भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1387, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1387

सघृतं गुग्गुलं सम्यग् धूपयेद् यः शिवान्तिके । गोसवस्य तु यज्ञस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥ यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत् । तस्य रुक्मप्रदानस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥ यस्तु नानाविधैः पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत् । स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् । तस्मात् सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तमः ॥ जो शिवलिङ्गके निकट घृतमिश्रित गुग्गुलका उत्तम धूप निवेदन करता है, उसे गोसव नामक यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो केवल गुग्गुलके पिण्डसे धूप देता है, उसे सुवर्णदानका फल मिलता है। जो नाना प्रकारके फूलोंसे मेरे लिङ्गकी पूजा करता है, उसे सहस्र धेनुदानका फल प्राप्त होता है। जो देशान्तरमें जाकर शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्योंमें मेरा प्रिय करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ।।

एवं नानाविधैर्द्रव्यैः शिवलिङ्गं समर्चयेत् । मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ॥ अर्चनाभिर्नमस्कारैरुपहारैः स्तवैरपि । भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिङ्गेष्वतन्द्रितः ॥ पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजस्तथा । अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः ॥ इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंद्वारा जो शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह मनुष्योंमें मेरे समान है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है। अतः भक्त पुरुष अर्चनाओं, नमस्कारों, उपहारों और स्तोत्रोंद्वारा प्रतिदिन आलस्य छोड़कर शिवलिङ्गोंके रूपमें मेरी पूजा करे। पलाश और बेलके पत्ते, राजवृक्षके फूलोंकी मालाएँ तथा आकके पवित्र फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ।।

फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम् । दत्तं सम्प्रीणयेद् देवि भक्तैर्मद्गतमानसैः । ममापि परितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम् । तस्मात् ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ॥ देवि! मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्तोंका दिया हुआ फल, फूल, साग अथवा जल भी मुझे विशेष प्रिय लगता है। मेरे संतुष्ट हो जानेपर लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है; इसलिये भक्तजन सदा मेरी ही पूजा किया करते हैं ।।

मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्ताः सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषतः ॥

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