महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्राणो मूर्धनि च श्वासो वर्तमानो विचेष्टते ॥ सज्जस्तु सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयाश्च सः ॥ बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रितः । वहन् मूत्रं पुरीषं च सदापानः प्रवर्तते ॥ अथ प्रवृत्तिर्देहेषु कर्मापानस्य सम्मतम् । उदीरयन् सर्वधातून् अत ऊर्ध्वं प्रवर्तते ॥ उदान इति तं विद्युरध्यात्मकुशला जनाः ॥
तत्पश्चात् मूर्धा, अग्नि और शरीरका परिपालन करे। मूर्धामें प्राणकी स्थिति है, जो श्वासरूपमें वर्तमान होकर चेष्टा करता है। सदा सन्नद्ध रहनेवाला प्राण ही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है। वही मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत और विषयरूप है। वस्तिके मूलभाग, गुदा और अग्निके आश्रित हो अपानवायु सदा मल-मूत्रका वहन करती हुई अपने कार्यमें प्रवृत्त होती है। देहोंमें प्रवृत्ति अपानवायुका कर्म मानी गयी है। जो वायु समस्त धातुओंको ऊपर उठाती हुई अपानसे ऊपरकी ओर प्रवृत्त होती है, उसे अध्यात्मकुशल मनुष्य 'उदान' मानते हैं।
संधौ संधौ स निर्विष्टः सर्वचेष्टाप्रवर्तकः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ धातुष्वग्नौ च विततः समानोऽग्निः समीरणः ॥ स एव सर्वचेष्टानामान्तकाले निवर्तकः ॥
जो वायु मनुष्योंके शरीरोंकी एक-एक संधिमें व्याप्त होकर उनकी सम्पूर्ण चेष्टाओंमें प्रवृत्त होती है, उसे 'व्यान' कहते हैं। जो धातुओं और अग्निमें भी व्याप्त है, वह अग्निस্বরূপ 'समान' वायु है। वही अन्तकालमें समस्त चेष्टाओंका निवर्त्तक होता है ।।
प्राणानां संनिपातेषु संसर्गाद् यः प्रजायते । ऊष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेयः सोऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ अपानप्राणयोर्मध्ये व्यानोदानावुपाश्रितौ । समन्वितः समानेन सम्यक् पचति पावकः ॥ शरीरमध्ये नाभिः स्यान्नाभ्यामग्निः प्रतिष्ठितः । अग्नौ प्राणाश्च संयुक्ता प्राणेष्वात्मा व्यवस्थितः ॥
समस्त प्राणोंका परस्पर संयोग होनेपर संसर्गवश जो ताप प्रकट होता है, उसीको अग्नि जानना चाहिये। वह अग्नि देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाती है। अपान और प्राण वायुके मध्यभागमें व्यान और उदान वायु स्थित है। समान वायुसे युक्त हुई अग्नि सम्यक् रूपसे अन्नका पाचन करती है। शरीरके मध्यभागमें नाभि है। नाभिके भीतर अग्नि प्रतिष्ठित है। अग्निसे प्राण जुड़े हुए हैं और प्राणोंमें आत्मा स्थित है ।।
पक्वाशयस्त्वधो नाभेरुर्ध्वमामाशयस्तथा । नाभिर्मध्ये शरीरस्य सर्वप्राणाश्च संश्रिताः ॥ स्थिताः प्राणादयः सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधश्चराः । वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणाग्निचोदिताः ॥ योगिनामेष मार्गस्तु पञ्चस्वेतेषु तिष्ठति । जितश्रमः समासीनो मूर्ध्न्यात्मानमादधेत् ॥ नाभिके नीचे पक्वाशय और ऊपर आमाशय है। शरीरके ठीक मध्यभागमें नाभि है और समस्त प्राण उसीका आश्रय लेकर स्थित हैं। समस्त प्राण आदि ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलमें विचरनेवाले हैं। दस प्राणोंसे तथा अग्निसे प्रेरित हो नाड़ियाँ अन्नरसका वहन करती हैं। यह योगियोंका मार्ग है, जो पाँचों प्राणोंमें स्थित है। साधकको चाहिये कि श्रमको जीतकर आसनपर आसीन हो आत्माको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित करे ।।
मूर्ध्न्यात्मानमाधाय भ्रुवोर्मध्ये मनस्तथा । संनिरुध्य ततः प्राणानात्मानं चिन्तयेत् परम् ॥ प्राणे त्वपानं युञ्जीत प्राणांश्चापानकर्मणि । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरो भवेत् ॥ मूर्धामें आत्माको स्थापित करके दोनों भौंहोंके बीचमें मनका अवरोध करे। तत्पश्चात् प्राणको भलीभाँति रोककर परमात्माका चिन्तन करे। प्राणमें अपानका और अपान कर्ममें प्राणोंका योग करे। फिर प्राण और अपानकी गतिको अवरुद्ध करके प्राणायाममें तत्पर हो जाय ।।
एवमन्तः प्रयुञ्जीत पञ्च प्राणान् परस्परम् । विजने सम्मिताहारो मुनिस्तूष्णीं निरुच्छ्वसन् ॥ अश्रान्तश्चिन्तयेद् योगी उत्थाय च पुनः पुनः । तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् वापि युञ्जीतैवमतन्द्रितः ॥ इस प्रकार एकान्त प्रदेशमें बैठकर मिताहारी मुनि अपने अन्तःकरणमें पाँचों प्राणोंका परस्पर योग करे और चुपचाप उच्छ्वासरहित हो बिना किसी थकावटके ध्यानमग्न रहे। योगी पुरुष बारंबार उठकर भी चलते, सोते या ठहरते हुए भी आलस्य छोड़कर योगाभ्यासमें ही लगा रहे ।।
एवं नियुञ्जतस्तस्य योगिनो युक्तचेतसः । प्रसीदति मनः क्षिप्रं प्रसन्ने दृश्यते परम् ॥ विधूम इव दीप्तोऽग्निरादित्य इव रश्मिमान् । वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे पुरुषो दृश्यतेऽव्ययः ॥ इस प्रकार जिसका चित्त ध्यानमें लगा हुआ है, ऐसे योगाभ्यासपरायण योगीका मन शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और मनके प्रसन्न होनेपर परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता
है। उस समय अविनाशी पुरुष परमात्मा धूमरहित प्रकाशित अग्नि, अंशुमाली सूर्य और आकाशमें चमकने-वाली बिजलीके समान दिखायी देता है ।। दृष्ट्वा तदा मनो ज्योतिरैश्वर्याष्टगुणैर्युतः । प्राप्नोति परमं स्थानं स्पृहणीयं सुरैरपि ।। उस अवस्थामें मनके द्वारा ज्योतिर्मय परमेश्वरका दर्शन करके योगी अणिमा आदि आठ ऐश्वर्योंसे युक्त हो देवताओंके लिये भी स्पृहणीय परमपदको प्राप्त कर लेता है ।। इमान् योगस्य दोषांश्च दशैव परिचक्षते । दोषैर्विघ्नो वरारोहे योगिनां कविभिः स्मृतः ।। वरारोहे! विद्वानोंने दोषोंसे योगियोंके मार्गमें विघ्नकी प्राप्ति बतायी है। वे योगके निम्नांकित दस ही दोष बताते हैं ।। कामः क्रोधो भयं स्वप्नः स्नेहमत्यशनं तथा । वैचित्त्यं व्याधिरालस्यं लोभश्च दशमः स्मृतः ।। काम, क्रोध, भय, स्वप्न, स्नेह, अधिक भोजन, वैचित्त्य (मानसिक विकलता), व्याधि, आलस्य और लोभ—ये ही उन दोषोंके नाम हैं। इनमें लोभ दसवाँ दोष है ।। एतैस्तेषां भवेद् विघ्नो दशभिर्देवकारितैः । तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मनः ।। इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते । गुणैस्तैरष्टभिर्दिव्यमैश्वर्यमधिगम्यते ।। देवताओंद्वारा पैदा किये गये इन दस दोषोंसे योगियोंको विघ्न होता है; अतः पहले इन दस दोषोंको हटाकर मनको परमात्मामें लगावे। योगके निम्नांकित आठ गुण बताये जाते हैं, जिनसे युक्त दिव्य ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।। अणिमा महिमा चैव प्राप्तिः प्राकाम्यमेव हि । ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता ।। एतानष्टौ गुणान् प्राप्य कथंचिद् योगिनां वराः । ईशाः सर्वस्य लोकस्य देवानप्यतिशेरते ।। योगोऽस्ति नैवात्यशिनो न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतस्तथा ।। अणिमा, महिमा और गरिमा, लघिमा तथा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, जिसमें इच्छाओंकी पूर्ति होती है। योगियोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी तरह इन आठ गुणोंको पाकर सम्पूर्ण जगत्पर शासन करनेमें समर्थ हो देवताओंसे भी बढ़ जाते हैं। जो अधिक खानेवाला अथवा सर्वथा न खानेवाला है, अधिक सोनेवाला अथवा सर्वथा जागनेवाला है, उसका योग सिद्ध नहीं होता ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। अनेनैव विधानेन सायुज्यं तत् प्रकल्प्यते । सायुज्यं देवसात् कृत्वा प्रयुञ्जीतात्मभक्तितः ।। अनन्यमनसा देवि नित्यं तद्गतचेतसा । सायुज्यं प्राप्यते देवैर्यत्नेन महता चिरात् ।। हविर्भिरर्चनैर्होमैः प्रणामैर्नित्यचिन्तया । अर्चयित्वा यथाशक्ति स्वकं देवं विशन्ति ते ।।
दुःखोंका नाश करनेवाला यह योग उसी पुरुषका सिद्ध होता है, जो यथायोग्य आहार-विहार करनेवाला है, कर्मोंमें उपयुक्त चेष्टा करता है तथा उचित मात्रामें सोता और जागता है। इसी विधानसे देवसायुज्य प्राप्त होता है। अपनी भक्तिसे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करके योगसाधनामें तत्पर रहे। देवि! प्रतिदिन एकाग्र और अनन्य चित्त हो चिरकालतक महान् यत्न करनेसे देवताओंके साथ सायुज्य प्राप्त होता है। योगीजन हविष्य, पूजा, हवन, प्रणाम तथा नित्य चिन्तनके द्वारा यथाशक्ति आराधना करके अपने इष्टदेवके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।।
सायुज्यानां विशिष्टं च मामकं वैष्णवं तथा । मां प्राप्य न निवर्तन्ते विष्णुं वा शुभलोचने । इति ते कथितो देवि योगधर्मः सनातनः । न शक्यं प्रष्टुमन्यैर्योगधर्मस्त्वया विना ।।
शुभलोचने! सायुज्योंमें मेरा तथा श्रीविष्णुका सायुज्य श्रेष्ठ हैं। मुझे या भगवान् विष्णुको प्राप्त करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं लौटते हैं। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे सनातन योग-धर्मका वर्णन किया है। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस योगधर्मके विषयमें प्रश्न नहीं कर सकता था ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]
[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]
उमोवाच
त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ त्र्यम्बक त्रिदशाधिप ।
त्रिपुरान्तक कामाङ्गहर त्रिपथगाधर ।।
दक्षयज्ञप्रमथन शूलपाणेऽरिसूदन ।
नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ।।
उमाने पूछा— तीन नेत्रधारी! त्रिदशश्रेष्ठ! देवेश्वर! त्र्यम्बक! त्रिपुरोंका विनाश और कामदेवके शरीरको भस्म करनेवाले गंगाधर! दक्षयज्ञका नाश करनेवाले त्रिशूलधारी! शत्रुसूदन! लोकपालोंको भी वर देनेवाले लोकपालेश्वर! आपको नमस्कार है ।।
नैकशाखमपर्यन्तमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सांख्ययोगसमन्वितम् ।।
भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम् ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्गतं विभो ।।
कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम् ।
आचारः कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद् भवान् ।।
वर्ण्यमानं त्वया साक्षात् प्रीणयत्यधिकं हि माम् ।।
आपने मेरे पूछनेपर सुननेके लिये उत्सुक हुई मुझ दासीको वह उत्तम अध्यात्मज्ञान बताया है, जो अनेक शाखाओंसे युक्त, अनन्त, अतर्क्य, अविज्ञेय और सांख्ययोगसे युक्त है। प्रभो! इस समय मैं आपसे आपका ही सायुज्य सुनना चाहती हूँ। ये भक्तजन आप परमेष्ठीकी परिचर्या कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा होता है? किस साधनसे आप संतुष्ट होते हैं? साक्षात् आपके द्वारा प्रतिपादित होनेपर यह विषय मुझे अधिक प्रसन्नता प्रदान करता है ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम् ।
येन ते न निवर्तन्ते युक्ताः परमयोगिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे अपने अद्भुत सायुज्यका वर्णन करता हूँ, जिससे युक्त हो वे परम योगी पुरुष फिर संसारमें नहीं लौटते हैं ।।
अव्यक्तोऽहमचिन्त्योऽहं पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
सांख्ययोगौ मया सृष्टौ सर्वं चापि चराचरम् ।।
