महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वैराग्येण परां शान्तिं लभन्ते मानवाः शुभे ।
मोक्षस्योपनिषद् दिव्यं वैराग्यमिति निश्चितम् ॥
एतत् ते कथितं देवि वैराग्योत्पादनं वचः ।
एवं संचिन्त्य संचिन्त्य मुच्यन्ते हि मुमुक्षवः ॥
इस प्रकार सदा सभी पदार्थोंकी अनित्यताका चिन्तन करते हुए पुरुषको शीघ्र ही एक दूसरेसे वैराग्य होता है, जो मोक्षका कारण है। उस उद्वेगसे उसके मनमें पुनः विमर्श पैदा होता है। समस्त द्रव्योंकी ओरसे जो वैराग्य पैदा होता है, उसीका नाम विमर्श है। शुभे! वैराग्यसे मनुष्योंको बड़ी शान्ति मिलती है। वैराग्य मोक्षका निकटतम एवं दिव्य साधन है, यह निश्चितरूपसे कहा गया है। देवि! यह तुमसे वैराग्य उत्पन्न करनेवाला वचन कहा गया है। मुमुक्षु पुरुष इस प्रकार बारंबार विचार करनेसे मुक्त हो जाते हैं ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]
[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
सांख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत् ते शुचिस्मिते ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्यः संसारेषु प्रवर्तते ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शुचिस्मिते! अब मैं तुमसे सांख्यज्ञानका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता ॥
ज्ञानेनैव विमुक्तास्ते सांख्याः संन्यासकोविदाः ।
शारीरं तु तपो घोरं सांख्याः प्राहुर्निरर्थकम् ॥
संन्यासकुशल सांख्यज्ञानी ज्ञानसे ही मुक्त हो जाते हैं। वे घोर शारीरिक तपको व्यर्थ बताते हैं ॥
पञ्चविंशतिकं ज्ञानं तेषां ज्ञानमिति स्मृतम् ।
मूलप्रकृतिरव्यक्तमव्यक्ताज्जायते महान् ॥
महतोऽभूदहंकारस्तस्मात् तन्मात्रपञ्चकम् ।
इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रेभ्यो भवन्त्युत ॥
तेभ्यो भूतानि पञ्चभ्यः शरीरं वै प्रवर्तते ।
इति क्षेत्रस्य संक्षेपः चतुर्विंशतिरिष्यते ॥
पञ्चविंशतिरित्याहुः पुरुषेणेह संख्यया ॥
पचीस तत्त्वोंका ज्ञान ही सांख्यज्ञान माना गया है। मूलप्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं, अव्यक्तसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्वसे अहंकार प्रकट होता है और अहंकारसे पाँच तन्मात्राओंकी उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओंसे दस इन्द्रियों और एक मनकी उत्पत्ति होती है। उनसे पाँच भूत प्रकट होते हैं और पाँच भूतोंसे इस शरीरका निर्माण होता है। यही क्षेत्रका संक्षेप स्वरूप है। इसीको चौबीस तत्त्वोंका समुदाय कहते हैं। इनमें पुरुषकी भी गणना कर लेनेपर कुल पचीस तत्त्व बताये गये हैं ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
तैः सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिस्त्वात्मजैर्गुणैः ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
विकाराः प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभिः ॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकृतिजनित गुण हैं। प्रकृति इन तीनों आत्मज गुणोंसे सम्पूर्ण लोककी सृष्टि करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति—इन्हें मनीषी पुरुषोंको प्रकृतिके विकार जानना चाहिये ॥
लक्षणं चापि सर्वेषां विकल्पस्त्वादितः पृथक् ।
विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु ।। इन सबका लक्षण और आरम्भसे ही पृथक्-पृथक् विकल्प मैं विस्तारपूर्वक बताऊँगा, उसकी व्याख्या सुनो ।।
नित्यमेकमणु व्यापि क्रियाहीनमहेतुकम् । अग्राह्यमिन्द्रियैः सर्वैरेतदव्यक्तलक्षणम् ।। अव्यक्तं प्रकृतिमूलं प्रधानं योनिरव्ययम् । अव्यक्तस्यैव नामानि शब्दैः पर्यायवाचकैः ।। नित्य, एक, अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, क्रियाहीन, हेतुरहित और सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य होना—यह अव्यक्तका लक्षण है। अव्यक्त, प्रकृति, मूल, प्रधान, योनि और अविनाशी—इन पर्यायवाची शब्दोंद्वारा अव्यक्तके ही नाम बताये जाते हैं ।।
तत् सूक्ष्मत्वानिर्देश्यं तत् सदित्यभिधीयते । तन्मूलं च जगत् सर्वं तन्मूला सृष्टिरिष्यते ।। वह अव्यक्त अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण अनिर्देश्य है—उसका वाणीद्वारा कोई संकेत नहीं किया जा सकता। वह 'सत्' कहलाता है। सम्पूर्ण जगत्का मूल वही है और सृष्टिका मूल भी उसीको बताया गया है ।।
सत्त्वादयः प्रकृतिजा गुणास्तान् प्रब्रवीम्यहम् ।। सुखं तुष्टिः प्रकाशश्च त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः । रागद्वेषौ सुखं दुःखं स्तम्भश्च रजसो गुणाः ।। सत्त्व आदि जो प्राकृत गुण हैं, उनको बता रहा हूँ। सुख, संतोष, प्रकाश—ये तीन सात्त्विक गुण हैं। राग-द्वेष, सुख-दुःख तथा उद्दण्डता—ये रजोगुणके गुण हैं ।।
अप्रकाशो भयं मोहस्तन्द्री च तमसो गुणाः ।। श्रद्धा प्रहर्षो विज्ञानमसम्मोहो दया धृतिः । सत्त्वे प्रवृद्धे वर्धन्ते विपरीते विपर्ययः ।। प्रकाशका अभाव, भय, मोह और आलस्यको तमोगुणके गुण समझो। श्रद्धा, हर्ष, विज्ञान, असम्मोह, दया और धैर्य—ये भाव सत्त्वगुणके बढ़नेपर बढ़ते हैं और तमोगुणके बढ़नेपर इनके विपरीत भाव अश्रद्धा आदिकी वृद्धि होती है ।।
कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथा मृषा । प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वशः ।। विषादः संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा । तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम् ।। काम, क्रोध, मानसिक संताप, लोभ, मोह (आसक्ति) तथा मिथ्याभाषण—ये सारे दोष रजोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं। विषाद, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा, भय—ये तमोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं ।।
एवमन्योन्यमेतानि वर्धन्ते च पुनः पुनः । हीयन्ते च तथा नित्यमभिभूतानि भूरिशः ॥ इस प्रकार ये तीनों गुण बारंबार परस्पर बढ़ते हैं और एक-दूसरेसे अभिभूत होनेपर सदा ही क्षीण होते हैं ॥ तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं कायेन मनसापि वा । वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तदा ॥ यदा संतापसंयुक्तं चित्तक्षोभकरं भवेत् । वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत् ॥ इनमें शरीर अथवा मनसे जो प्रसन्नतायुक्त भाव हो, उसे सात्त्विक भाव है—ऐसा माने और अन्य भावोंकी उपेक्षा कर दे। जब चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला संतापयुक्त भाव हो, तब उसे रजोगुणकी प्रवृत्ति माने ॥ यदा सम्मोहसंयुक्तं यद् विषादकरं भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ समासात् सात्त्विको धर्मः समासाद् राजसं धनम् । समासात् तामसः कामस्त्रिवर्गे त्रिगुणाः क्रमात् ॥ ब्रह्मादिदेवसृष्टिर्या सात्त्विकीति प्रकीर्त्यते । राजसी मानुषी सृष्टिः तिर्यग्योनिस्तु तामसी ॥ जब मोहयुक्त और विषाद उत्पन्न करनेवाला भाव अतर्क्य और अज्ञातरूपसे प्रकट हो, तब उसे तमोगुणका कार्य समझना चाहिये। धर्म सात्त्विक है, धन राजस है और काम तामस बताया गया है। इस प्रकार त्रिवर्गमें क्रमशः तीनों गुणोंकी स्थिति संक्षेपमें बतायी गयी है। ब्रह्मा आदि देवताओंकी जो सृष्टि है, वह सात्त्विकी बतायी जाती है। मनुष्योंकी राजसी सृष्टि है और तिर्यग्योनि तामसी कही गयी है ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ देवमानुषतिर्यक्षु यद्भूतं सचराचरम् । आदिप्रभृति संयुक्तं व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्गुणैः ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि महदादीनि लिङ्गतः । विज्ञानं च विवेकश्च महतो लक्षणं भवेत् ॥ सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले पुरुष ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग आदि) में जाते हैं, रजोगुणी पुरुष मध्यलोक (मनुष्य-योनि) में स्थित होते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदिमें स्थित हुए तामस पुरुष अधोगतिको—कीट-पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरक आदिको प्राप्त होते हैं। देवता, मनुष्य तथा तिर्यक् आदि योनियोंमें जो चराचर प्राणी हैं, वे आदि कालसे ही इन तीनों गुणोंद्वारा संयुक्त एवं व्याप्त हैं। अब मैं महत् आदि
त्त्वोंके लक्षण बताऊँगा। बुद्धिके द्वारा जो विवेक और ज्ञान होता है, वही शरीरमें महत्तत्त्वका लक्षण है।। महान् बुद्धिमतिः प्रज्ञा नामानि महतो विदुः । अहङ्कारः स विज्ञेयो लक्षणेन समासतः ।। अहङ्कारेण भूतानां सर्गो नानाविधो भवेत् । अहङ्कारनिवृत्तिर्हि निर्वाणायोपपद्यते ।। महान्, बुद्धि, मति और प्रज्ञा—ये महत्तत्त्वके नाम माने गये हैं। संक्षेपसे लक्षणद्वारा अहंकारका विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अहंकारसे ही प्राणियोंकी नाना प्रकारकी सृष्टि होती है। अहंकारकी निवृत्ति मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली होती है ।। खं वायुरग्निः सलिलं पृथिवी चेति पञ्चमी । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पाँचवीं पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं। ये ही समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।। शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् । स्पर्शवत् प्राणिनां चेष्टा पवनस्य गुणाः स्मृताः ।। शब्द, श्रवणेन्द्रिय तथा इन्द्रियोंके छिद्र—ये तीनों आकाशसे प्रकट हुए हैं। स्पर्श और प्राणियोंकी चेष्टा—ये वायुके गुण माने गये हैं ।। रूपं पाकोऽक्षिणी ज्योतिश्चत्वारस्तेजसो गुणाः । रसः स्नेहस्तथा जिह्वा शैत्यं च जलजा गुणाः ।। रूप, पाक, नेत्र और ज्योति—ये चार तेजके गुण हैं। रस, स्नेह, जिह्वा और शीतलता—ये चार जलके गुण हैं ।। गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिव्यास्ते गुणास्त्रयः । इति सर्वगुणा देवि विख्याताः पाञ्चभौतिकाः ।। गन्ध, घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये पृथिवीके तीन गुण हैं। देवि! इस प्रकार पाँचों भूतोंके समस्त गुण विख्यात हैं ।। गुणान् पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तराणि तु । तस्मान्नैकगुणाश्चेह दृश्यते भूतसृष्टयः ।। उपलभ्याप्सु ये गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । अपां गन्धगुणं प्राज्ञा नेच्छन्ति कमलेक्षणे ।। उत्तरोत्तर भूत पूर्व-पूर्व भूतके गुण ग्रहण करते हैं। इसीलिये यहाँ प्राणियोंकी सृष्टि अनेक गुणोंसे युक्त दिखायी देती है। कमलेक्षणे! कुछ अयोग्य मनुष्य जो जलमें सुगन्ध या दुर्गन्ध पाकर गन्धको जलका गुण बताते हैं, उसे विद्वान् पुरुष नहीं स्वीकार करते हैं ।। तद् गन्धत्वमपां नास्ति पृथिव्या एव तद् गुणः ।
