महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1386, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिग्रहशून्य भक्त मुझमें ही मन-बुद्धि लगाये, मिट्टीका पात्र हाथमें लिये सब ओर भिक्षाके लिये विचरते रहते हैं। समस्त लोकमें विचरते हुए वे भक्तजन मेरे हर्षकी वृद्धि करते हैं ।। मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम् । सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ।। सभी लोकोंमें मेरे परम उत्तम सूक्ष्म एवं दिव्य पाशुपत योगशास्त्रका विचार करते हुए वे विचरण करते हैं ।। एवं नित्याभियुक्तानां मद्भक्तानां तपस्विनाम् । उपायं चिन्तयाम्य़ाशु येन मामुपयान्ति ते ।। इस तरह नित्य मेरे ही चिन्तनमें संलग्न रहनेवाले अपने तपस्वी भक्तोंके लिये मैं ऐसा उपाय सोचता रहता हूँ, जिससे वे शीघ्र मुझे प्राप्त हो जाते हैं ।। स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम । नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।। इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः । शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।। तीनों लोकोंमें मैंने अपने स्वरूपभूत शिवलिङ्गोंकी स्थापना की है, जिनको नमस्कारमात्र करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। होम, दान, अध्ययन और बहुत-सी दक्षिणावाले यज्ञ भी शिवलिङ्गको प्रणाम करनेसे मिले हुए पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। अर्चया शिवलिङ्गस्य परितुष्याम्यहं प्रिये । शिवलिङ्गार्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ।। प्रिये! शिवलिङ्गकी पूजासे मैं बहुत संतुष्ट होता हूँ। तुम शिवलिङ्ग-पूजनका विधान मुझसे सुनो ।। गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद् यः शिवं मम । इष्टस्य हयमेधस्य यत् फलं तत् फलं भवेत् ।। घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद् यः शिवं मम । स फलं प्राप्नुयान्मर्त्यो ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ।। केवलेनापि तोयेन स्नापयेद् यः शिवं मम । स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नरः ।। जो गोदुग्ध और माखनसे मेरे शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो कि अश्वमेध यज्ञ करनेसे मिलता है। जो प्रतिदिन घृतमण्डसे मेरे शिवलिङ्गका पूजन करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो केवल जलसे भी मेरे शिवलिङ्गको नहलाता है, वह भी पुण्यका भागी होता और अभीष्ट फल पा लेता है ।।