महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1384, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]
उमोवाच
त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ त्र्यम्बक त्रिदशाधिप ।
त्रिपुरान्तक कामाङ्गहर त्रिपथगाधर ।।
दक्षयज्ञप्रमथन शूलपाणेऽरिसूदन ।
नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ।।
उमाने पूछा— तीन नेत्रधारी! त्रिदशश्रेष्ठ! देवेश्वर! त्र्यम्बक! त्रिपुरोंका विनाश और कामदेवके शरीरको भस्म करनेवाले गंगाधर! दक्षयज्ञका नाश करनेवाले त्रिशूलधारी! शत्रुसूदन! लोकपालोंको भी वर देनेवाले लोकपालेश्वर! आपको नमस्कार है ।।
नैकशाखमपर्यन्तमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सांख्ययोगसमन्वितम् ।।
भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम् ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्गतं विभो ।।
कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम् ।
आचारः कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद् भवान् ।।
वर्ण्यमानं त्वया साक्षात् प्रीणयत्यधिकं हि माम् ।।
आपने मेरे पूछनेपर सुननेके लिये उत्सुक हुई मुझ दासीको वह उत्तम अध्यात्मज्ञान बताया है, जो अनेक शाखाओंसे युक्त, अनन्त, अतर्क्य, अविज्ञेय और सांख्ययोगसे युक्त है। प्रभो! इस समय मैं आपसे आपका ही सायुज्य सुनना चाहती हूँ। ये भक्तजन आप परमेष्ठीकी परिचर्या कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा होता है? किस साधनसे आप संतुष्ट होते हैं? साक्षात् आपके द्वारा प्रतिपादित होनेपर यह विषय मुझे अधिक प्रसन्नता प्रदान करता है ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम् ।
येन ते न निवर्तन्ते युक्ताः परमयोगिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे अपने अद्भुत सायुज्यका वर्णन करता हूँ, जिससे युक्त हो वे परम योगी पुरुष फिर संसारमें नहीं लौटते हैं ।।
अव्यक्तोऽहमचिन्त्योऽहं पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
सांख्ययोगौ मया सृष्टौ सर्वं चापि चराचरम् ।।
पहलेके मुमुक्षुओंद्धारा भी मैं अव्यक्त और अचिन्त्य ही रहा हूँ। मैंने ही सांख्य और योगकी सृष्टि की है। समस्त चराचर जगत्को भी मैंने ही उत्पन्न किया है ।।
अर्चनीयोऽहमीशोऽहमव्ययोऽहं सनातनः ।