भूमिर्गन्धे रसे स्नेहो ज्योतिश्चक्षुषि संस्थितम् ।।
जलमें गन्ध नहीं है, गन्ध पृथ्वीका ही गुण है। गन्धमें भूमि, रसमें जल तथा नेत्रमें तेजकी स्थिति है ।।
प्राणापानाश्रयो वायुः खेष्वाकाशः शरीरिणाम् ।
केशास्थिनखदन्तत्वक्पाणिपादशिरांसि च ।
पृष्ठोदरकटीग्रीवाः सर्वं भूम्यात्मकं स्मृतम् ।।
प्राण और अपानका आश्रय वायु है। देहधारियोंके शरीरमें जितने छिद्र हैं, उन सबमें आकाश व्याप्त है। केश, हड्डी, नख, दाँत, त्वचा, हाथ, पैर, सिर, पीठ, पेट, कमर और गर्दन—ये सब भूमिके कार्य माने गये हैं ।।
यत् किंचिदपि कायेऽस्मिन् धातुदोषमलाश्रितम् ।
तत् सर्वं भौतिकं विद्धि देहैरेवास्य स्वामिकम् ।।
इस शरीरमें जो कुछ भी धातु, दोष और मल-सम्बन्धी वस्तुएँ हैं, उन सबको पांचभौतिक समझो। शरीरोंके द्वारा ही इस विश्वपर पंचभूतोंका स्वामित्व है ।।
बुद्धीन्द्रियाणि कर्णत्वक्चक्षुर्जिह्वाथ नासिका ।
कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादौ मेढ्रं गुदस्तथा ।।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
बुद्धीन्द्रियार्थान् जानीयाद् भूतेभ्यस्त्वभिनिःसृतान् ।।
कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, वाक्, मेढ्र (लिंग) और गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—इन्हें ज्ञानेन्द्रियोंके विषय समझें। ये पाँचों भूतोंसे प्रकट हुए हैं ।।
वाक्यं क्रिया गतिः प्रीतिरुत्सर्गश्चेति पञ्चधा ।
कर्मेन्द्रियार्थान् जानीयात् ते च भूतोद्भवा मताः ।।
इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते ।
प्रार्थनालक्षणं तच्च इन्द्रियं तु मनः स्मृतम् ।।
वाक्य, क्रिया, गति, प्रीति और उत्सर्ग—ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय जानें। ये भी पञ्चभूतोंसे उत्पन्न हुए माने गये हैं। समस्त इन्द्रियोंका स्वामी या प्रेरक मन कहलाता है। उसका लक्षण है प्रार्थना (किसी वस्तुकी चाह)। मनको भी इन्द्रिय ही माना गया है ।।
नियुङ्क्ते च सदा तानि भूतानि मनसा सह ।
नियमे च विसर्गे च मनसः कारणं प्रभुः ।।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना धृतिः ।
भूताभूतविकारश्च शरीरमिति संस्थितम् ।।
जो प्रभु (आत्मा) मनके नियन्त्रण और सृष्टिमें कारण है, वही मनसहित सम्पूर्ण भूतोंको सदा विभिन्न कार्योंमें नियुक्त करता है। इन्द्रिय, इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव, चेतना,
धृति तथा भूताभूत-विकार—ये सब मिलकर शरीर हैं।। शरीराच्च परो देही शरीरं च व्यपाश्रितः। शरीरिणः शरीरस्य सोऽन्तरं वेत्ति वै मुनिः।। शरीरसे परे शरीरधारी आत्मा है, जो शरीरका ही आश्रय लेकर रहता है। जो शरीर और शरीरीका अन्तर जानता है, वही मुनि है।। रसः स्पर्शश्च गन्धश्च रूपं शब्दविवर्जितम्। अशरीरं शरीरेषु दिदृक्षेत् निरिन्द्रियम्।। रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्दसे रहित, इन्द्रियहीन अशरीरी आत्माको शरीरके भीतर देखनेकी इच्छा करे।। अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येष्वमरमाश्रितम्। यः पश्येत् परमात्मानं बन्धनैः स विमुच्यते।। जो सम्पूर्ण मर्त्य शरीरोंमें अव्यक्त भावसे स्थित एवं अमर है, उस परमात्माको जो देखता है, वह बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।। स हि सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च। वसत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वितः।। नैव चोर्ध्वं न तिर्यक् च नाधस्तान्न कदाचन। इन्द्रियैरिह बुद्ध्या वा न दृश्येत कदाचन।। नाना भावोंसे युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला ही सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें निवास करता है। वह न ऊपर, न अगल-बगलमें और न नीचे ही कभी दिखायी देता है। वह यहाँ इन्द्रियों अथवा बुद्धिके द्वारा कदापि दिखायी नहीं देता।। नवद्वारं पुरं गत्वा सततं नियतो वशी। ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च।। तमेवाहुरणुभ्योऽणुं तं महद्भ्यो महत्तरम्। बहुधा सर्वभूतानि व्याप्य तिष्ठति शाश्वतम्।। क्षेत्रज्ञमेकतः कृत्वा सर्वं क्षेत्रमथैकतः। एवं संविमृशेज्ज्ञानी संयतः सततं हृदि।। नौ द्वारवाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियमपूर्वक निवास करता है। सबको वशमें रखता है। सम्पूर्ण लोकोंमें चराचर प्राणियोंका शासन करनेवाला ईश्वर भी वही है। उसे अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् कहते हैं। वह नाना प्रकारके सभी प्राणियोंको व्याप्त करके सदा स्थित रहता है। क्षेत्रज्ञको एक ओर करके दूसरी ओर सम्पूर्ण क्षेत्रको पृथक् करके रखे। संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञानी पुरुष सदा इस प्रकार अपने हृदयमें विचार करता रहे—जड और चेतनकी पृथक्ताका विवेचन किया करे।। पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।
अकर्तालेपको नित्यो मध्यस्थः सर्वकर्मणाम् ॥
पुरुष प्रकृतिमें स्थित रहकर ही उससे उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है। वह अकर्ता, निर्लेप, नित्य और समस्त कर्मोंका मध्यस्थ है॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