पहलेके मुमुक्षुओंद्धारा भी मैं अव्यक्त और अचिन्त्य ही रहा हूँ। मैंने ही सांख्य और योगकी सृष्टि की है। समस्त चराचर जगत्को भी मैंने ही उत्पन्न किया है ।।
अर्चनीयोऽहमीशोऽहमव्ययोऽहं सनातनः ।
अहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ।। मैं पूजनीय ईश्वर हूँ। मैं ही अविनाशी सनातन पुरुष हूँ। मैं प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको अमरत्व भी देता हूँ।। न मां विदुः सुरगणा मुनयश्च तपोधनाः । त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्दिभूतिं ब्रवीमि ते ।। आश्रमेभ्यश्चतुर्भ्योऽहं चतुरो ब्राह्मणान् शुभे । मद्भक्तान् निर्मलान् पुण्यान् समानीय तपस्विनः ।। व्याचख्येऽहं तथा देवि योगं पाशुपतं महत् ।। देवता तथा तपोधन मुनि भी मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं। देवि! तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं अपनी विभूति बतलाता हूँ। शुभे! देवि! मैंने चारों आश्रमोंसे चार पुण्यात्मा तपस्वी ब्राह्मणोंको, जो मेरे भक्त और निर्मलचित्त थे, लाकर उनके समक्ष महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की थी।। गृहीतं तच्च तैः सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात् । श्रुत्वा तत् त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तैः पुनः ।। इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमनाः शृणु ।। अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवाः । सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहाः ।। मेरे दक्षिणवर्ती मुखसे वह सब उपदेश सुनकर उन्होंने ग्रहण किया और पुनः उसकी तीनों लोकोंमें स्थापना की। इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैं उसी पाशुपत योगका वर्णन करता हूँ, एकचित्त होकर सुनो। मेरा ही नाम पशुपति है। अपने रोम-रोममें भस्म रमाये रहनेवाले जो मेरे भक्त मनुष्य हैं, उन्हें पाशुपत जानना चाहिये ।। रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं च भामिनि । लिङ्गार्थं चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ।। तेन संदिग्धसर्वाङ्गा भस्मना ब्रह्मचारिणः । जटिला मुण्डिता वापि नानाकारशिखण्डिनः ।। विकृताः पिङ्गलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिणः । भैक्षं चरन्तः सर्वत्र निःस्पृहा निष्परिग्रहाः ।। मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्धयः । चरन्तो निखिलं लोकं मम हर्षविवर्धनाः ।। भामिनि! पूर्वकालमें मैंने रक्षाके लिये, मंगलके लिये, पवित्रताके लिये और पहचानके लिये भी अपने भक्तोंको भस्म प्रदान किया था। उस भस्मसे सम्पूर्ण अंगोंको लिप्त करके ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले जटाधारी, मुण्डित अथवा नाना प्रकारकी शिखा धारण करनेवाले, विकृत वेश, पिंगलवर्ण, नग्न देह और नाना वेश धारण किये मेरे निःस्पृह और
परिग्रहशून्य भक्त मुझमें ही मन-बुद्धि लगाये, मिट्टीका पात्र हाथमें लिये सब ओर भिक्षाके लिये विचरते रहते हैं। समस्त लोकमें विचरते हुए वे भक्तजन मेरे हर्षकी वृद्धि करते हैं ।। मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम् । सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ।। सभी लोकोंमें मेरे परम उत्तम सूक्ष्म एवं दिव्य पाशुपत योगशास्त्रका विचार करते हुए वे विचरण करते हैं ।। एवं नित्याभियुक्तानां मद्भक्तानां तपस्विनाम् । उपायं चिन्तयाम्य़ाशु येन मामुपयान्ति ते ।। इस तरह नित्य मेरे ही चिन्तनमें संलग्न रहनेवाले अपने तपस्वी भक्तोंके लिये मैं ऐसा उपाय सोचता रहता हूँ, जिससे वे शीघ्र मुझे प्राप्त हो जाते हैं ।। स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम । नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।। इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः । शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।। तीनों लोकोंमें मैंने अपने स्वरूपभूत शिवलिङ्गोंकी स्थापना की है, जिनको नमस्कारमात्र करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। होम, दान, अध्ययन और बहुत-सी दक्षिणावाले यज्ञ भी शिवलिङ्गको प्रणाम करनेसे मिले हुए पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। अर्चया शिवलिङ्गस्य परितुष्याम्यहं प्रिये । शिवलिङ्गार्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ।। प्रिये! शिवलिङ्गकी पूजासे मैं बहुत संतुष्ट होता हूँ। तुम शिवलिङ्ग-पूजनका विधान मुझसे सुनो ।। गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद् यः शिवं मम । इष्टस्य हयमेधस्य यत् फलं तत् फलं भवेत् ।। घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद् यः शिवं मम । स फलं प्राप्नुयान्मर्त्यो ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ।। केवलेनापि तोयेन स्नापयेद् यः शिवं मम । स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नरः ।। जो गोदुग्ध और माखनसे मेरे शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो कि अश्वमेध यज्ञ करनेसे मिलता है। जो प्रतिदिन घृतमण्डसे मेरे शिवलिङ्गका पूजन करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो केवल जलसे भी मेरे शिवलिङ्गको नहलाता है, वह भी पुण्यका भागी होता और अभीष्ट फल पा लेता है ।।
