महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1369, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैराग्येण परां शान्तिं लभन्ते मानवाः शुभे ।
मोक्षस्योपनिषद् दिव्यं वैराग्यमिति निश्चितम् ॥
एतत् ते कथितं देवि वैराग्योत्पादनं वचः ।
एवं संचिन्त्य संचिन्त्य मुच्यन्ते हि मुमुक्षवः ॥
इस प्रकार सदा सभी पदार्थोंकी अनित्यताका चिन्तन करते हुए पुरुषको शीघ्र ही एक दूसरेसे वैराग्य होता है, जो मोक्षका कारण है। उस उद्वेगसे उसके मनमें पुनः विमर्श पैदा होता है। समस्त द्रव्योंकी ओरसे जो वैराग्य पैदा होता है, उसीका नाम विमर्श है। शुभे! वैराग्यसे मनुष्योंको बड़ी शान्ति मिलती है। वैराग्य मोक्षका निकटतम एवं दिव्य साधन है, यह निश्चितरूपसे कहा गया है। देवि! यह तुमसे वैराग्य उत्पन्न करनेवाला वचन कहा गया है। मुमुक्षु पुरुष इस प्रकार बारंबार विचार करनेसे मुक्त हो जाते हैं ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)