अजरोऽयमचिन्त्योऽयमव्यक्तोऽयं सनातनः ।
देही तेजोमयो देहे तिष्ठतीत्यपरे विदुः ॥
अपरे सर्वलोकांश्च व्याप्य तिष्ठन्तमीश्वरम् ।
ब्रुवते केचिदत्रैव तिलतैलवदास्थितम् ॥
कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष (जीवात्मा) सुख-दुःखके भोक्तापनमें हेतु कहा जाता है। दूसरे लोग ऐसा मानते हैं कि तेजोमय आत्मा इस शरीरके भीतर स्थित है। यह अजर, अचिन्त्य, अव्यक्त और सनातन है। कुछ विचारक सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हुए परमेश्वरको ही तिलमें तेलकी भाँति इस शरीरमें जीवात्मारूपसे विद्यमान बताते हैं॥
अपरे नास्तिका मूढा भिन्नत्वात् स्थूललक्षणैः ।
नास्त्यात्मेति विनिश्चित्य प्रजास्ते निरयालयाः ॥
एवं नानाविधानेन विमृशन्ति महेश्वरम् ॥
दूसरे मूर्ख नास्तिक मनुष्य स्थूल लक्षणोंसे भिन्न होनेके कारण आत्माकी सत्ता ही नहीं मानते हैं। 'आत्मा नहीं है' ऐसा निश्चय कर वे लोग नरकके निवासी होते हैं। इस प्रकार महेश्वरके विषयमें नाना प्रकारसे विचार करते हैं॥
उमोवाच
ऊहवान् ब्राह्मणो लोके नित्यमक्षरमव्ययम् ।
अस्त्यात्मा सर्वदेहेषु हेतुस्तत्र सुदुर्गमः ॥
उमाने कहा— भगवन्! लोकमें जो विचारशील ब्राह्मण है, वह तो यही बताता है कि सम्पूर्ण शरीरमें नित्य, अक्षर, अविनाशी आत्मा अवश्य है। परंतु इसकी सत्यतामें क्या कारण है, इसे जानना अत्यन्त कठिन है॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ऋषिभिश्चापि देवैश्च व्यक्तमेष न दृश्यते ।
दृष्ट्वा तु तं महात्मानं पुनस्तन्न निवर्तते ॥
तस्मात् तद्दर्शनादेव विन्दते परमां गतिम् ।
इति ते कथितो देवि सांख्यधर्मः सनातनः ॥
कपिलादिभिराचार्यैः सेवितः परमर्षिभिः ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! ऋषि और देवता भी इस परमात्माको प्रत्यक्ष नहीं देख पाते हैं। जो वास्तवमें उन परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, वह पुनः इस संसारमें नहीं लौटता है। देवि! अतः उस परमात्माके दर्शनसे ही परमगतिकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार यह सनातन सांख्यधर्म तुम्हें बताया गया है; जो कपिल आदि आचार्यों एवं महर्षियोंद्वारा सेवित है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]
[योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
सांख्यज्ञाने नियुक्तानां यथावत् कीर्तितं मया ।
योगधर्मं पुनः कृत्स्नं कीर्तयिष्यामि ते शृणु ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! जो लोग सांख्यज्ञानमें नियुक्त हैं, उनके धर्मका मैंने यथावत् रूपसे वर्णन किया। अब तुमसे पुनः सम्पूर्ण योगधर्मका प्रतिपादन करूँगा, सुनो ॥
स च योगो द्विधा भिन्नो ब्रह्मदेवर्षिसम्मतः ।
समानमुभयत्रापि वृत्तं शास्त्रप्रचोदितम् ॥
वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंद्वारा सम्मत योग सबीज और निर्बीजके भेदसे दो प्रकारका है। उन दोनोंमें ही शास्त्रोक्त सदाचार समान है ॥
स चाष्टगुणमैश्वर्यमधिकृत्य विधीयते ।
सायुज्यं सर्वदेवानां योगधर्मः पराश्रितः ॥
ज्ञानं सर्वस्य योगस्य मूलमित्यवधारय ।
व्रतोपवासनियमैः तत् सर्वं चापि बृंहयेत् ॥
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व—इन आठ भेदोंवाले ऐश्वर्यपर अधिकार करके योगका अनुष्ठान किया जाता है। सम्पूर्ण देवताओंका सायुज्य पराश्रित योगधर्म है। ज्ञान सम्पूर्ण योगका मूल है, ऐसा समझो। साधकको व्रत, उपवास और नियमोंद्वारा उस सम्पूर्ण ज्ञानकी वृद्धि करनी चाहिये ॥
ऐकाग्र्यं बुद्धिमन्सोरीन्द्रियाणां च सर्वशः ।
आत्मनोऽव्ययिनः प्राज्ञे ज्ञानमेतत् तु योगिनाम् ॥
अर्चयेद् ब्राह्मणानग्निं देवतायतनानि च ।
वर्जयेदशिवं भावं सर्वसत्त्वमुपाश्रितः ॥
बुद्धिमती पार्वती! अविनाशी आत्मामें बुद्धि, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी एकाग्रता हो, यही योगियोंका ज्ञान है। ब्राह्मण, अग्नि और देवमन्दिरोंकी पूजा करे तथा पूर्णतः सत्त्वगुणका आश्रय लेकर अमांगलिक भावको त्याग दे ॥
दानमध्ययनं श्रद्धा व्रतानि नियमास्तथा ।
सत्यमाहारशुद्धिश्च शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥
एतैश्च वर्धते तेजः पापं चाप्यवधूयते ॥
दान, अध्ययन, श्रद्धा, व्रत, नियम, सत्य, आहार-शुद्धि, शौच और इन्द्रिय-निग्रह—इनके द्वारा तेजकी वृद्धि होती है और पाप धुल जाता है ॥
निर्धूतपापस्तेजस्वी निराहारो जितेन्द्रियः ।
अमोघो निर्मलो दान्तः पश्चाद् योगं समाचरेत् ॥
जिसका पाप धुल गया है, वह पहले तेजस्वी, निराहार, जितेन्द्रिय, अमोघ, निर्मल और मनका दमन करनेमें समर्थ हो जाय। तत्पश्चात् योगका अभ्यास करे।। एकान्ते विजने देशे सर्वतः संवृते शुचौ। कल्पयेदासनं तत्र स्वास्तीर्णं मृदुभिः कुशैः।। एकान्त निर्जन प्रदेशमें, जो सब ओरसे घिरा हुआ और पवित्र हो, कोमल कुशोंसे एक आसन बनाये और उसे वहाँ भलीभाँति बिछा दे।। उपविश्यासने तस्मिन्नृजुकायशिरोधरः। अव्यग्रः सुखमासीनः स्वाङ्गानि न विकम्पयेत्।। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। उस आसनपर बैठकर अपने शरीर और गर्दनको सीधी किये रहे। मनमें किसी प्रकारकी व्यग्रता न आने दे। सुखपूर्वक बैठकर अपने अंगोंको हिलने-डुलने न दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात न करते हुए ध्यानमग्न हो जाय।। मनोऽवस्थापनं देवि योगस्योपनिषद् भवेत्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन मनोऽवस्थापयेत् सदा।। त्वक्श्रोत्रं च ततो जिह्वां घ्राणं चक्षुश्च संहरेत्। पञ्चेन्द्रियाणि संधाय मनसि स्थापयेद् बुधः।। देवि! मनको दृढ़तापूर्वक स्थापित करना योगकी सिद्धिका सूचक है; अतः सम्पूर्ण प्रयत्न करके मनको सदा स्थिर रखे। त्वचा, कान, जिह्वा, नासिका और नेत्र—इन सबको विषयोंकी ओरसे समेटे। पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके विद्वान् पुरुष उन्हें मनमें स्थापित करे।। सर्वं चापोह्य संकल्पमात्मनि स्थापयेन्मनः। यदैतान्यवतिष्ठन्ते मनःषष्ठानि चात्मनि।। प्राणापानौ तदा तस्य युगपत् तिष्ठतो वशे। प्राणे हि वशमापन्ने योगसिद्धिर्ध्रुवा भवेत्।। शरीरं चिन्तयेत् सर्वं विपाट्य च समीपतः। अन्तर्देहगतिं चापि प्राणानां परिचिन्तयेत्।। फिर सारे संकल्पोंको हटाकर मनको आत्मामें स्थापित करे। जब मनसहित ये पाँचों इन्द्रियाँ आत्मामें स्थिर हो जाती हैं, तब प्राण और अपान वायु एक ही साथ वशमें हो जाते हैं। प्राणके वशमें हो जानेपर योगसिद्धि अटल हो जाती है। सारे शरीरको निकटसे उजाड़-उघाड़कर देखे और यह क्या है? इसका चिन्तन करे। शरीरके भीतर जो प्राणोंकी गति है, उसपर भी विचार करे।। ततो मूर्धानमग्निं च शरीरं परिपालयेत्।
प्राणो मूर्धनि च श्वासो वर्तमानो विचेष्टते ॥ सज्जस्तु सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयाश्च सः ॥ बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रितः । वहन् मूत्रं पुरीषं च सदापानः प्रवर्तते ॥ अथ प्रवृत्तिर्देहेषु कर्मापानस्य सम्मतम् । उदीरयन् सर्वधातून् अत ऊर्ध्वं प्रवर्तते ॥ उदान इति तं विद्युरध्यात्मकुशला जनाः ॥
तत्पश्चात् मूर्धा, अग्नि और शरीरका परिपालन करे। मूर्धामें प्राणकी स्थिति है, जो श्वासरूपमें वर्तमान होकर चेष्टा करता है। सदा सन्नद्ध रहनेवाला प्राण ही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है। वही मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत और विषयरूप है। वस्तिके मूलभाग, गुदा और अग्निके आश्रित हो अपानवायु सदा मल-मूत्रका वहन करती हुई अपने कार्यमें प्रवृत्त होती है। देहोंमें प्रवृत्ति अपानवायुका कर्म मानी गयी है। जो वायु समस्त धातुओंको ऊपर उठाती हुई अपानसे ऊपरकी ओर प्रवृत्त होती है, उसे अध्यात्मकुशल मनुष्य 'उदान' मानते हैं।
संधौ संधौ स निर्विष्टः सर्वचेष्टाप्रवर्तकः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ धातुष्वग्नौ च विततः समानोऽग्निः समीरणः ॥ स एव सर्वचेष्टानामान्तकाले निवर्तकः ॥
जो वायु मनुष्योंके शरीरोंकी एक-एक संधिमें व्याप्त होकर उनकी सम्पूर्ण चेष्टाओंमें प्रवृत्त होती है, उसे 'व्यान' कहते हैं। जो धातुओं और अग्निमें भी व्याप्त है, वह अग्निस্বরূপ 'समान' वायु है। वही अन्तकालमें समस्त चेष्टाओंका निवर्त्तक होता है ।।
प्राणानां संनिपातेषु संसर्गाद् यः प्रजायते । ऊष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेयः सोऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ अपानप्राणयोर्मध्ये व्यानोदानावुपाश्रितौ । समन्वितः समानेन सम्यक् पचति पावकः ॥ शरीरमध्ये नाभिः स्यान्नाभ्यामग्निः प्रतिष्ठितः । अग्नौ प्राणाश्च संयुक्ता प्राणेष्वात्मा व्यवस्थितः ॥
समस्त प्राणोंका परस्पर संयोग होनेपर संसर्गवश जो ताप प्रकट होता है, उसीको अग्नि जानना चाहिये। वह अग्नि देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाती है। अपान और प्राण वायुके मध्यभागमें व्यान और उदान वायु स्थित है। समान वायुसे युक्त हुई अग्नि सम्यक् रूपसे अन्नका पाचन करती है। शरीरके मध्यभागमें नाभि है। नाभिके भीतर अग्नि प्रतिष्ठित है। अग्निसे प्राण जुड़े हुए हैं और प्राणोंमें आत्मा स्थित है ।।
पक्वाशयस्त्वधो नाभेरुर्ध्वमामाशयस्तथा । नाभिर्मध्ये शरीरस्य सर्वप्राणाश्च संश्रिताः ॥ स्थिताः प्राणादयः सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधश्चराः । वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणाग्निचोदिताः ॥ योगिनामेष मार्गस्तु पञ्चस्वेतेषु तिष्ठति । जितश्रमः समासीनो मूर्ध्न्यात्मानमादधेत् ॥ नाभिके नीचे पक्वाशय और ऊपर आमाशय है। शरीरके ठीक मध्यभागमें नाभि है और समस्त प्राण उसीका आश्रय लेकर स्थित हैं। समस्त प्राण आदि ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलमें विचरनेवाले हैं। दस प्राणोंसे तथा अग्निसे प्रेरित हो नाड़ियाँ अन्नरसका वहन करती हैं। यह योगियोंका मार्ग है, जो पाँचों प्राणोंमें स्थित है। साधकको चाहिये कि श्रमको जीतकर आसनपर आसीन हो आत्माको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित करे ।।
मूर्ध्न्यात्मानमाधाय भ्रुवोर्मध्ये मनस्तथा । संनिरुध्य ततः प्राणानात्मानं चिन्तयेत् परम् ॥ प्राणे त्वपानं युञ्जीत प्राणांश्चापानकर्मणि । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरो भवेत् ॥ मूर्धामें आत्माको स्थापित करके दोनों भौंहोंके बीचमें मनका अवरोध करे। तत्पश्चात् प्राणको भलीभाँति रोककर परमात्माका चिन्तन करे। प्राणमें अपानका और अपान कर्ममें प्राणोंका योग करे। फिर प्राण और अपानकी गतिको अवरुद्ध करके प्राणायाममें तत्पर हो जाय ।।