सघृतं गुग्गुलं सम्यग् धूपयेद् यः शिवान्तिके । गोसवस्य तु यज्ञस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥ यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत् । तस्य रुक्मप्रदानस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥ यस्तु नानाविधैः पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत् । स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् । तस्मात् सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तमः ॥ जो शिवलिङ्गके निकट घृतमिश्रित गुग्गुलका उत्तम धूप निवेदन करता है, उसे गोसव नामक यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो केवल गुग्गुलके पिण्डसे धूप देता है, उसे सुवर्णदानका फल मिलता है। जो नाना प्रकारके फूलोंसे मेरे लिङ्गकी पूजा करता है, उसे सहस्र धेनुदानका फल प्राप्त होता है। जो देशान्तरमें जाकर शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्योंमें मेरा प्रिय करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ।।
एवं नानाविधैर्द्रव्यैः शिवलिङ्गं समर्चयेत् । मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ॥ अर्चनाभिर्नमस्कारैरुपहारैः स्तवैरपि । भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिङ्गेष्वतन्द्रितः ॥ पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजस्तथा । अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः ॥ इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंद्वारा जो शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह मनुष्योंमें मेरे समान है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है। अतः भक्त पुरुष अर्चनाओं, नमस्कारों, उपहारों और स्तोत्रोंद्वारा प्रतिदिन आलस्य छोड़कर शिवलिङ्गोंके रूपमें मेरी पूजा करे। पलाश और बेलके पत्ते, राजवृक्षके फूलोंकी मालाएँ तथा आकके पवित्र फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ।।
फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम् । दत्तं सम्प्रीणयेद् देवि भक्तैर्मद्गतमानसैः । ममापि परितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम् । तस्मात् ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ॥ देवि! मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्तोंका दिया हुआ फल, फूल, साग अथवा जल भी मुझे विशेष प्रिय लगता है। मेरे संतुष्ट हो जानेपर लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है; इसलिये भक्तजन सदा मेरी ही पूजा किया करते हैं ।।
मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्ताः सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषतः ॥
मद्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणोऽपि वा ।
यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥
मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं। जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् ।
मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद् दिने दिने ॥
शृणुयाद् यः पठेद् वापि ममेदं धर्मनिश्चयम् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं लभते स नरोत्तमः ॥
देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की है। मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)
पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन
नारद उवाच
एवमुक्त्वा महादेवः श्रोतुकामः स्वयं प्रभुः ।
अनुकूलां प्रियां भार्या पार्श्वस्थां समभाषत ।। १ ।।
**नारदजी कहते हैं—**ऐसा कहकर महादेवजी स्वयं भी पार्वतीजीके मुँहसे कुछ सुननेकी इच्छा करने लगे। अतएव स्वयं भगवान् शिवने पास ही बैठी हुई अपनी प्रिय एवं अनुकूल भार्या पार्वतीसे कहा ।। १ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
परावरज्ञे धर्मज्ञे तपोवननिवासिनि ।
साध्वि सुभ्रु सुकेशान्ते हिमवत्पर्वतात्मजे ।। २ ।।
दक्षे शमदमोपेते निर्ममे धर्मचारिणि ।
पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम् ।। ३ ।।
**श्रीमहेश्वर बोले—**तपोवनमें निवास करनेवाली देवि! तुम भूत और भविष्यको जाननेवाली, धर्मके तत्त्वको समझनेवाली और स्वयं भी धर्मका आचरण करनेवाली हो। सुन्दर केशों और भौंहोंवाली सती-साध्वी हिमवान्-कुमारी! तुम कार्यकुशल हो, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहसे भी सम्पन्न हो। तुममें अहंता और ममताका सर्वथा अभाव है; अतः वरारोहे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ। मेरे पूछनेपर तुम मुझे मेरे अभीष्ट विषयको बताओ ।।
सावित्री ब्रह्मणःसाध्वी कौशिकस्य शची सती ।
(लक्ष्मीर्विष्णोः प्रिया भार्या धृतिर्भार्या यमस्य तु)
मार्कण्डेयस्य धूमोर्णा ऋद्धिवैश्रवणस्य च ।। ४ ।।
वरुणस्य तथा गौरी सूर्यस्य च सुवर्चला ।
रोहिणी शशिनः साध्वी स्वाहा चैव विभावसोः ।। ५ ।।
अदितिः कश्यपस्याथ सर्वास्ताः पतिदेवताः ।
पृष्टाश्चोपासिताश्चैव तास्त्वया देवि नित्यशः ।। ६ ।।
ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्री साध्वी हैं। इन्द्रपत्नी शची भी सती हैं। विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मी पतिव्रता हैं। इसी प्रकार यमकी भार्या धृति, मार्कण्डेयकी पत्नी धूमोर्णा, कुबेरकी स्त्री ऋद्धि, वरुणकी भार्या गौरी, सूर्यकी पत्नी सुवर्चला, चन्द्रमाकी साध्वी स्त्री रोहिणी,
