भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1380, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1380

प्राणो मूर्धनि च श्वासो वर्तमानो विचेष्टते ॥ सज्जस्तु सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयाश्च सः ॥ बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रितः । वहन् मूत्रं पुरीषं च सदापानः प्रवर्तते ॥ अथ प्रवृत्तिर्देहेषु कर्मापानस्य सम्मतम् । उदीरयन् सर्वधातून् अत ऊर्ध्वं प्रवर्तते ॥ उदान इति तं विद्युरध्यात्मकुशला जनाः ॥

तत्पश्चात् मूर्धा, अग्नि और शरीरका परिपालन करे। मूर्धामें प्राणकी स्थिति है, जो श्वासरूपमें वर्तमान होकर चेष्टा करता है। सदा सन्नद्ध रहनेवाला प्राण ही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है। वही मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत और विषयरूप है। वस्तिके मूलभाग, गुदा और अग्निके आश्रित हो अपानवायु सदा मल-मूत्रका वहन करती हुई अपने कार्यमें प्रवृत्त होती है। देहोंमें प्रवृत्ति अपानवायुका कर्म मानी गयी है। जो वायु समस्त धातुओंको ऊपर उठाती हुई अपानसे ऊपरकी ओर प्रवृत्त होती है, उसे अध्यात्मकुशल मनुष्य 'उदान' मानते हैं।

संधौ संधौ स निर्विष्टः सर्वचेष्टाप्रवर्तकः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ धातुष्वग्नौ च विततः समानोऽग्निः समीरणः ॥ स एव सर्वचेष्टानामान्तकाले निवर्तकः ॥

जो वायु मनुष्योंके शरीरोंकी एक-एक संधिमें व्याप्त होकर उनकी सम्पूर्ण चेष्टाओंमें प्रवृत्त होती है, उसे 'व्यान' कहते हैं। जो धातुओं और अग्निमें भी व्याप्त है, वह अग्निस্বরূপ 'समान' वायु है। वही अन्तकालमें समस्त चेष्टाओंका निवर्त्तक होता है ।।

प्राणानां संनिपातेषु संसर्गाद् यः प्रजायते । ऊष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेयः सोऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ अपानप्राणयोर्मध्ये व्यानोदानावुपाश्रितौ । समन्वितः समानेन सम्यक् पचति पावकः ॥ शरीरमध्ये नाभिः स्यान्नाभ्यामग्निः प्रतिष्ठितः । अग्नौ प्राणाश्च संयुक्ता प्राणेष्वात्मा व्यवस्थितः ॥

समस्त प्राणोंका परस्पर संयोग होनेपर संसर्गवश जो ताप प्रकट होता है, उसीको अग्नि जानना चाहिये। वह अग्नि देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाती है। अपान और प्राण वायुके मध्यभागमें व्यान और उदान वायु स्थित है। समान वायुसे युक्त हुई अग्नि सम्यक् रूपसे अन्नका पाचन करती है। शरीरके मध्यभागमें नाभि है। नाभिके भीतर अग्नि प्रतिष्ठित है। अग्निसे प्राण जुड़े हुए हैं और प्राणोंमें आत्मा स्थित है ।।