भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1392, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1392

ऐसा कहकर देवाधिदेव महादेवजीकी पत्नी, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, धर्मवत्सला, देवमहिषी उमाने स्त्री-धर्मके ज्ञानमें निपुण गंगा आदि उन समस्त श्रेष्ठ सरिताओंको मन्द मुसकानके साथ सम्बोधित करके उनसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न किया ।। २०-२१ ।।

उमोवाच

(हे पुण्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वपापविनाशिकाः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः शृणुध्वं वचनं मम ।।)
अयं भगवता प्रोक्ताः प्रश्नः स्त्रीधर्मसंश्रितः ।
तं तु सम्मन्त्र्य युष्माभिर्वक्तुमिच्छामि शंकरम् ।। २२ ।।
**उमा बोलीं—**हे समस्त पापोंका विनाश करनेवाली, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न पुण्यसलिला श्रेष्ठ नदियो! मेरी बात सुनो। भगवान् शिवने यह स्त्रीधर्मसम्बन्धी प्रश्न उपस्थित किया है। उसके विषयमें मैं तुमलोगोंसे सलाह लेकर ही भगवान् शंकरसे कुछ कहना चाहती हूँ ।। २२ ।।

न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् ।
दिवि वा सागरगामास्तेन वो मानयाम्यहम् ।। २३ ।।

समुद्रगामिनी सरिताओ! पृथ्वीपर या स्वर्गमें मैं किसीका भी ऐसा कोई विज्ञान नहीं देखती, जिसे उसने अकेले ही—दूसरोंका सहयोग लिये बिना ही सिद्ध कर लिया हो, इसीलिये मैं आपलोगोंसे सादर सलाह लेती हूँ ।।

एवं सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः पृष्टाः पुण्यतमाः शिवाः ।
ततो देवनदी गङ्गा नियुक्ता प्रतिपूज्य च ।। २४ ।।

इस प्रकार उमाने जब समस्त कल्याणस्वरूपा परम पुण्यमयी श्रेष्ठ सरिताओंके समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया, तब उन्होंने इसका उत्तर देनेके लिये देवनदी गंगाको सम्मानपूर्वक नियुक्त किया ।। २४ ।।

बह्वीभिर्बुद्धिभिः स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता ।
शैलराजसुतां देवीं पुण्या पापभयापहा ।। २५ ।।
बुद्ध्या विनयसम्पन्ना सर्वधर्मविशारदा ।
सस्मितं बहुबुद्ध्याढ्या गङ्गा वचनमब्रवीत् ।। २६ ।।

पवित्र मुसकानवाली गंगाजी अनेक बुद्धियोंसे बढ़ी-चढ़ी, स्त्री-धर्मको जाननेवाली, पाप-भयको दूर करनेवाली, पुण्यमयी, बुद्धि और विनयसे सम्पन्न, सर्वधर्मविशारद तथा प्रचुर बुद्धिसे संयुक्त थीं। उन्होंने गिरिराजकुमारी उमादेवीसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा ।। २५-२६ ।।

गङ्गोवाच

धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि देवि धर्मपरायणे ।