अग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति—ये सब-की-सब पतिव्रता देवियाँ हैं। देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है ॥ ४—६ ॥ तेन त्वां परिपृच्छामि धर्मज्ञे धर्मवादिनि । स्त्रीधर्मं श्रोतुमिच्छामि त्वयोदाहृतमादितः ॥ ७ ॥ अतः धर्मवादिनि धर्मज्ञे! मैं तुमसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न करता हूँ और तुम्हारे मुखसे वर्णित नारीधर्म आद्योपान्त सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥ सधर्मचारिणी मे त्वं समशीला समव्रता । समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते ॥ ८ ॥ तुम मेरी सहधर्मिणी हो। तुम्हारा शील-स्वभाव तथा व्रत मेरे समान ही है। तुम्हारी सारभूत शक्ति भी मुझसे कम नहीं है। तुमने तीव्र तपस्या भी की है ॥ ८ ॥ त्वया ह्युक्तो विशेषेण गुणवान् स भविष्यति । लोके चैव त्वया देवि प्रमाणत्वमुपैष्यति ॥ ९ ॥ अतः देवि! तुम्हारे द्वारा कहा गया स्त्रीधर्म विशेष गुणवान् होगा और लोकमें प्रमाणभूत माना जायगा ॥ ९ ॥ स्त्रियश्चैव विशेषेण स्त्रीजनस्य गतिः परा । गौर्यां गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा गतिः सदा ॥ १० ॥ विशेषतः स्त्रियाँ ही स्त्रियोंकी परम गति हैं। सुश्रोणि! संसारमें भूतलपर यह बात सदासे प्रचलित है ॥ मम चार्धं शरीरस्य तव चार्धेन निर्मितम् । सुरकार्यकरी च त्वं लोकसंतानकारिणी ॥ ११ ॥ मेरा आधा शरीर तुम्हारे आधे शरीरसे निर्मित हुआ है। तुम देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा लोक-संततिका विस्तार करनेवाली हो ॥ ११ ॥ (प्रमदोक्तं तु यत् किंचित् तत् स्त्रीषु बहु मन्यते । न तथा मन्यते स्त्रीषु पुरुषोक्तमनिन्दिते ॥) अनिन्दिते! नारीकी कही हुई जो बात होती है, उसे ही स्त्रियोंमें अधिक महत्त्व दिया जाता है। पुरुषोंकी कही हुई बातको स्त्रियोंमें वैसा महत्त्व नहीं दिया जाता ॥ तव सर्वः सुविदितः स्त्रीधर्मः शाश्वतः शुभे । तस्मादशेषतो ब्रूहि स्वधर्मं विस्तरेण मे ॥ १२ ॥ शुभे! तुम्हें सम्पूर्ण सनातन स्त्रीधर्मका भलीभाँति ज्ञान है; अतः अपने धर्मका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक मेरे आगे वर्णन करो ॥ १२ ॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश भूतभव्यभवोत्तम ।
त्वत्प्रभावादियं देव वाक् चैव प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥
इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युताः ।
उपस्पर्शनहेतोस्त्वामुपयान्ति समीपतः ॥ १४ ॥
एताभिः सह सम्मन्त्र्य प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
प्रभवन् योऽनहंवादी स वै पुरुष उच्यते ॥ १५ ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! सर्वभूतेश्वर! भूत, भविष्य और वर्तमानकालस्वरूप सर्वश्रेष्ठ महादेव! आपके प्रभावसे मेरी यह वाणी प्रतिभासम्पन्न हो रही है—अब मैं स्त्री-धर्मका वर्णन कर सकती हूँ। किंतु देवेश्वर! ये नदियाँ सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे सम्पन्न हो आपके स्नान और आचमन आदिके लिये अथवा आपके चरणोंका स्पर्श करनेके लिये यहाँ आपके निकट आ रही हैं। मैं इन सबके साथ सलाह करके क्रमशः स्त्रीधर्मका वर्णन करूँगी। जो व्यक्ति समर्थ होकर भी अहंकारशून्य हो, वही पुरुष कहलाता है ॥
स्त्री च भूतेश सततं स्त्रियमेवानुधावति ।
मया सम्मानिताश्चैव भविष्यन्ति सरिद्वराः ॥ १६ ॥
भूतनाथ! स्त्री सदा स्त्रीका ही अनुसरण करती है। मेरे ऐसा करनेसे ये श्रेष्ठ सरिताएँ मेरे द्वारा सम्मानित होंगी ॥
एषा सरस्वती पुण्या नदीनामुत्तमा नदी ।
प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी ॥ १७ ॥
विपाशा च वितस्ता च चन्द्रभागा इरावती ।
शतद्रुर्देविका सिन्धुः कौशिकी गौतमी तथा ॥ १८ ॥
(यमुना नर्मदां चैव कावेरीमथ निम्नगाम्)
ये नदियोंमें उत्तम पुण्यसलिला सरस्वती विराजमान हैं, जो समुद्रमें मिली हुई हैं। ये समस्त सरिताओंमें प्रथम (प्रधान) मानी जाती हैं। इनके सिवा विपाशा (व्यास), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), इरावती (रावी), शतद्रू (शटलज), देविका, सिन्धु, कौशिकी (कोसी), गौतमी (गोदावरी), यमुना, नर्मदा तथा कावेरी नदी भी यहाँ विद्यमान हैं ॥ १७-१८ ॥
तथा देवनदी चेयं सर्वतीर्थाभिसम्भृता ।
गगनाद् गां गता देवी गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥ १९ ॥
ये समस्त तीर्थोंसे सेवित तथा सम्पूर्ण सरिताओंमें श्रेष्ठ देवनदी गंगादेवी भी, जो आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हैं, यहाँ विराजमान हैं ॥ १९ ॥
इत्युक्त्वा देवदेवस्य पत्नी धर्मभृतां वरा ।
स्मितपूर्वमथाभाष्य सर्वास्ताः सरितस्तथा ॥ २० ॥
अपृच्छद् देवमहिषी स्त्रीधर्मं धर्मवत्सला ।
स्त्रीधर्मकुशलास्ता वै गङ्गाद्याः सरितां वराः ॥ २१ ॥
ऐसा कहकर देवाधिदेव महादेवजीकी पत्नी, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, धर्मवत्सला, देवमहिषी उमाने स्त्री-धर्मके ज्ञानमें निपुण गंगा आदि उन समस्त श्रेष्ठ सरिताओंको मन्द मुसकानके साथ सम्बोधित करके उनसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न किया ।। २०-२१ ।।
उमोवाच
(हे पुण्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वपापविनाशिकाः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः शृणुध्वं वचनं मम ।।)
अयं भगवता प्रोक्ताः प्रश्नः स्त्रीधर्मसंश्रितः ।
तं तु सम्मन्त्र्य युष्माभिर्वक्तुमिच्छामि शंकरम् ।। २२ ।।
**उमा बोलीं—**हे समस्त पापोंका विनाश करनेवाली, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न पुण्यसलिला श्रेष्ठ नदियो! मेरी बात सुनो। भगवान् शिवने यह स्त्रीधर्मसम्बन्धी प्रश्न उपस्थित किया है। उसके विषयमें मैं तुमलोगोंसे सलाह लेकर ही भगवान् शंकरसे कुछ कहना चाहती हूँ ।। २२ ।।
न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् ।
दिवि वा सागरगामास्तेन वो मानयाम्यहम् ।। २३ ।।