एवमन्तः प्रयुञ्जीत पञ्च प्राणान् परस्परम् । विजने सम्मिताहारो मुनिस्तूष्णीं निरुच्छ्वसन् ॥ अश्रान्तश्चिन्तयेद् योगी उत्थाय च पुनः पुनः । तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् वापि युञ्जीतैवमतन्द्रितः ॥ इस प्रकार एकान्त प्रदेशमें बैठकर मिताहारी मुनि अपने अन्तःकरणमें पाँचों प्राणोंका परस्पर योग करे और चुपचाप उच्छ्वासरहित हो बिना किसी थकावटके ध्यानमग्न रहे। योगी पुरुष बारंबार उठकर भी चलते, सोते या ठहरते हुए भी आलस्य छोड़कर योगाभ्यासमें ही लगा रहे ।।
एवं नियुञ्जतस्तस्य योगिनो युक्तचेतसः । प्रसीदति मनः क्षिप्रं प्रसन्ने दृश्यते परम् ॥ विधूम इव दीप्तोऽग्निरादित्य इव रश्मिमान् । वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे पुरुषो दृश्यतेऽव्ययः ॥ इस प्रकार जिसका चित्त ध्यानमें लगा हुआ है, ऐसे योगाभ्यासपरायण योगीका मन शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और मनके प्रसन्न होनेपर परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता
है। उस समय अविनाशी पुरुष परमात्मा धूमरहित प्रकाशित अग्नि, अंशुमाली सूर्य और आकाशमें चमकने-वाली बिजलीके समान दिखायी देता है ।। दृष्ट्वा तदा मनो ज्योतिरैश्वर्याष्टगुणैर्युतः । प्राप्नोति परमं स्थानं स्पृहणीयं सुरैरपि ।। उस अवस्थामें मनके द्वारा ज्योतिर्मय परमेश्वरका दर्शन करके योगी अणिमा आदि आठ ऐश्वर्योंसे युक्त हो देवताओंके लिये भी स्पृहणीय परमपदको प्राप्त कर लेता है ।। इमान् योगस्य दोषांश्च दशैव परिचक्षते । दोषैर्विघ्नो वरारोहे योगिनां कविभिः स्मृतः ।। वरारोहे! विद्वानोंने दोषोंसे योगियोंके मार्गमें विघ्नकी प्राप्ति बतायी है। वे योगके निम्नांकित दस ही दोष बताते हैं ।। कामः क्रोधो भयं स्वप्नः स्नेहमत्यशनं तथा । वैचित्त्यं व्याधिरालस्यं लोभश्च दशमः स्मृतः ।। काम, क्रोध, भय, स्वप्न, स्नेह, अधिक भोजन, वैचित्त्य (मानसिक विकलता), व्याधि, आलस्य और लोभ—ये ही उन दोषोंके नाम हैं। इनमें लोभ दसवाँ दोष है ।। एतैस्तेषां भवेद् विघ्नो दशभिर्देवकारितैः । तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मनः ।। इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते । गुणैस्तैरष्टभिर्दिव्यमैश्वर्यमधिगम्यते ।। देवताओंद्वारा पैदा किये गये इन दस दोषोंसे योगियोंको विघ्न होता है; अतः पहले इन दस दोषोंको हटाकर मनको परमात्मामें लगावे। योगके निम्नांकित आठ गुण बताये जाते हैं, जिनसे युक्त दिव्य ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।। अणिमा महिमा चैव प्राप्तिः प्राकाम्यमेव हि । ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता ।। एतानष्टौ गुणान् प्राप्य कथंचिद् योगिनां वराः । ईशाः सर्वस्य लोकस्य देवानप्यतिशेरते ।। योगोऽस्ति नैवात्यशिनो न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतस्तथा ।। अणिमा, महिमा और गरिमा, लघिमा तथा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, जिसमें इच्छाओंकी पूर्ति होती है। योगियोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी तरह इन आठ गुणोंको पाकर सम्पूर्ण जगत्पर शासन करनेमें समर्थ हो देवताओंसे भी बढ़ जाते हैं। जो अधिक खानेवाला अथवा सर्वथा न खानेवाला है, अधिक सोनेवाला अथवा सर्वथा जागनेवाला है, उसका योग सिद्ध नहीं होता ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। अनेनैव विधानेन सायुज्यं तत् प्रकल्प्यते । सायुज्यं देवसात् कृत्वा प्रयुञ्जीतात्मभक्तितः ।। अनन्यमनसा देवि नित्यं तद्गतचेतसा । सायुज्यं प्राप्यते देवैर्यत्नेन महता चिरात् ।। हविर्भिरर्चनैर्होमैः प्रणामैर्नित्यचिन्तया । अर्चयित्वा यथाशक्ति स्वकं देवं विशन्ति ते ।।
दुःखोंका नाश करनेवाला यह योग उसी पुरुषका सिद्ध होता है, जो यथायोग्य आहार-विहार करनेवाला है, कर्मोंमें उपयुक्त चेष्टा करता है तथा उचित मात्रामें सोता और जागता है। इसी विधानसे देवसायुज्य प्राप्त होता है। अपनी भक्तिसे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करके योगसाधनामें तत्पर रहे। देवि! प्रतिदिन एकाग्र और अनन्य चित्त हो चिरकालतक महान् यत्न करनेसे देवताओंके साथ सायुज्य प्राप्त होता है। योगीजन हविष्य, पूजा, हवन, प्रणाम तथा नित्य चिन्तनके द्वारा यथाशक्ति आराधना करके अपने इष्टदेवके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।।
सायुज्यानां विशिष्टं च मामकं वैष्णवं तथा । मां प्राप्य न निवर्तन्ते विष्णुं वा शुभलोचने । इति ते कथितो देवि योगधर्मः सनातनः । न शक्यं प्रष्टुमन्यैर्योगधर्मस्त्वया विना ।।
शुभलोचने! सायुज्योंमें मेरा तथा श्रीविष्णुका सायुज्य श्रेष्ठ हैं। मुझे या भगवान् विष्णुको प्राप्त करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं लौटते हैं। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे सनातन योग-धर्मका वर्णन किया है। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस योगधर्मके विषयमें प्रश्न नहीं कर सकता था ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]
[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]
उमोवाच
त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ त्र्यम्बक त्रिदशाधिप ।
त्रिपुरान्तक कामाङ्गहर त्रिपथगाधर ।।
