महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1393, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंया त्वं सर्वजगन्मान्या नदीं मानयसेऽनघे ॥ २७ ॥ **गंगाजीने कहा—**देवि! धर्मपरायणे! अनघे! मैं धन्य हूँ। मुझपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्की सम्माननीया होनेपर भी एक तुच्छ नदीको मान्यता प्रदान कर रही हैं ॥ २७ ॥
प्रभवन् पृच्छते यो हि सम्मानयति वा पुनः । नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति ॥ २८ ॥ जो सब प्रकारसे समर्थ होकर भी दूसरोंसे पूछता तथा उन्हें सम्मान देता है और जिसके मनमें कभी दुष्टता नहीं आती, वह मनुष्य निस्संदेह पण्डित कहलाता है ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् । प्रवक्तॄन् पृच्छते योऽन्यान् स वै नापदमृच्छति ॥ २९ ॥ अन्यथा बहुबुद्ध्याढ्यो वाक्यं वदति संसदि । अन्यथैव ह्यहंवादी दुर्बलं वदते वचः ॥ ३० ॥ जो मनुष्य ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और ऊहापोहमें कुशल दूसरे-दूसरे वक्ताओंसे अपना संदेह पूछता है, वह आपत्तिमें नहीं पड़ता है। विशेष बुद्धिमान् पुरुष सभामें और तरहकी बात करता है और अहंकारी मनुष्य और ही तरहकी दुर्बलतायुक्त बातें करता है ॥ २९-३० ॥
दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्यैः सहोत्थिते । त्वमेवार्हसि नो देवि स्त्रीधर्माननुभाषितुम् ॥ ३१ ॥ देवि! तुम दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न और देवलोकमें सर्वश्रेष्ठ हो। दिव्य पुण्योंके साथ तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम्हीं हम सब लोगोंको स्त्री-धर्मका उपदेश देनेके योग्य हो ॥
ततः साऽऽराधिता देवी गङ्गया बहुभिर्गुणैः । प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ॥ ३२ ॥ तदनन्तर गंगाजीके द्वारा अनेक गुणोंका बखान करके पूजित होनेपर देवसुन्दरी देवी उमाने सम्पूर्ण स्त्री-धर्मका पूर्णतः वर्णन किया ॥ ३२ ॥
उमोवाच
स्त्रीधर्मो मां प्रति यथा प्रतिभाति यथाविधि । तमहं कीर्तयिष्यामि तथैव प्रश्रिता भव ॥ ३३ ॥ **उमा बोलीं—**स्त्री-धर्मका स्वरूप मेरी बुद्धिमें जैसा प्रतीत होता है, उसे मैं विधिपूर्वक बताऊँगी। तुम विनय और उत्सुकतासे युक्त होकर इसे सुनो ॥ ३३ ॥
स्त्रीधर्मः पूर्व एवायं विवाहे बन्धुभिः कृतः । सहधर्मचरी भर्तुर्भवत्यग्निसमीपतः ॥ ३४ ॥