समुद्रगामिनी सरिताओ! पृथ्वीपर या स्वर्गमें मैं किसीका भी ऐसा कोई विज्ञान नहीं देखती, जिसे उसने अकेले ही—दूसरोंका सहयोग लिये बिना ही सिद्ध कर लिया हो, इसीलिये मैं आपलोगोंसे सादर सलाह लेती हूँ ।।
एवं सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः पृष्टाः पुण्यतमाः शिवाः ।
ततो देवनदी गङ्गा नियुक्ता प्रतिपूज्य च ।। २४ ।।
इस प्रकार उमाने जब समस्त कल्याणस्वरूपा परम पुण्यमयी श्रेष्ठ सरिताओंके समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया, तब उन्होंने इसका उत्तर देनेके लिये देवनदी गंगाको सम्मानपूर्वक नियुक्त किया ।। २४ ।।
बह्वीभिर्बुद्धिभिः स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता ।
शैलराजसुतां देवीं पुण्या पापभयापहा ।। २५ ।।
बुद्ध्या विनयसम्पन्ना सर्वधर्मविशारदा ।
सस्मितं बहुबुद्ध्याढ्या गङ्गा वचनमब्रवीत् ।। २६ ।।
पवित्र मुसकानवाली गंगाजी अनेक बुद्धियोंसे बढ़ी-चढ़ी, स्त्री-धर्मको जाननेवाली, पाप-भयको दूर करनेवाली, पुण्यमयी, बुद्धि और विनयसे सम्पन्न, सर्वधर्मविशारद तथा प्रचुर बुद्धिसे संयुक्त थीं। उन्होंने गिरिराजकुमारी उमादेवीसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा ।। २५-२६ ।।
गङ्गोवाच
धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि देवि धर्मपरायणे ।
या त्वं सर्वजगन्मान्या नदीं मानयसेऽनघे ॥ २७ ॥ **गंगाजीने कहा—**देवि! धर्मपरायणे! अनघे! मैं धन्य हूँ। मुझपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्की सम्माननीया होनेपर भी एक तुच्छ नदीको मान्यता प्रदान कर रही हैं ॥ २७ ॥
प्रभवन् पृच्छते यो हि सम्मानयति वा पुनः । नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति ॥ २८ ॥ जो सब प्रकारसे समर्थ होकर भी दूसरोंसे पूछता तथा उन्हें सम्मान देता है और जिसके मनमें कभी दुष्टता नहीं आती, वह मनुष्य निस्संदेह पण्डित कहलाता है ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् । प्रवक्तॄन् पृच्छते योऽन्यान् स वै नापदमृच्छति ॥ २९ ॥ अन्यथा बहुबुद्ध्याढ्यो वाक्यं वदति संसदि । अन्यथैव ह्यहंवादी दुर्बलं वदते वचः ॥ ३० ॥ जो मनुष्य ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और ऊहापोहमें कुशल दूसरे-दूसरे वक्ताओंसे अपना संदेह पूछता है, वह आपत्तिमें नहीं पड़ता है। विशेष बुद्धिमान् पुरुष सभामें और तरहकी बात करता है और अहंकारी मनुष्य और ही तरहकी दुर्बलतायुक्त बातें करता है ॥ २९-३० ॥
दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्यैः सहोत्थिते । त्वमेवार्हसि नो देवि स्त्रीधर्माननुभाषितुम् ॥ ३१ ॥ देवि! तुम दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न और देवलोकमें सर्वश्रेष्ठ हो। दिव्य पुण्योंके साथ तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम्हीं हम सब लोगोंको स्त्री-धर्मका उपदेश देनेके योग्य हो ॥
ततः साऽऽराधिता देवी गङ्गया बहुभिर्गुणैः । प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ॥ ३२ ॥ तदनन्तर गंगाजीके द्वारा अनेक गुणोंका बखान करके पूजित होनेपर देवसुन्दरी देवी उमाने सम्पूर्ण स्त्री-धर्मका पूर्णतः वर्णन किया ॥ ३२ ॥
उमोवाच
स्त्रीधर्मो मां प्रति यथा प्रतिभाति यथाविधि । तमहं कीर्तयिष्यामि तथैव प्रश्रिता भव ॥ ३३ ॥ **उमा बोलीं—**स्त्री-धर्मका स्वरूप मेरी बुद्धिमें जैसा प्रतीत होता है, उसे मैं विधिपूर्वक बताऊँगी। तुम विनय और उत्सुकतासे युक्त होकर इसे सुनो ॥ ३३ ॥
स्त्रीधर्मः पूर्व एवायं विवाहे बन्धुभिः कृतः । सहधर्मचरी भर्तुर्भवत्यग्निसमीपतः ॥ ३४ ॥
विवाहके समय कन्याके भाई-बन्धु पहले ही उसे स्त्री-धर्मका उपदेश कर देते हैं। जब कि वह अग्निके समीप अपने पतिकी सहधर्मिणी बनती है ॥ ३४ ॥
सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना ।
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥ ३५ ॥
सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी ।
देववत् सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति ॥ ३६ ॥
जिसके स्वभाव, बात-चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है। जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है ॥ ३५-३६ ॥
शुश्रूषां परिचारं च देववद् या करोति च ।
नान्यभावा ह्यविमनाः सुव्रता सुखदर्शना ॥ ३७ ॥
पुत्रवक्त्रमिवाभीक्ष्णं भर्तुर्वदनमीक्षते ।
या साध्वी नियताहारा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ३८ ॥
जो पतिकी देवताके समान सेवा और परिचर्या करती हैं, पतिके सिवा दूसरे किसीसे हार्दिक प्रेम नहीं करती, कभी नाराज नहीं होती तथा उत्तम व्रतका पालन करती है, जिसका दर्शन पतिको सुखद जान पड़ता है, जो पुत्रके मुखकी भाँति स्वामीके मुखकी ओर सदा निहारती रहती है तथा जो साध्वी एवं नियमित आहारका सेवन करनेवाली है, वह स्त्री धर्मचारिणी कही गयी है ॥
श्रुत्वा दम्पतिधर्मं वै सहधर्मं कृतं शुभम् ।
या भवेद् धर्मपरमा नारी भर्तृसमव्रता ॥ ३९ ॥
'पति और पत्नीको एक साथ रहकर धर्माचरण करना चाहिये।' इस मंगलमय दाम्पत्य धर्मको सुनकर जो स्त्री धर्मपरायण हो जाती है, वह पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली (पतिव्रता) है ॥ ३९ ॥
देववत् सततं साध्वी भर्तारमनुपश्यति ।
दम्पत्योरेश वै धर्मः सहधर्मकृतः शुभः ॥ ४० ॥
साध्वी स्त्री सदा अपने पतिको देवताके समान समझती है। पति और पत्नीका यह सहधर्म (साथ-साथ रहकर धर्माचरण करना) रूप धर्म परम मंगलमय है ॥
शुश्रूषां परिचारं च देवतुल्यं प्रकुर्वती ।
वश्या भावेन सुमनाः सुव्रता सुखदर्शना ।