दक्षयज्ञप्रमथन शूलपाणेऽरिसूदन ।
नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ।।
उमाने पूछा— तीन नेत्रधारी! त्रिदशश्रेष्ठ! देवेश्वर! त्र्यम्बक! त्रिपुरोंका विनाश और कामदेवके शरीरको भस्म करनेवाले गंगाधर! दक्षयज्ञका नाश करनेवाले त्रिशूलधारी! शत्रुसूदन! लोकपालोंको भी वर देनेवाले लोकपालेश्वर! आपको नमस्कार है ।।
नैकशाखमपर्यन्तमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सांख्ययोगसमन्वितम् ।।
भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम् ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्गतं विभो ।।
कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम् ।
आचारः कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद् भवान् ।।
वर्ण्यमानं त्वया साक्षात् प्रीणयत्यधिकं हि माम् ।।
आपने मेरे पूछनेपर सुननेके लिये उत्सुक हुई मुझ दासीको वह उत्तम अध्यात्मज्ञान बताया है, जो अनेक शाखाओंसे युक्त, अनन्त, अतर्क्य, अविज्ञेय और सांख्ययोगसे युक्त है। प्रभो! इस समय मैं आपसे आपका ही सायुज्य सुनना चाहती हूँ। ये भक्तजन आप परमेष्ठीकी परिचर्या कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा होता है? किस साधनसे आप संतुष्ट होते हैं? साक्षात् आपके द्वारा प्रतिपादित होनेपर यह विषय मुझे अधिक प्रसन्नता प्रदान करता है ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम् ।
येन ते न निवर्तन्ते युक्ताः परमयोगिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे अपने अद्भुत सायुज्यका वर्णन करता हूँ, जिससे युक्त हो वे परम योगी पुरुष फिर संसारमें नहीं लौटते हैं ।।
अव्यक्तोऽहमचिन्त्योऽहं पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
सांख्ययोगौ मया सृष्टौ सर्वं चापि चराचरम् ।।
पहलेके मुमुक्षुओंद्धारा भी मैं अव्यक्त और अचिन्त्य ही रहा हूँ। मैंने ही सांख्य और योगकी सृष्टि की है। समस्त चराचर जगत्को भी मैंने ही उत्पन्न किया है ।।
अर्चनीयोऽहमीशोऽहमव्ययोऽहं सनातनः ।
अहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ।। मैं पूजनीय ईश्वर हूँ। मैं ही अविनाशी सनातन पुरुष हूँ। मैं प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको अमरत्व भी देता हूँ।। न मां विदुः सुरगणा मुनयश्च तपोधनाः । त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्दिभूतिं ब्रवीमि ते ।। आश्रमेभ्यश्चतुर्भ्योऽहं चतुरो ब्राह्मणान् शुभे । मद्भक्तान् निर्मलान् पुण्यान् समानीय तपस्विनः ।। व्याचख्येऽहं तथा देवि योगं पाशुपतं महत् ।। देवता तथा तपोधन मुनि भी मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं। देवि! तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं अपनी विभूति बतलाता हूँ। शुभे! देवि! मैंने चारों आश्रमोंसे चार पुण्यात्मा तपस्वी ब्राह्मणोंको, जो मेरे भक्त और निर्मलचित्त थे, लाकर उनके समक्ष महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की थी।। गृहीतं तच्च तैः सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात् । श्रुत्वा तत् त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तैः पुनः ।। इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमनाः शृणु ।। अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवाः । सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहाः ।। मेरे दक्षिणवर्ती मुखसे वह सब उपदेश सुनकर उन्होंने ग्रहण किया और पुनः उसकी तीनों लोकोंमें स्थापना की। इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैं उसी पाशुपत योगका वर्णन करता हूँ, एकचित्त होकर सुनो। मेरा ही नाम पशुपति है। अपने रोम-रोममें भस्म रमाये रहनेवाले जो मेरे भक्त मनुष्य हैं, उन्हें पाशुपत जानना चाहिये ।। रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं च भामिनि । लिङ्गार्थं चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ।। तेन संदिग्धसर्वाङ्गा भस्मना ब्रह्मचारिणः । जटिला मुण्डिता वापि नानाकारशिखण्डिनः ।। विकृताः पिङ्गलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिणः । भैक्षं चरन्तः सर्वत्र निःस्पृहा निष्परिग्रहाः ।। मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्धयः । चरन्तो निखिलं लोकं मम हर्षविवर्धनाः ।। भामिनि! पूर्वकालमें मैंने रक्षाके लिये, मंगलके लिये, पवित्रताके लिये और पहचानके लिये भी अपने भक्तोंको भस्म प्रदान किया था। उस भस्मसे सम्पूर्ण अंगोंको लिप्त करके ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले जटाधारी, मुण्डित अथवा नाना प्रकारकी शिखा धारण करनेवाले, विकृत वेश, पिंगलवर्ण, नग्न देह और नाना वेश धारण किये मेरे निःस्पृह और
