् ते शुचिस्मिते ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्यः संसारेषु प्रवर्तते ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शुचिस्मिते! अब मैं तुमसे सांख्यज्ञानका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता ॥

ज्ञानेनैव विमुक्तास्ते सांख्याः संन्यासकोविदाः ।
शारीरं तु तपो घोरं सांख्याः प्राहुर्निरर्थकम् ॥
संन्यासकुशल सांख्यज्ञानी ज्ञानसे ही मुक्त हो जाते हैं। वे घोर शारीरिक तपको व्यर्थ बताते हैं ॥

पञ्चविंशतिकं ज्ञानं तेषां ज्ञानमिति स्मृतम् ।
मूलप्रकृतिरव्यक्तमव्यक्ताज्जायते महान् ॥
महतोऽभूदहंकारस्तस्मात् तन्मात्रपञ्चकम् ।
इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रेभ्यो भवन्त्युत ॥
तेभ्यो भूतानि पञ्चभ्यः शरीरं वै प्रवर्तते ।
इति क्षेत्रस्य संक्षेपः चतुर्विंशतिरिष्यते ॥
पञ्चविंशतिरित्याहुः पुरुषेणेह संख्यया ॥
पचीस तत्त्वोंका ज्ञान ही सांख्यज्ञान माना गया है। मूलप्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं, अव्यक्तसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्वसे अहंकार प्रकट होता है और अहंकारसे पाँच तन्मात्राओंकी उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओंसे दस इन्द्रियों और एक मनकी उत्पत्ति होती है। उनसे पाँच भूत प्रकट होते हैं और पाँच भूतोंसे इस शरीरका निर्माण होता है। यही क्षेत्रका संक्षेप स्वरूप है। इसीको चौबीस तत्त्वोंका समुदाय कहते हैं। इनमें पुरुषकी भी गणना कर लेनेपर कुल पचीस तत्त्व बताये गये हैं ॥

सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
तैः सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिस्त्वात्मजैर्गुणैः ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
विकाराः प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभिः ॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकृतिजनित गुण हैं। प्रकृति इन तीनों आत्मज गुणोंसे सम्पूर्ण लोककी सृष्टि करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति—इन्हें मनीषी पुरुषोंको प्रकृतिके विकार जानना चाहिये ॥

लक्षणं चापि सर्वेषां विकल्पस्त्वादितः पृथक् ।