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥ ४१ ॥
परुषाण्यपि चोक्ता या दृष्टा दृष्टेन चक्षुषा ।
सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता ॥ ४२ ॥
जो अपने हृदयके अनुरागके कारण स्वामीके अधीन रहती है, अपने चित्तको प्रसन्न
रखती है, देवताके समान पतिकी सेवा और परिचर्या करती है, उत्तम व्रतका आश्रय लेती है
और पतिके लिये सुखदायक सुन्दर वेष धारण किये रहती है, जिसका चित्त पतिके सिवा
और किसीकी ओर नहीं जाता, पतिके समक्ष प्रसन्नवदन रहनेवाली वह स्त्री धर्मचारिणी
मानी गयी है। जो स्वामीके कठोर वचन कहने या दोषपूर्ण दृष्टिसे देखनेपर भी प्रसन्नतासे
मुसकराती रहती है, वही स्त्री पतिव्रता है ।। ४१-४२ ।।
न चन्द्रसूर्यौ न तरुं पुंनाम्ना या निरीक्षते ।
भर्तृवर्जं वरारोहा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ४३ ॥
दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् ।
पतिं पुत्रमिवोपास्ते सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४४ ॥
जो सुन्दरी नारी पतिके सिवा पुरुष नामधारी चन्द्रमा, सूर्य और किसी वृक्षकी ओर भी
दृष्टि नहीं डालती, वही पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली है। जो नारी अपने दरिद्र, रोगी,
दीन अथवा रास्तेकी थकावटसे खिन्न हुए पतिकी पुत्रके समान सेवा करती है, वह
धर्मफलकी भागिनी होती है ।।
या नारी प्रयता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् ।
पतिप्रिया पतिप्राणा सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४५ ॥
शुश्रूषां परिचर्यां च करोत्यविमनाः सदा ।
सुप्रीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४६ ॥
जो स्त्री अपने हृदयको शुद्ध रखती, गृहकार्य करनेमें कुशल और पुत्रवती होती, पतिसे
प्रेम करती और पतिको ही अपने प्राण समझती है, वही धर्मफल पानेकी अधिकारिणी
होती है। जो सदा प्रसन्नचित्तसे पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती है, पतिके ऊपर पूर्ण
विश्वास रखती और उसके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करती है, वही नारी धर्मके श्रेष्ठ फलकी
भागिनी होती है ।। ४५-४६ ।।
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा ।
स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४७ ॥
जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी
नहीं होती। वह स्त्री पातिव्रतधर्मकी भागिनी होती है ।। ४७ ।।
कल्योत्थानरतिर्नित्यं गहशुश्रूषणे रता ।
सुसम्मूष्टक्षया चैव गोशकृत्कृतलेपना ।। ४८ ।।
अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पबलिप्रदा ।
देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह ।। ४९ ।।
शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।
तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ॥ ५० ॥ जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है ॥ ४८–५० ॥
श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ जोषयन्ती गुणान्विता । मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना ॥ ५१ ॥ ब्राह्मणान् दुर्बलानाथान् दीनान्धकृपणांस्तथा । बिभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५२ ॥ जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता-पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है। जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों (कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५१-५२ ॥
व्रतं चरति या नित्यं दुष्करं लघुसत्त्वया । पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५३ ॥ जो प्रतिदिन शीघ्रतापूर्वक मर्यादाका बोध करानेवाली बुद्धिके द्वारा दुष्कर व्रतका आचरण करती है, पतिमें ही मन लगाती है और निरन्तर पतिके हित-साधनमें लगी रहती है, उसे पतिव्रत- धर्मके पालनका सुख प्राप्त होता है ॥
पुण्यमेतत् तपश्चैतत् स्वर्गश्चैष सनातनः । या नारी भर्तृपरमा भवेद् भर्तृव्रता सती ॥ ५४ ॥ जो साध्वी नारी पतिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिकी सेवामें लगी रहती है, उसका यह कार्य महान् पुण्य, बड़ी भारी तपस्या और सनातन स्वर्गका साधन है ॥ ५४ ॥
पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः । पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ॥ ५५ ॥ पति ही नारियोंका देवता, पति ही बन्धु-बान्धव और पति ही उनकी गति है। नारीके लिये पतिके समान न दूसरा कोई सहारा है और न दूसरा कोई देवता ॥ ५५ ॥
पतिप्रसादः स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् । अहं स्वर्गं न हीच्छेयं त्वय्यप्रीते महेश्वरे ॥ ५६ ॥ एक ओर पतिकी प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग—ये दोनों नारीकी दृष्टिमें समान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है। मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मैं तो आपको अप्रसन्न रखकर
स्वर्गको नहीं चाहती ।। ५६ ।।
यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् ।
पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन ।। ५७ ।।
आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा ।
आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया ।। ५८ ।।
पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़
जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म
अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर निःशंकभावसे
तुरंत पूरा करना चाहिये ।। ५७-५८ ।।
एष देव मया प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात् तव ।
