महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1388, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमद्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणोऽपि वा ।
यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥
मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं। जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् ।
मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद् दिने दिने ॥
शृणुयाद् यः पठेद् वापि ममेदं धर्मनिश्चयम् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं लभते स नरोत्तमः ॥
देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की है। मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)