भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1378, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1378

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[योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]

श्रीमहेश्वर उवाच

सांख्यज्ञाने नियुक्तानां यथावत् कीर्तितं मया ।
योगधर्मं पुनः कृत्स्नं कीर्तयिष्यामि ते शृणु ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! जो लोग सांख्यज्ञानमें नियुक्त हैं, उनके धर्मका मैंने यथावत् रूपसे वर्णन किया। अब तुमसे पुनः सम्पूर्ण योगधर्मका प्रतिपादन करूँगा, सुनो ॥
स च योगो द्विधा भिन्नो ब्रह्मदेवर्षिसम्मतः ।
समानमुभयत्रापि वृत्तं शास्त्रप्रचोदितम् ॥
वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंद्वारा सम्मत योग सबीज और निर्बीजके भेदसे दो प्रकारका है। उन दोनोंमें ही शास्त्रोक्त सदाचार समान है ॥
स चाष्टगुणमैश्वर्यमधिकृत्य विधीयते ।
सायुज्यं सर्वदेवानां योगधर्मः पराश्रितः ॥
ज्ञानं सर्वस्य योगस्य मूलमित्यवधारय ।
व्रतोपवासनियमैः तत् सर्वं चापि बृंहयेत् ॥
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व—इन आठ भेदोंवाले ऐश्वर्यपर अधिकार करके योगका अनुष्ठान किया जाता है। सम्पूर्ण देवताओंका सायुज्य पराश्रित योगधर्म है। ज्ञान सम्पूर्ण योगका मूल है, ऐसा समझो। साधकको व्रत, उपवास और नियमोंद्वारा उस सम्पूर्ण ज्ञानकी वृद्धि करनी चाहिये ॥
ऐकाग्र्यं बुद्धिमन्सोरीन्द्रियाणां च सर्वशः ।
आत्मनोऽव्ययिनः प्राज्ञे ज्ञानमेतत् तु योगिनाम् ॥
अर्चयेद् ब्राह्मणानग्निं देवतायतनानि च ।
वर्जयेदशिवं भावं सर्वसत्त्वमुपाश्रितः ॥
बुद्धिमती पार्वती! अविनाशी आत्मामें बुद्धि, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी एकाग्रता हो, यही योगियोंका ज्ञान है। ब्राह्मण, अग्नि और देवमन्दिरोंकी पूजा करे तथा पूर्णतः सत्त्वगुणका आश्रय लेकर अमांगलिक भावको त्याग दे ॥
दानमध्ययनं श्रद्धा व्रतानि नियमास्तथा ।
सत्यमाहारशुद्धिश्च शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥
एतैश्च वर्धते तेजः पापं चाप्यवधूयते ॥
दान, अध्ययन, श्रद्धा, व्रत, नियम, सत्य, आहार-शुद्धि, शौच और इन्द्रिय-निग्रह—इनके द्वारा तेजकी वृद्धि होती है और पाप धुल जाता है ॥
निर्धूतपापस्तेजस्वी निराहारो जितेन्द्रियः ।
अमोघो निर्मलो दान्तः पश्चाद् योगं समाचरेत् ॥