महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ।। मैं पूजनीय ईश्वर हूँ। मैं ही अविनाशी सनातन पुरुष हूँ। मैं प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको अमरत्व भी देता हूँ।। न मां विदुः सुरगणा मुनयश्च तपोधनाः । त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्दिभूतिं ब्रवीमि ते ।। आश्रमेभ्यश्चतुर्भ्योऽहं चतुरो ब्राह्मणान् शुभे । मद्भक्तान् निर्मलान् पुण्यान् समानीय तपस्विनः ।। व्याचख्येऽहं तथा देवि योगं पाशुपतं महत् ।। देवता तथा तपोधन मुनि भी मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं। देवि! तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं अपनी विभूति बतलाता हूँ। शुभे! देवि! मैंने चारों आश्रमोंसे चार पुण्यात्मा तपस्वी ब्राह्मणोंको, जो मेरे भक्त और निर्मलचित्त थे, लाकर उनके समक्ष महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की थी।। गृहीतं तच्च तैः सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात् । श्रुत्वा तत् त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तैः पुनः ।। इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमनाः शृणु ।। अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवाः । सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहाः ।। मेरे दक्षिणवर्ती मुखसे वह सब उपदेश सुनकर उन्होंने ग्रहण किया और पुनः उसकी तीनों लोकोंमें स्थापना की। इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैं उसी पाशुपत योगका वर्णन करता हूँ, एकचित्त होकर सुनो। मेरा ही नाम पशुपति है। अपने रोम-रोममें भस्म रमाये रहनेवाले जो मेरे भक्त मनुष्य हैं, उन्हें पाशुपत जानना चाहिये ।। रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं च भामिनि । लिङ्गार्थं चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ।। तेन संदिग्धसर्वाङ्गा भस्मना ब्रह्मचारिणः । जटिला मुण्डिता वापि नानाकारशिखण्डिनः ।। विकृताः पिङ्गलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिणः । भैक्षं चरन्तः सर्वत्र निःस्पृहा निष्परिग्रहाः ।। मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्धयः । चरन्तो निखिलं लोकं मम हर्षविवर्धनाः ।। भामिनि! पूर्वकालमें मैंने रक्षाके लिये, मंगलके लिये, पवित्रताके लिये और पहचानके लिये भी अपने भक्तोंको भस्म प्रदान किया था। उस भस्मसे सम्पूर्ण अंगोंको लिप्त करके ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले जटाधारी, मुण्डित अथवा नाना प्रकारकी शिखा धारण करनेवाले, विकृत वेश, पिंगलवर्ण, नग्न देह और नाना वेश धारण किये मेरे निःस्पृह और