महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसका पाप धुल गया है, वह पहले तेजस्वी, निराहार, जितेन्द्रिय, अमोघ, निर्मल और मनका दमन करनेमें समर्थ हो जाय। तत्पश्चात् योगका अभ्यास करे।। एकान्ते विजने देशे सर्वतः संवृते शुचौ। कल्पयेदासनं तत्र स्वास्तीर्णं मृदुभिः कुशैः।। एकान्त निर्जन प्रदेशमें, जो सब ओरसे घिरा हुआ और पवित्र हो, कोमल कुशोंसे एक आसन बनाये और उसे वहाँ भलीभाँति बिछा दे।। उपविश्यासने तस्मिन्नृजुकायशिरोधरः। अव्यग्रः सुखमासीनः स्वाङ्गानि न विकम्पयेत्।। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। उस आसनपर बैठकर अपने शरीर और गर्दनको सीधी किये रहे। मनमें किसी प्रकारकी व्यग्रता न आने दे। सुखपूर्वक बैठकर अपने अंगोंको हिलने-डुलने न दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात न करते हुए ध्यानमग्न हो जाय।। मनोऽवस्थापनं देवि योगस्योपनिषद् भवेत्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन मनोऽवस्थापयेत् सदा।। त्वक्श्रोत्रं च ततो जिह्वां घ्राणं चक्षुश्च संहरेत्। पञ्चेन्द्रियाणि संधाय मनसि स्थापयेद् बुधः।। देवि! मनको दृढ़तापूर्वक स्थापित करना योगकी सिद्धिका सूचक है; अतः सम्पूर्ण प्रयत्न करके मनको सदा स्थिर रखे। त्वचा, कान, जिह्वा, नासिका और नेत्र—इन सबको विषयोंकी ओरसे समेटे। पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके विद्वान् पुरुष उन्हें मनमें स्थापित करे।। सर्वं चापोह्य संकल्पमात्मनि स्थापयेन्मनः। यदैतान्यवतिष्ठन्ते मनःषष्ठानि चात्मनि।। प्राणापानौ तदा तस्य युगपत् तिष्ठतो वशे। प्राणे हि वशमापन्ने योगसिद्धिर्ध्रुवा भवेत्।। शरीरं चिन्तयेत् सर्वं विपाट्य च समीपतः। अन्तर्देहगतिं चापि प्राणानां परिचिन्तयेत्।। फिर सारे संकल्पोंको हटाकर मनको आत्मामें स्थापित करे। जब मनसहित ये पाँचों इन्द्रियाँ आत्मामें स्थिर हो जाती हैं, तब प्राण और अपान वायु एक ही साथ वशमें हो जाते हैं। प्राणके वशमें हो जानेपर योगसिद्धि अटल हो जाती है। सारे शरीरको निकटसे उजाड़-उघाड़कर देखे और यह क्या है? इसका चिन्तन करे। शरीरके भीतर जो प्राणोंकी गति है, उसपर भी विचार करे।। ततो मूर्धानमग्निं च शरीरं परिपालयेत्।