या त्वेवंभाविनी नारी सा पतिव्रतभागिनी ।। ५९ ।।
देव! आपकी आज्ञासे मैंने यह स्त्रीधर्मका वर्णन किया है। जो नारी ऊपर बताये
अनुसार अपना जीवन बनाती है, वह पातिव्रत-धर्मके फलकी भागिनी होती है ।। ५९ ।।
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स तु देवेशः प्रतिपूज्य गिरेः सुताम् ।
लोकान् विसर्जयामास सर्वैरनुचरैर्वृतान् ।। ६० ।।
ततो ययुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव प्रणम्य शिरसा भवम् ।। ६१ ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर
देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके
साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी। तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और
अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली
गयीं ।। ६०-६१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे स्त्रीधर्मकथने
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमा-महेश्वरसंवादके
प्रसङ्गमें स्त्रीधर्मका वर्णनविषयक एक सौ छियालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं)
वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन
ऋषय ऊचुः
पिनाकिन् भगनेत्रघ्न सर्वलोकनमस्कृत ।
माहात्म्यं वासुदेवस्य श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ॥ १ ॥
ऋषियोंने कहा— भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले पिनाकधारी विश्ववन्दित भगवान् शंकर! अब हम वासुदेव (श्रीकृष्ण)-का माहात्म्य सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच
पितामहादपि वरः शाश्वतः पुरुषो हरिः ।
कृष्णो जाम्बूनदाभासो व्यभ्रे सूर्य इवोदितः ॥ २ ॥
महेश्वरने कहा— मुनिवरो! भगवान् सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ हैं। वे श्रीहरि जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान श्याम कान्तिसे युक्त हैं। बिना बादलके आकाशमें उदित सूर्यके समान तेजस्वी हैं ॥ २ ॥
दशबाहुर्महातेजा देवतारिनिषूदनः ।
श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ३ ॥
उनकी भुजाएँ दस हैं, वे महान् तेजस्वी हैं, देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीवत्सभूषित भगवान् हृषीकेश सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होते हैं ॥ ३ ॥
ब्रह्मा तस्योदरभवस्तस्याहं च शिरोभवः ।
शिरोरुहेभ्यो ज्योतींषि रोमभ्यश्च सुरसुराः ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी उनके उदरसे और मैं उनके मस्तकसे प्रकट हुआ हूँ। उनके सिरके केशोंसे नक्षत्रों और ताराओंका प्रादुर्भाव हुआ है। रोमावलियोंसे देवता और असुर प्रकट हुए हैं ॥ ४ ॥
ऋषयो देहसम्भूतास्तस्य लोकाश्च शाश्वताः ।
पितामहगृहं साक्षात् सर्वदेवगृहं च सः ॥ ५ ॥
समस्त ऋषि और सनातन लोक उनके श्रीविग्रहसे उत्पन्न हुए हैं। वे श्रीहरि स्वयं ही सम्पूर्ण देवताओंके गृह और ब्रह्माजीके भी निवासस्थान हैं ॥ ५ ॥
सोऽस्याः पृथिव्याः कृत्स्नायाः स्रष्टा त्रिभुवनेश्वरः ।
संहर्ता चैव भूतानां स्थावरस्य चरस्य च ॥ ६ ॥
इस सम्पूर्ण पृथ्वीके स्रष्टा और तीनों लोकोंके स्वामी भी वे ही हैं। वे ही चराचर प्राणियोंका संहार भी करते हैं ॥ ६ ॥ स हि देववरः साक्षाद् देवनाथः परंतपः । सर्वज्ञः सर्वसंश्लिष्टः सर्वगः सर्वतोमुखः ॥ ७ ॥ वे देवताओंमें श्रेष्ठ, देवताओंके रक्षक, शत्रुओंको संताप देनेवाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक तथा सब ओर मुखवाले हैं ॥ ७ ॥ परमात्मा हृषीकेशः सर्वव्यापी महेश्वरः । न तस्मात् परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥ ८ ॥ वे ही परमात्मा, इन्द्रियोंके प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ ८ ॥ सनातनो वै मधुहा गोविन्द इति विश्रुतः । स सर्वान् पार्थिवान् संख्ये घातयिष्यति मानदः ॥ ९ ॥ वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। सज्जनोंको आदर देनेवाले वे भगवान् श्रीकृष्ण महाभारत-युद्धमें समस्त राजाओंका संहार करायेंगे ॥ ९ ॥ सुरकार्यार्थमुत्पन्नो मानुषं वपुरास्थितः । न हि देवगणाः सक्तास्त्रिविक्रमविनाकृताः ॥ १० ॥ वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर मानव-शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। उन भगवान् त्रिविक्रमकी शक्ति और सहायताके बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते ॥ १० ॥ भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जिताः । नायकः सर्वभूतानां सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११ ॥ संसारमें नेताके बिना देवता अपना कोई भी कार्य करनमें असमर्थ हैं और ये भगवान् श्रीकृष्ण सब प्राणियोंके नेता हैं। इसलिये समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं ॥ ११ ॥ एतस्य देवनाथस्य देवकार्यपरस्य च । ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ॥ १२ ॥ ब्रह्मा वसति गर्भस्थः शरीरे सुखसंस्थितः । शर्वः सुखं संश्रितश्च शरीरे सुखसंस्थितः ॥ १३ ॥ देवताओंकी रक्षा और उनके कार्यसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे भगवान् वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही ब्रह्मर्षियोंको सदा शरण देते हैं। ब्रह्माजी उनके शरीरके भीतर अर्थात् उनके गर्भमें बड़े सुखके साथ रहते हैं। सदा सुखी रहनेवाला मैं शिव भी उनके श्रीविग्रहके भीतर सुखपूर्वक निवास करता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सर्वाः सुखं संश्रिताश्च शरीरे तस्य देवताः ।