परिग्रहशून्य भक्त मुझमें ही मन-बुद्धि लगाये, मिट्टीका पात्र हाथमें लिये सब ओर भिक्षाके लिये विचरते रहते हैं। समस्त लोकमें विचरते हुए वे भक्तजन मेरे हर्षकी वृद्धि करते हैं ।। मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम् । सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ।। सभी लोकोंमें मेरे परम उत्तम सूक्ष्म एवं दिव्य पाशुपत योगशास्त्रका विचार करते हुए वे विचरण करते हैं ।। एवं नित्याभियुक्तानां मद्भक्तानां तपस्विनाम् । उपायं चिन्तयाम्य़ाशु येन मामुपयान्ति ते ।। इस तरह नित्य मेरे ही चिन्तनमें संलग्न रहनेवाले अपने तपस्वी भक्तोंके लिये मैं ऐसा उपाय सोचता रहता हूँ, जिससे वे शीघ्र मुझे प्राप्त हो जाते हैं ।। स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम । नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।। इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः । शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।। तीनों लोकोंमें मैंने अपने स्वरूपभूत शिवलिङ्गोंकी स्थापना की है, जिनको नमस्कारमात्र करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। होम, दान, अध्ययन और बहुत-सी दक्षिणावाले यज्ञ भी शिवलिङ्गको प्रणाम करनेसे मिले हुए पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। अर्चया शिवलिङ्गस्य परितुष्याम्यहं प्रिये । शिवलिङ्गार्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ।। प्रिये! शिवलिङ्गकी पूजासे मैं बहुत संतुष्ट होता हूँ। तुम शिवलिङ्ग-पूजनका विधान मुझसे सुनो ।। गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद् यः शिवं मम । इष्टस्य हयमेधस्य यत् फलं तत् फलं भवेत् ।। घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद् यः शिवं मम । स फलं प्राप्नुयान्मर्त्यो ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ।। केवलेनापि तोयेन स्नापयेद् यः शिवं मम । स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नरः ।। जो गोदुग्ध और माखनसे मेरे शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो कि अश्वमेध यज्ञ करनेसे मिलता है। जो प्रतिदिन घृतमण्डसे मेरे शिवलिङ्गका पूजन करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो केवल जलसे भी मेरे शिवलिङ्गको नहलाता है, वह भी पुण्यका भागी होता और अभीष्ट फल पा लेता है ।।
सघृतं गुग्गुलं सम्यग् धूपयेद् यः शिवान्तिके । गोसवस्य तु यज्ञस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥ यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत् । तस्य रुक्मप्रदानस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥ यस्तु नानाविधैः पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत् । स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् । तस्मात् सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तमः ॥ जो शिवलिङ्गके निकट घृतमिश्रित गुग्गुलका उत्तम धूप निवेदन करता है, उसे गोसव नामक यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो केवल गुग्गुलके पिण्डसे धूप देता है, उसे सुवर्णदानका फल मिलता है। जो नाना प्रकारके फूलोंसे मेरे लिङ्गकी पूजा करता है, उसे सहस्र धेनुदानका फल प्राप्त होता है। जो देशान्तरमें जाकर शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्योंमें मेरा प्रिय करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ।।
एवं नानाविधैर्द्रव्यैः शिवलिङ्गं समर्चयेत् । मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ॥ अर्चनाभिर्नमस्कारैरुपहारैः स्तवैरपि । भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिङ्गेष्वतन्द्रितः ॥ पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजस्तथा । अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः ॥ इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंद्वारा जो शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह मनुष्योंमें मेरे समान है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है। अतः भक्त पुरुष अर्चनाओं, नमस्कारों, उपहारों और स्तोत्रोंद्वारा प्रतिदिन आलस्य छोड़कर शिवलिङ्गोंके रूपमें मेरी पूजा करे। पलाश और बेलके पत्ते, राजवृक्षके फूलोंकी मालाएँ तथा आकके पवित्र फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ।।
फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम् । दत्तं सम्प्रीणयेद् देवि भक्तैर्मद्गतमानसैः । ममापि परितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम् । तस्मात् ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ॥ देवि! मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्तोंका दिया हुआ फल, फूल, साग अथवा जल भी मुझे विशेष प्रिय लगता है। मेरे संतुष्ट हो जानेपर लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है; इसलिये भक्तजन सदा मेरी ही पूजा किया करते हैं ।।
मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्ताः सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषतः ॥
मद्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणोऽपि वा ।
यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥
मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं। जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् ।
मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद् दिने दिने ॥
शृणुयाद् यः पठेद् वापि ममेदं धर्मनिश्चयम् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं लभते स नरोत्तमः ॥
देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की है। मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)